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नेली सेनगुप्ता: कैम्ब्रिज में जन्म और भारत की आज़ादी की लड़ाई

Dr. Chayanika Uniyal Dr. Chayanika Uniyal | 1h ago · 8 min read
नेली सेनगुप्ता: कैम्ब्रिज में जन्म और भारत की आज़ादी की लड़ाई

‘स्टॉप-गैप’ से आगे: नेली सेनगुप्ता और महिलाओं की राजनीतिक एजेंसी को पहचानने का सवाल


हाल ही में सोशल मीडिया पर नेली सेनगुप्ता को लेकर की गई एक टिप्पणी ने मेरा ध्यान खींचा। 1933 में उनके भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के संदर्भ में कहा गया कि वे केवल एक “स्टॉप-गैप अरेंजमेंट” थीं; यह उनकी कोई वास्तविक “उपलब्धि” नहीं थी, बल्कि उनके दिवंगत पति जतिंद्र मोहन सेनगुप्ता को दिया गया एक “ट्रिब्यूट” था।

इतिहास, विशेषकर जेंडर हिस्ट्री, की विद्यार्थी और अध्यापक के रूप में मुझे यह व्याख्या सवाल उठाने योग्य लगती है। इसलिए नहीं कि हमें 1933 की असाधारण राजनीतिक परिस्थितियों की अनदेखी करनी चाहिए, बल्कि इसलिए कि इतिहास में महिलाओं के बारे में हम किस भाषा का इस्तेमाल करते हैं, यह भी महत्वपूर्ण है।

नेली सेनगुप्ता को केवल एक अस्थायी व्यवस्था या उनके पति को दिए गए सम्मान के रूप में देखना उसी पुरानी प्रवृत्ति को दोहराता है, जिसमें पुरुष की अपनी राजनीतिक पहचान होती है, जबकि महिला की पहचान उसके साथ जुड़े पुरुष के माध्यम से की जाती है।

नेली का राजनीतिक अस्तित्व उनके विधवा होने के पूर्व से मौजूद था

नेली सेनगुप्ता का जन्म 1886 में कैंब्रिज में एडिथ एलेन ग्रे के रूप में हुआ था। उनका जीवन अपने आप में कई सामाजिक और सांस्कृतिक सीमाओं को पार करने की कहानी है। इंग्लैंड में उनकी मुलाकात कानून की पढ़ाई कर रहे बंगाली युवक जतिंद्र मोहन सेनगुप्ता से हुई। परिवार के विरोध के बावजूद उन्होंने 1909 में उनसे विवाह किया, भारत आईं और एक बंगाली संयुक्त परिवार का हिस्सा बनीं।

लेकिन यहीं सावधानी जरूरी है। नेली की कहानी को केवल एक अंग्रेज महिला और भारतीय राष्ट्रवादी के प्रेम और विवाह की कहानी बनाकर नहीं देखा जाना चाहिए। ऐसा करने पर एक बार फिर पुरुष कहानी के केंद्र में और महिला सहायक पात्र बन जाती है। नेली की राजनीतिक यात्रा इससे कहीं आगे जाती है।

1920 में असहयोग आंदोलन के दौरान जब जतिंद्र ने अपना वकालत का पेशा छोड़कर राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई, तब नेली भी आंदोलन से जुड़ीं। उन्होंने खादी का प्रचार किया, घर-घर जाकर खादी बेची और औपनिवेशिक प्रतिबंधों के बावजूद राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया। पति की गिरफ्तारी के बाद वे पीछे नहीं हटीं, बल्कि स्वयं आगे आईं और सभाएँ आयोजित कीं। औपनिवेशिक सत्ता के विरोध के कारण उन्हें स्वयं भी जेल जाना पड़ा।

इसलिए 1933 में जब वे कांग्रेस अध्यक्ष बनीं, तब वे कोई ऐसी राजनीतिक नवागंतुक नहीं थीं जिन्हें अचानक केवल इसलिए आगे कर दिया गया क्योंकि वे किसी महत्वपूर्ण नेता की विधवा थीं। उनके पीछे वर्षों का राजनीतिक संघर्ष, भागीदारी और जोखिम था। यह अंतर महत्वपूर्ण है।

पत्नी, बेटी और विधवा के आगे भी महिलाओं का इतिहास है

जेंडर हिस्ट्री हमें एक बहुत साधारण लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न पूछना सिखाती है कि पारंपरिक इतिहास आखिर किसकी agency को पहचानता है?

दरअसल इतिहास लेखन में महिलाओं के राजनीतिक जीवन को लंबे समय से पुरुषों के साथ उनके संबंधों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता रहा है—किसी की “पत्नी”, किसी की “बेटी”, किसी की “विधवा”।निस्संदेह ये संबंध महत्वपूर्ण थे और हैं। जतिंद्र मोहन सेनगुप्ता के साथ नेली के संबंध ने उनके जीवन और राजनीतिक परिवेश को प्रभावित किया होगा। इसे स्वीकार करने में कोई समस्या नहीं है। लेकिन प्रभावित होना और अपनी agency न होना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। पुरुष भी परिवार, मित्रों, राजनीतिक गुरुओं, संस्थाओं और नेटवर्क के माध्यम से राजनीति में आते हैं। फिर भी हम शायद ही कभी उनकी बाद की उपलब्धियों को उस व्यक्ति के खाते में डाल देते हैं जिसने उन्हें राजनीति से परिचित कराया था। तो महिलाओं के मामले में हमारा पैमाना अलग क्यों हो जाता है?

नेली की अध्यक्षता को केवल उनके पति के लिए “tribute” कहना इसलिए भी समस्याग्रस्त है क्योंकि इससे इतिहास का केंद्र फिर नेली से हटकर जतिंद्र हो जाता है। अध्यक्ष बनने की उपलब्धि नेली की राजनीतिक क्षमता या स्वीकार्यता के बजाय उनके पति की स्मृति का सम्मान बन जाती है और महिला एक बार फिर इतिहास से गायब होने लगती है।

क्या वे वास्तव में केवल “स्टॉप-गैप” थीं?

यह सच है कि 1933 की राजनीतिक परिस्थितियाँ सामान्य नहीं थीं। सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर में औपनिवेशिक दमन, गिरफ्तारियाँ और कांग्रेस की गतिविधियों पर प्रतिबंध थे। नेली की अध्यक्षता को उस राजनीतिक संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता। लेकिन किसी व्यक्ति के पद संभालने की परिस्थितियों को स्वीकार करना और यह कहना कि वह उसकी उपलब्धि ही नहीं थी, दो अलग बातें हैं।

राजनीतिक इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जहाँ लोगों ने संकट, गिरफ्तारी, मृत्यु, इस्तीफे या दूसरी असाधारण परिस्थितियों के कारण नेतृत्व संभाला फिर भी इतिहास यह प्रश्न पूछता है कि आखिर उस विशेष व्यक्ति को ही जिम्मेदारी क्यों दी गई?

इसलिए शायद बेहतर ऐतिहासिक प्रश्न यह नहीं है—

क्या नेली सेनगुप्ता केवल एक stop-gap arrangement थीं?

बल्कि यह होना चाहिए—

राजनीतिक संकट के उस दौर में भारत के सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजनीतिक संगठन का नेतृत्व संभालने के लिए नेली सेनगुप्ता पर भरोसा क्यों किया गया?

यह प्रश्न उनकी agency को मिटाने के बजाय उसे इतिहास में वापस स्थापित करता है और इसके साथ एक असहज सवाल भी उठता है कि यदि ऐसी ही परिस्थितियों में किसी पुरुष को नेतृत्व सौंपा गया होता, तो क्या हम इतनी आसानी से कहते कि यह उसकी उपलब्धि नहीं थी, वह तो केवल एक ‘स्टॉप-गैप अरेंजमेंट’ था? यहीं जेंडर हमारे इतिहास पढ़ने के तरीके में प्रवेश करता है। पूर्वाग्रह हमेशा जानबूझकर नहीं होता; कई बार वह उन अलग-अलग पैमानों में छिपा होता है जिनसे हम पुरुषों और महिलाओं की उपलब्धियों को मापते हैं।

पति की मृत्यु हुई, नेली की राजनीति की नहीं

नेली की राजनीतिक पहचान को केवल जतिंद्र तक सीमित करने में एक और ऐतिहासिक समस्या है। 1933 में जतिंद्र मोहन सेनगुप्ता की मृत्यु हो गई लेकिन नेली का सार्वजनिक जीवन उनके साथ समाप्त नहीं हुआ।

वे राजनीतिक रूप से सक्रिय रहीं और बाद में बंगाल की विधायी राजनीति में भी भूमिका निभाई। 1947 के विभाजन के बाद उन्होंने एक असाधारण निर्णय लिया। चटगाँव के पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बन जाने के बावजूद उन्होंने अपने पति के पैतृक स्थान को छोड़ने के बजाय वहीं रहने का फैसला किया। वहाँ भी वे सार्वजनिक जीवन और अल्पसंख्यकों के हितों के लिए काम करती रहीं। नारीवादी इतिहास की दृष्टि से यह तथ्य बेहद महत्वपूर्ण है।

यदि नेली की राजनीतिक प्रतिबद्धता केवल उनके पति से उधार ली हुई होती, तो पति की मृत्यु के साथ उसके समाप्त हो जाने की अपेक्षा की जा सकती थी लेकिन उनका आगे का जीवन बताता है कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और सार्वजनिक सेवा उनकी अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता बन चुके थे।

वे इंग्लैंड से औपनिवेशिक भारत आईं, अपने ही जन्म-देश की औपनिवेशिक सरकार के विरुद्ध खड़ी हुईं, जेल गईं, विधवा होने के बाद भी राजनीतिक रूप से सक्रिय रहीं और विभाजन के बाद भी सार्वजनिक जीवन से जुड़ी रहीं। इतने लंबे राजनीतिक जीवन को केवल “tribute” शब्द में समेट देना उस इतिहास को अनावश्यक रूप से छोटा कर देता है।


जेंडर हिस्ट्री का अर्थ महिलाओं को महान बनाना नहीं है

नारीवादी इतिहास को लेकर एक गलतफहमी अक्सर दिखाई देती है। महिलाओं को इतिहास में उनका स्थान वापस देने का अर्थ यह नहीं है कि हर महिला को नायिका बना दिया जाए। न ही feminist interpretation का अर्थ महिलाओं की उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करना, उनकी सीमाओं की अनदेखी करना या ऐतिहासिक परिस्थितियों को नजरअंदाज करना है।

बल्कि ठीक इसके विपरीत जेंडर हिस्ट्री हमसे महिलाओं को भी उसी ऐतिहासिक गंभीरता से देखने की मांग करती है, जिस गंभीरता से हमने परंपरागत रूप से पुरुषों को देखा है। यह महिलाओं के निर्णयों, संघर्षों, सीमाओं और agency को खोजने का प्रयास है साथ ही यह पूछती है कि राजनीतिक आंदोलन में कुछ कामों को “महत्वपूर्ण” मानकर इतिहास में दर्ज किया गया, जबकि समुदायों को संगठित करना, खादी बेचना, सभाएँ करना, गिरफ्तारियों के दौरान आंदोलन को जीवित रखना और राजनीतिक नेटवर्क को संभालना जैसे काम अक्सर गौण क्यों माने गए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जेंडर हिस्ट्री हमें उस भाषा पर भी ध्यान देने के लिए कहती है जिसके माध्यम से हम ऐतिहासिक महत्व तय करते हैं।“भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष”—राजनीतिक अधिकार को स्वीकार करता है। “जतिंद्र मोहन सेनगुप्ता की विधवा”—एक संबंध बताता है।

“पति को दिया गया ट्रिब्यूट”—उपलब्धि का केंद्र फिर पुरुष को बना देता है और “स्टॉप-गैप अरेंजमेंट”—महिला की राजनीतिक भूमिका को लगभग अप्रासंगिक बना देता है। ये शब्द पूरी तरह तटस्थ नहीं हैं। ये महिला के योगदान को इतिहास में गुमनाम करने में समर्थ हैं।

नेली को इतिहास में उनकी अपनी जगह देना

नेली सेनगुप्ता का महत्व स्थापित करने के लिए उन्हें जतिंद्र मोहन सेनगुप्ता से अलग करने की आवश्यकता नहीं है। दोनों का जीवन और राजनीतिक संघर्ष गहराई से एक-दूसरे से जुड़ा था, जैसा कि राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय अनेक दंपतियों के साथ था लेकिन पति से प्रभावित होने का अर्थ अपनी राजनीतिक सोच न होना नहीं है। असाधारण परिस्थितियों में किसी पद पर चुने जाने का अर्थ उस पद की उपलब्धि का समाप्त हो जाना नहीं है। और किसी की विधवा होना निश्चित रूप से महिला के पूरे राजनीतिक जीवन को उसके पति का स्मारक नहीं बना देता।

नेली सेनगुप्ता को सरोजिनी नायडू जैसी महिला नेताओं के साथ उस दौर में कांग्रेस की अध्यक्षता करने वाली चुनिंदा महिलाओं में स्थान मिला। उस समय जब महिलाओं की सार्वजनिक और राजनीतिक उपस्थिति भारत में ही नहीं पश्चिम देशों में भी स्वयं एक सामाजिक बंधनों को चुनौती के रूप में देखी जाती थी, तब एक महिला का भारतीय राष्ट्रीय राजनीतिक संगठन के सर्वोच्च पद तक पहुँचना अपने-आप में gender history की महत्वपूर्ण घटना है।

हालाँकि नेली सेनगुप्ता किन परिस्थितियों में कांग्रेस अध्यक्ष बनीं, इस पर चर्चा होनी चाहिए। उनकी अध्यक्षता के राजनीतिक और संस्थागत महत्व पर बहस भी होनी चाहिए। इतिहास का काम ही सवाल पूछना है। लेकिन हमें इतिहास लिखने की उस पुरानी आदत से भी बचना चाहिए जिसमें किसी प्रभावशाली पुरुष के साथ महिला का संबंध इतना बड़ा बना दिया जाता है कि उसके पीछे महिला का अपना इतिहास दिखाई देना बंद हो जाता है।

शायद जेंडर हिस्ट्री का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यही है कि वह हमसे महिलाओं को इतिहास में उनको उनसे बड़ा बनाने के लिए नहीं कहती। वह केवल इतना कहती है कि उन्हें इतिहास में उनको उनसे छोटा मत बनाइए।


Dr. Chayanika Uniyal

Dr. Chayanika Uniyal

डॉ चयनिका उनियाल दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास की असोसिएट प्रोफेसर हैं और जेंडर मुद्दों की प्रखर प्रवक्ता