प्रवीण कुमार झा नार्वे में रहते हैं। पेशे से डॉक्टर हैं, मन से लेखक। कई चर्चित किताबें प्रकाशित
अब हाकोन अष्टम के सामने कठिन विरासत है। पिता ने जिस ‘हम’ की भाषा बनाई, उसे ऐसे समय बचाना है जब राजपरिवार स्वयं विवादों के बीच है और यूरोप की राजनीति पहचान, आप्रवासन और ध्रुवीकरण से जूझ रही है। शायद इसी वजह से 2016 का वह सवाल फिर लौटता है, हम कौन हैं? हेराल्ड का उत्तर बहुत सरल था: देश नक्शा भर नहीं, उसमें रहने वाले लोग हैं। अलग-अलग लोग।
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