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Exclusive : मंदिर में चंदा चोरी के बाद अब हज यात्रा में भी घोटाला

Zegham Murtaza Zegham Murtaza | 1h ago · 8 min read
Exclusive : मंदिर में चंदा चोरी के बाद अब हज यात्रा में भी घोटाला

हाजियों पर पड़ने वाले 1500 रियाल के अतिरिक्त बोझ को मंत्रालय क्यों नहीं सहन करता?

हज यात्रा मुसलमानों का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है। हर साल लगभग बीस लाख लोग इसमें शामिल होते हैं। भारत से सवा लाख के आसपास यात्री जाते हैं। हाल के वर्षों में हज यात्रा के प्रबंधन को लेकर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई हैं। ताज़ा मामला हज 2027 के लिए सेवा प्रदाता एजेंसी के चयन से जुड़ा है, जिसमें यात्रियों पर लगभग 300–350 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

हज कोटा के तहत भारत से हर साल क़रीब सवा लाख श्रद्धालु सऊदी अरब पहुँचते हैं। हालांकि सरकारी कोटा से जाने वालों के अलावा कुछ लोग प्राइवेट ऑपरेटरों के ज़रिए भी इस पवित्र यात्रा में शामिल होते हैं। भीड़ को नियंत्रण में रखने के लिए हर देश के लिए यात्री संख्या का कोटा निर्धारित है। फिर भी इतने सारे यात्रियों के ठहरने, खाने-पीने, और परिवहन के इंतज़ाम के लिए बहुत सारे संसाधनों की ज़रुरत पड़ती है। मगर सऊदी अरब सरकार ख़ुद को हज की प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों तक सीमित रखती है। हज यात्री कहां ठहरेंगे, क्या खाएंगे, और हज के दौरान अपने विश्राम स्थल से स्थानीय आवाजाही कैसे करेंगे, ये ज़िम्मेदारी हजयात्रियों के लिए कोटा मांगने वाले देशों या फिर एजेंसियों की है।


भारत में हज यात्रा के प्रबंधन के लिए हज कमेटी है जो अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय के अधीन काम करती है। इसके अलावा जद्दाह में भारतीय काउंसलेट भी हज यात्रा के प्रबंधन में मदद करता है। हज यात्रा के इच्छुक लोगों से सरकार लगभग आठ-नौ महीना पहले एक निर्धारित शुल्क जमा करा लेती है। फिर लाटरी के ज़रिए यात्रियों का चुनाव होता है। हज यात्रा, उसके प्रबंधन, और हज कमेटी के ख़र्च घूम-फिरकर यात्रियों के सिर आ जाते हैं। नैतिकता तो यही कहती है कि किसी भी धार्मिक यात्रा में सरकार अव्वल तो अपना दख़ल ही न रखे और अगर ज़रुरी भी हो तो कोशिश करे कि यात्रियों को असुविधा न हो। मगर विगत वर्षों के अनुभव बताते हैं कि हज यात्रा न सिर्फ क़दम-क़दम पर भ्रष्टाचार का शिकार बन रही है, बल्कि यात्रियों को परेशान करने में हज कमेटी और सरकार कोई कसर बाक़ी नहीं रख रहे हैं।

ताज़ा मामला सेवा प्रदाता एजेंसी के चुनाव से जुड़ा है। इस साल यानि,

हज 2027 के लिए सऊदी अरब सरकार ने नियमों में कुछ बदलाव किए हैं। कुछ महीना पहले सऊदी अरब के हज मंत्रालय ने कम्प्रिहेन्सिव सर्विस पैकेज (CSP) नीति का ऐलान किया। इसके अंतर्गत विदेशी सरकारों से कहा गया कि अपने यात्रियों के आवास, परिवहन, भोजन और हज की रस्मों से जुड़ी सेवाएं मुहैया कराने के लिए किसी एक कंपनी का चुनाव करें। इससे पहले यह काम कई अल-अलग ऐजेंसियां भी कर सकती थीं। इस नीति का मुख्य उद्देश्य था कि सरकारें सामूहिक सौदेबाज़ी कर सकें ताकि हज लागत घटे और यात्रियों को सस्ती सेवाएँ मिलें।

चूंकि हज से जुड़ी हर गतिविधि के लिए सरकार यात्रियों से एकमुश्त भुगतान लेती है तो हर गड़बड़ी का ख़मियाज़ा यात्री को ही भुगतना पड़ता है। पिछले कई सालों से ऐसा हो रहा है। सऊदी अरब सरकार की नई नीति से लगा था कि यात्रियों को इस बार थोड़ी राहत मिल जाएगी, लेकिन ऐसा हो न सका। अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय और हज समिति ने फिर वही खेल दोहराया जो बरसों से खेला जा रहा है। जबकि सऊदी अरब ने नई नीति का ऐलान कई महीने पहले कर दिया था, लेकिन हज समिति के ज़िम्मेदार सोते रहे। या कहें कि अंत समय तक का इंतज़ार करते रहे, ताकि घपलेबाज़ी करने में आसानी है।

देखा जाए तो भारत के सीएसपी चुनाव के लिए हुए टेंडर में शुरु से ही झोल नज़र आते हैं।

कभी सुना है कि दो हज़ार करोड़ रुपये से अधिक का टेंडर QCBS पद्धति से हुआ हो? मगर, हज यात्रा के मामले में कई साल से ऐसा हो रहा है। बहरहाल, अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय ने जद्दाह में भारतीय काउंसलेट के माध्यम से 11 अगस्त को टेंडर सूचना जारी की। आवेदक 22 अगस्त तक आवेदन कर सकते थे। इसमें निविदा के नियम और शर्तें इस तरह लिखे गए कि ज़्यादा कंपनियां इसके लिए अहर्ता ही खो दें। नियमों के तहत 70 अंक आर्थिक अहर्ता के लिए और 30 अंक तकनीकी क्षमता और क्वालिटी से जुड़े थे। हालांकि इस बार 30 में से 20 अंक प्रेज़ेंटेशन के लिए निर्धारित कर दिए गए। इसके बावजूद टेंडर प्रक्रिया में 16 कंपनियों ने शिरकत की। लेकिन पहले ही दौर की छंटनी में 13 कंपनियां बाहर हो गईं।

वित्तीय मूल्यांकन तक पहुंची तीन कंपनियों से M/s Mashareq Al Mutamayza (L1) ने प्रति यात्री 8,717 सऊदी रियाल में तमाम सेवाएं देने की बात कही। इसके विपरीत M/s Ithra Al Khair (L3) ने सबसे महंगी दर से अपना सेवाएं (SAR 9,777 प्रति यात्री) देने की बोली जमा की। यह L1 कंपनी के मुक़ाबले प्रति यात्री 1,059.99 सऊदी रियाल ज़्यादा थी। इसके अलावा एक औऱ कंपनी M/s Mashareq Al Maseyah ने अपनी निविदा में 9,721.68 सऊदी रियाल प्रति यात्री के हिसाब से सेवाओं के दाम बताए। ज़ाहिर है M/s Mashareq Al Mutamayza और M/s Ithra Al Khair की बोली का रियाल की मौजूदा क़ीमत के लिहाज़ से लगभग 331 करोड़ रुपये का है।

सेवा प्रदाता कंपनी के चुनाव के लिए अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय ने एक Tender Evaluation Committee (TEC) का गठन किया। इसमें हज कमेटी के सीईओ शाहनवास चंदमकुझियिल (IAS), के अलावा अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय में उप सचिव श्रवण जातवथ (IAS), रियाद के भारतीय दूतावास में प्रथम सचिव ऋषि त्रिपाठी (IFS), जद्दाह में हज काउंसल सदफ़ चौधरी (IFS), काउंसल जनरल फ़हद ख़ान सूरी (IFS) को शामिल किया गया। इस समिति को कंपनियों की तकनीकी क्षमता, प्रेजेंटेशन और काम करने की सलाहियत के आधार पर स्पष्ट सिफ़ारिश करनी थी। हैरत की बात है कि समिति ने माना कि M/s Mashareq Al Mutamayza (L1) की तकनीकि तौर पर (सर्वोच्च स्कोर 92.13) सक्षम है। लेकिन दिल्ली आते-आते समिति का फैसला बदल गया।

अंत में ठेका उस कंपनी को मिला जिसकी बोली सबसे अधिक थी औऱ जिसके तकनीकि पाइंट सबसे कम थे। M/s Mashareq Al Mutamayza की निविदा रद्द करने से पहले उसे पत्र लिखकर पूछा गया कि तुमने इसने कम पैसे की निविदा कैसे दाख़िल कर दी। कंपनी ने जवाह में बताया कि उसके पास अपने संसाधन हैं, वह सऊदी अरब में इस तरह की सेवाएं देने वाली सातवीं सबसे सक्षम कंपनी है और उसे क्वालिटी सेवाएं देने के लिए अपनी सरकार की प्रशस्ति हासिल है। कंपनी ने कहा कि वह प्रति सेवा के आधार पर अलग-अलग रक़म भी बताने को तैयार है, लेकिन इसका मौक़ा ही नहीं आया।

मंत्रालय ने आख़िरकार फिर से M/s Ithra Al-Khair को ही चुना। सबसे ऊंची दर (SAR 9,777 प्रति हाजी) और ख़राब सेवाओं के रिकॉर्ड के बावजूद मंत्रालय की इस कंपनी पर मेहरबानी समझ से परे है। पिछले चार साल से कंपनी अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय से ठेका ले जाने में सफल रही है। पिछले साल हज के दौरान इस कंपनी की बेहद घटिया सेवाओं की हाजियों ने शिकायत की थी। इसके बावजूद लगातार चौथी बार अल इसरा अल ख़ैर ठेका हासिल करने में कामयाब हो गई। इसका सीधा मतलब है कि लगभग 1.22 लाख भारतीय हाजियों (सरकारी न्यूनतम संख्या) के सिरप पर अब प्रति व्यक्ति 1,059.99 रियाल का ख़र्च बढ़ गया है। यह कुल मिलाकर 331 करोड़ रुपये के आसपास बैठता है। यह मामला केवल एक कंपनी को फ़ायदा पहुँचाने का नहीं है, बल्कि लाखों भारतीय मुसलमानों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डालने का है। सार्वजनिक धन और धार्मिक यात्रा से जुड़ी इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोपरि होनी चाहिए।

यह ठेका हज यात्रा में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की एक बानगी भर है। महीनों पहले यात्रियों से पैसा जमा कराकर उसपर मिले ब्याज का कोई हिसाब नहीं होता। मुसलमानों के लिए सूद हराम है लेकिन हज कमेटी के अधिकारी इस पैसे पर सूद खाते हैं। इसी तरह एयरलाइन के चुनाव में भी कम हेराफेरी नहीं है। आमतौर पर जद्दाह का रिटर्न टिकट बीस से पैंतीस हज़ार रुपये का होता है लेकिन हज यात्रियों से प्रति टिकट लाख रुपये से ऊपर लिया जाता है। पिछले साल तो अंतिम समय में दस-दस हज़ार रुपये और अतिरिक्त जमा कराए गए। इसके अलावा पिछली बार का घोटाला भी चर्चा में रहा।

हालांकि इस मामले पर अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय की सफाई भी आई है। मंत्रालय का दावा है कि सेवा प्रदाता कंपनी का चुनाव पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया से किया गया है और इसमें कोई घालमेल नहीं हुआ है। लेकिन आप यक़ीन करेंगे मंत्रालय की बात पर? -पहली बात, एक ही कंपनी को लगातार चार साल से ठेका मिलना महज़ इत्तेफाक़ है? क्या इस कंपनी ने पिछले वर्षों में संतोषजनक काम किया है? पिछले चार वर्ष में हज पर गए लोगों से पूछ लीजिए। इतनी घटिया सर्विस शायद ही किसी देश के हाजियों को मिलती हो। क्या ये सच नहीं कि इस कंपनी का पिछला सीईओ एक पाकिस्तानी था? अगर पाकिस्तानी कनेक्शन वाले किसी संस्थान से किसी आम मुसलमान का रिश्ता निकल आता तो इसी मंत्रालय का मंत्री किस तरह का तमाशा कर रहा होता?

जब टेक्निकल कमेटी ने किसी और कंपनी की सिफारिश की तो फिर घुमाकर ठेका पुराने सेवा प्रदाता को क्यों दिया? यही करना था तो टेक्निकल कमेटी के गठन का ड्रामा किसलिए? हाजियों पर पड़ने वाले 1500 रियाल के अतिरिक्त बोझ को मंत्रालय क्यों नहीं सहन करता?

2026 में हज यात्रा के दौरान एक जीपीएस घड़ी की ख़रीद हर यात्री के लिए ज़रुरी कर दी गई। कहा गया कि यह हाजियों को ट्रैक करने और भटकने से बचाने के लिए है। मगर ये घड़ियां चलीं ही नहीं। हाजी अपनी घड़ियां चार्ज करते और होटल से निकलते ही इनकी बैट्री ख़त्म हो जाती। हज से तमाम हाजी ये कबाड़ा अपने साथ तोहफे में लेकर लौटे। यह घड़ियां Sekyo Innovations नाम की जिस कंपनी से ली गई थीं उसका अपना दफ्तर एक बेसमेंट के कोने में चल रहा था। इसके नाम से ही साफ है कि ये Seiko के ब्रांड का भ्रम पैदा करके चलताऊ माल बेचती है।

बहरहाल, सवा लाख हाजियों को सस्ती चीनी टाइप घड़ियां टिका दी गईं। शंघाई में जिसकी थोक क़ीमत 400-500 से ज़्यादा नहीं है, उस घड़ी के हाजियों से 5000-7000 रुपये तक वसूले गए। यह सब घोटाले उस मंत्री की नाक के नीचे हो रहे हैं जो प्रधानमंत्री के दुलारे हैं। उनको विपक्ष के नेताओं को ट्रौल करने से फुरसत मिले तो इन घोटालों पर नज़र डालें। बहरहाल, जिनको लगता है इस सरकार में सिर्फ मंदिर का चंदा चोरी होता है, उनके लिए ये तसल्ली की बात है। हमारी सरकार इतनी सेक्युलर तो है कि भ्रष्टाचार के मामले में सभी धर्मों से एक ही तरह का बर्ताव करती है।

Zegham Murtaza

Zegham Murtaza

ज़ैग़म मुर्तज़ा को कई मीडिया संस्थानों में कार्य करने का अनुभव है। पत्रकारिता के अलावा वे स्क्रिप्ट राइटिंग, डॉक्यूमेंट्री मेकिंग और ब्लॉगिंग भी करते हैं। वे राजनीति से लेकर समाज, पर्यावरण, कानून और सामाजिक मुद्दों जैसे कई विषयों पर लिखते हैं। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म में पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाते हैं।