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क्यों केरलम में मौलाना अबूबकर अहमद के बयान पर मचा है घमासान?

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 4 min read
क्यों केरलम में मौलाना अबूबकर अहमद के बयान पर  मचा है घमासान?

इस्लामी विद्वान शेख अबूबकर अहमद के बयान के बाद केरलम में व्यापक आक्रोश देखने को मिल रहा है।

केरलम के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने बुधवार को इस्लामी विद्वान शेख अबूबकर अहमद के उस बयान का कड़ा विरोध किया, जिसमें उन्होंने महिलाओं को घरों तक सीमित रखने की बात कही थी। सतीशन ने इसे इस्लामी इतिहास की “गलत व्याख्या” बताया।

‘भारत के ग्रैंड मुफ्ती’ की उपाधि रखने वाले शेख अबूबकर अहमद ने कहा था कि,

महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में आने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि इससे विनाश की स्थिति पैदा हो सकती है।

उनके इस बयान के बाद केरलम में व्यापक आक्रोश देखने को मिला। समाचार एजेंसी PTI के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने धर्मगुरु की टिप्पणी को खारिज करते हुए कहा कि यह विचार दक्षिण भारतीय राज्य केरल की “प्रगतिशील” परंपरा के अनुरूप नहीं है।


राज्य मंत्रिमंडल की बैठक के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में सतीशन ने कहा,

“हम इस बयान से बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं। यह प्रगतिशील केरलम के अनुकूल विचार नहीं है। हम किसी भी रूप में इसे स्वीकार नहीं कर सकते।”

कंथापुरम ए. पी. अबूबकर के इस बयान को लेकर कई लेखकों और पब्लिक इंटलेक्चुअल ने भी आपत्ति जताई है। हिंदी के जाने माने लेखक और The Credible News के चीफ एडिटर अशोक कुमार पांडे ने एक्स पोस्ट करते कहा कि,



ऐसे मौलाना को सिर्फ मस्जिद तक ही सीमित रखना चाहिए। कहीं से भी ऐसे मौलाना को दूसरे लोगों को जिंदगी में दखल देने की इजाजत नहीं होनी चाहिए।

बता दें कि कंथापुरम ए. पी. अबूबकर मुसलियार के नाम से भी प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान ने अपने विचार के समर्थन में कुरान का हवाला दिया था। उनका कहना था कि महिलाओं को घरों तक सीमित रहना चाहिए और सार्वजनिक मंचों पर नहीं आना चाहिए। इस विचार का विरोध करते हुए मुख्यमंत्री सतीशन ने कहा कि,

महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उन्हें जीवन और समाज के प्रत्येक क्षेत्र में भागीदारी करने तथा केंद्रीय भूमिका निभाने का पूरा अधिकार है। “बिना किसी संदेह के यही हमारा प्रगतिशील दृष्टिकोण है।”

कंथापुरम ने रविवार को कोच्चि में आयोजित एक इस्लामी सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा था कि,

अगर महिलाएं सार्वजनिक स्थानों पर आएंगी तो इससे “बड़ा विनाश” होगा। उनकी यह टिप्पणी हाल ही में जारी उस विवादास्पद सर्कुलर के बाद सामने आई, जिसमें कहा गया था कि “महिलाओं को सार्वजनिक मंचों पर उपस्थित नहीं होना चाहिए। कंथापुरम ने महिलाओं की तुलना सोने के आभूषणों से करते हुए कहा कि उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “अगर हार की सुंदरता बनाए रखनी है तो उसे सुरक्षित रूप से डिब्बे के अंदर रखना होगा।”

उन्होंने दावा किया कि इसी कारण इस्लाम में महिलाओं के लिए पर्दे की व्यवस्था की गई है।

मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने धर्मगुरु के इस विचार को इस्लामी इतिहास की “गलत व्याख्या” करार दिया। अपनी बात के समर्थन में उन्होंने इस्लामी इतिहास में सत्ता और नेतृत्व की भूमिका निभाने वाली महिलाओं के उदाहरण पेश किए।

सतीशन ने कहा कि,

पैगंबर मोहम्मद की पहली पत्नी खदीजा एक सफल व्यवसायी थीं। वहीं, उनकी एक अन्य पत्नी आयशा ने ‘जंग-ए-जमल’ में भाग लिया था और नेतृत्वकारी भूमिका निभाई थी। उन्होंने रानी बिलकिस का भी उल्लेख किया, जिनका वर्णन इस्लामी इतिहास में एक शासक के रूप में मिलता है।

सतीशन ने कहा,

“इस्लामी इतिहास में एक महिला ने व्यापार किया, एक महिला ने सैन्य नेतृत्व की भूमिका निभाई और एक महिला रानी बनी। ये सभी उदाहरण इस्लामी इतिहास में मौजूद हैं।”

उन्होंने खलीफा के शासनकाल की एक घटना का भी जिक्र किया, जब एक महिला ने ‘मेहर’ से जुड़े विषय पर सवाल उठाया था। शासक ने उसकी दलील को स्वीकार करते हुए अपना फैसला बदला था। मुख्यमंत्री ने कहा,

“ये उदाहरण बताते हैं कि उस दौर में महिलाओं को शाही दरबार में भी स्थान प्राप्त था। इसलिए महिलाओं को घरों तक सीमित रखने वाले ऐसे विचार को हम किसी भी रूप में स्वीकार नहीं कर सकते।”

गौरतलब है कि शेख अबूबकर अहमद को ‘भारत का ग्रैंड मुफ्ती’ कहा जाता है। वह भारत और दक्षिण एशिया में सुन्नी मुसलमानों के एक प्रमुख धार्मिक विद्वान हैं। बताया जाता है कि वह यह उपाधि धारण करने वाले दसवें व्यक्ति हैं। भारत और इस्लामी जगत में अन्य ग्रैंड मुफ्ती भी हैं और कई प्रमुख मस्जिदें उनके मुख्यालय के रूप में काम करती हैं। ‘मुफ्ती’ का अर्थ मूल रूप से इस्लामी कानून यानी शरीयत का विशेषज्ञ होता है।