अमित शाह के मुंह में गांधी और बगल में असत्य के प्रयोग
अमित शाह ने कहा कि भारत का पुनर्निर्माण अब गांधी के रास्ते ही नरेंद्र मोदी के शासन में हो रहा है! कितना बड़ा असत्य का प्रयोग है यह।
गुरुवार को अहमदाबाद में महात्मा गांधी द्वारा 1920 में स्थापित विश्वविद्यालय गुजरात विद्यापीठ में दीक्षांत समारोह आयोजित किया गया था।
आम तौर पर इसका स्थापना दिवस 18 अक्टूबर को ही आयोजित किया जाता रहा है। लेकिन अब वह परंपरा जब से गुजरात विद्यापीठ संघियों के हाथ में चली गई है तब से खत्म कर दी गई है। करीब चार साल पहले गुजरात विद्यापीठ पर BJP का कब्ज़ा हो गया था। क्योंकि इसी वक्त गुजरात के राज्यपाल को विद्यापीठ का कुलाधिपति बनाया गया था।
इस बार दीक्षांत समारोह में अमित शाह को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया था। अमित शाह ने इसमें विद्यार्थियों को भाषण दिया और महात्मा गांधी के नाम से कुछ बातें कही। आश्चर्यजनक बात यह है कि अमित शाह के हाथों से विद्यार्थियों को पारितोषिक और प्रमाणपत्र या दोनों दिए गए। अहमदाबाद के जाने-माने प्रसिद्ध अख़बार ‘गुजरात समाचार’ में छपी एक फोटो से यह दिखाई देता है, जबकि गुजरात विद्यापीठ में हमेशा से विद्यार्थियों को पदवी देने का काम या पारितोषिक देने का काम कुलाधिपति ही करते आए थे।

आजकल विद्यापीठ के कुलाधिपति गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत हैं। इन के हाथों के बजाय अमित शाह एक छात्रा को पारितोषिक देते हुए फोटो में दिखाई देते हैं। मतलब यह कि अमित शाह ने कुलपति का काम भी अपने हाथ में ले लिया।
‘गुजरात समाचार’ अख़बार की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमित शाह के स्वागत के लिए दीक्षांत समारोह के प्रांगण में रेड कारपेट भी बिछा दी गई थी और काफी बड़ा खर्च विद्यापीठ के साज-सज्जा में किया गया था। महात्मा गांधी की सादगी अब गुजरात विद्यापीठ में कोई मायने नहीं रखती। सर्वोदय के जो तीन सिद्धांत गांधी ने जॉन रस्किन की पुस्तक ‘Unto This Last’ पढ़कर अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में लिखे थे इसमें तीसरा सिद्धांत सादगी का है। शायद कुलाधिपति और कुलपति में से किसी ने लगता है यह पढ़ा नहीं है।
महात्मा गांधी का नाम लेते हुए अमित शाह ने धर्मान्तरण के बारे में गांधी के जो विचार थे इसका जिक्र किया, लेकिन लोकतंत्र के बारे में गांधी के क्या विचार थे यह उन्होंने कहा ही नहीं। कैसे कहते? और हाँ, नरेंद्र मोदी का नाम लिए बिना तो अमित शाह रह ही नहीं सकते! उन्होंने यह भी कह डाला कि भारत का पुनर्निर्माण अब गाँधी के रास्ते ही नरेंद्र मोदी के शासन में हो रहा है! कितना बड़ा असत्य का प्रयोग है यह।
मुख्य रूप से सवाल यह है कि गुजरात विद्यापीठ के किसी भी विद्यार्थी में या किसी भी अध्यापक में अमित शाह को यह सवाल पूछने की हिम्मत नहीं है कि “दिल्ली में जंतर मंतर पर विद्यार्थियों पर जो लाठी चलाई गई, आंसू गैस छोड़ी गई और पैलेट गन मारी गई इसका आदेश किसने दिया था?” कैसे कोई पूछता? अगर कोई पूछता तो तो उसे तुरंत विद्यापीठ के बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता।
सभी जानते हैं कि दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स किस मंत्रालय के अधीन कार्य करती है। दिल्ली पुलिस किसके आदेशों का पालन करती है।
लेकिन अब गांधी के इस देश में सत्य के साथ खड़ा होने की हिम्मत बहुत कम लोगों में बची है। छात्रों में जरूर लोकतंत्र को बचाने का जज्बा अभी भी बचा है। छात्र से ही आगे कोई उम्मीद भी है।
महात्मा गांधी ने कहा था कि,
अगर हम दूसरे पक्ष को सुनने के लिए तैयार ही ना हों, तो लोकतंत्र का विकास असंभव है।
क्या विद्यापीठ के विद्यार्थियों को लोकतंत्र चाहिए, क्या वहां के अध्यापकों को लोकतंत्र क्या है, इसका कुछ पता है? क्या उन्होंने गांधी को पढ़ा है? अगर पढ़ा है तो वे बोलते क्यों नहीं? पूरे देश में जो भय का माहौल है। इस से कहीं ज्यादा भय का माहोल गुजरात विद्यापीठ में है इसमें कोई दो राय नहीं है। सब वहां गांधी के नाम पर RSS की और नरेंद्र मोदी की माला जपने में लग गए हैं। किसी को सत्य से लेनादेना नहीं है या देश में हो रहे अन्याय के सामने बोलने की हिम्मत नहीं है।
उन्हें यह मालूम ही नहीं है कि अगर महात्मा गांधी होते नहीं तो शायद इस महान भारत देश में लोकतंत्र होता ही नहीं।
गांधी ने कहा था,
आज़ादी का कोई मार्ग नहीं है, आज़ादी खुद एक मार्ग है। लोकतंत्र कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है कि जिसमें लोग भेड़ों की तरह बर्ताव करें।
Pro. Hemantkumar Shah
प्रो शाह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और गुजरात में लंबे समय तक अध्यापन के बाद लेखन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।