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न्यायपालिका में यौन उत्पीड़न एक 'डर्टी सीक्रेट', इंदिरा जयसिंह ने ऐसा क्यों कहा?

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 4 min read
न्यायपालिका में यौन उत्पीड़न एक 'डर्टी सीक्रेट', इंदिरा जयसिंह ने ऐसा क्यों कहा?

जयसिंह पिछले दो दशकों से यह बात उठाती रही हैं।

भारतीय न्यायपालिका में यौन उत्पीड़न कोई ऐसी अफवाह नहीं है, जिसे केवल गलियारों में फुसफुसाकर कहा जाता हो। यह एक ऐसा सिलसिला है, जो कभी सार्वजनिक न होने वाली जांच रिपोर्टों, बीच रास्ते में दम तोड़ देने वाले महाभियोग प्रस्तावों, दंड जैसे दिखाई देने वाले तबादलों और उन इस्तीफों में दर्ज है, जिन्हें अदालतों ने बाद में गैर-स्वैच्छिक माना। जिस संस्था ने विशाखा दिशा-निर्देश बनाए और जो दूसरे नियोक्ताओं को POSH कानून के पालन का पाठ पढ़ाती है, वही संस्था आरोपी के न्यायाधीश होने पर बार-बार पारदर्शिता के बजाय गोपनीयता और देरी का रास्ता चुनती दिखाई दी है।


Live Law की एक रिपोर्ट के अनुसार, 29वें डी.एस. बोरकर स्मृति व्याख्यान में वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि,

उन्हें कई ऐसी महिला न्यायाधीशों की शिकायत मिली है, जिन्होंने पुरुष न्यायाधीशों द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत लेकर उनसे संपर्क किया था। उन्होंने इसे “भारतीय न्यायपालिका का डर्टी सीक्रेट” बताते हुए कहा, “कोई भी इस पर बात नहीं करना चाहता।”

जयसिंह ने एक महिला जिला न्यायाधीश द्वारा बताई गई एक परंपरा का भी उल्लेख किया।


उनके अनुसार,

जब कोई हाई कोर्ट न्यायाधीश सेवानिवृत्त होता है, तो महिला जिला न्यायाधीशों को एक पंक्ति में खड़ा होने, एक ही रंग की साड़ियां पहनने और भोजन कक्ष में प्रवेश करते पुरुष न्यायाधीशों पर फूल बरसाने को कहा जाता है। जयसिंह ने बताया कि उसी महिला न्यायाधीश को एक पुरुष जज ने अपनी शादी की 25वीं वर्षगांठ में आने और एक “आइटम नंबर” पर डांस करने के लिए कहा था। उन्होंने इनकार किया और बाद में उनकी नौकरी चली गई।

जयसिंह ने उम्मीद जताई कि इस तरह की शर्मनाक प्रथाएं 2047 तक खत्म हो जाएंगी।

जयसिंह ने यह बात वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर के एक व्याख्यान के बाद कही। इससे पहले मुरलीधर ने अपने संबोधन में न्यायपालिका से जुड़े कई मुद्दों पर बात की थी, जिनमें न्यायिक मामलों में देरी से लेकर छात्रों के विरोध प्रदर्शन तक शामिल थे। उन्होंने न्यायपालिका में मौजूद पदानुक्रम और सामंती प्रवृत्तियों की भी आलोचना की थी। मुरलीधर ने कहा था कि वरिष्ठ पुरुष सहकर्मियों की ओर से महिला न्यायाधीशों को यौन टिप्पणियों और उत्पीड़न का सामना करने के मामले बढ़ रहे हैं।

गौरतलब है न्यायपालिका में यौन उत्पीड़न के आरोपों का एक चर्चित मामला 2019 में सामने आया था,

जब सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व महिला कर्मचारी ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। शिकायतकर्ता ने 19 अप्रैल 2019 को सुप्रीम कोर्ट के 22 न्यायाधीशों को एक हलफनामा भेजकर अपनी शिकायत दर्ज कराई थी। इन आरोपों की जांच सुप्रीम कोर्ट की एक इन-हाउस समिति ने की थी, जिसमें तत्कालीन जज एसए बोबडे, जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस इंदु मल्होत्रा शामिल थे। समिति ने आरोपों में ‘कोई दम नहीं’ पाया था। हालांकि, समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई. शिकायतकर्ता ने जांच की प्रक्रिया और समिति की निष्पक्षता को लेकर आपत्ति जताते हुए कार्यवाही से खुद को अलग कर लिया था।

सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश और तत्कालीन पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष ए.के. गांगुली पर एक कानून प्रशिक्षु ने दिसंबर 2012 में दिल्ली के एक होटल के कमरे में हुई घटनाओं को लेकर आरोप लगाए थे। सुप्रीम कोर्ट की समिति ने पाया कि उन्होंने महिला को “अवांछित यौन व्यवहार” का सामना कराया था।

जयसिंह ने प्रशिक्षु का शपथपत्र सार्वजनिक किया और सवाल किया कि क्या न्यायाधीश अपनी बेटियों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार स्वीकार करेंगे। राजनीतिक और सार्वजनिक दबाव के बाद गांगुली ने जनवरी 2014 में मानवाधिकार आयोग से इस्तीफा दे दिया। उन्हें किसी आपराधिक मामले में दोषी नहीं ठहराया गया। प्रशिक्षु द्वारा पुलिस में मामला आगे नहीं बढ़ाने का निर्णय इस प्रकरण को बंद करने का एक और सुविधाजनक रास्ता बन गया।

बता दें कि जयसिंह पिछले दो दशकों से यह बात उठाती रही हैं। 2003 की याचिका से लेकर गांगुली मामले में प्रशिक्षु के शपथपत्र, मध्य प्रदेश की महिला न्यायाधीश की लंबी कानूनी लड़ाई, अदालतों में महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण भाषा पर उनके खुले पत्र और सितंबर 2026 में दिए गए वक्तव्य तक। तथ्य छिपे हुए नहीं थे। उन्हें प्रक्रिया में उलझाया गया, सीलबंद किया गया और फिर मामला बंद घोषित कर दिया गया। जो संस्था गोपनीयता और पदानुक्रम की ढाल उठाए बिना अपनी महिला न्यायाधीशों और कर्मचारियों की आंखों में आंखें डालकर बात नहीं कर सकती, वह उस प्रश्न का उत्तर पहले ही दे चुकी है जिसे वह आज भी अनसुलझा बताती है।