नोएडा में प्रदर्शनकारियों पर कहानी गढ़ कर लगाया गया था NSA : इलाहाबाद हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने NSA के तहत आकृति के खिलाफ जारी डिटेंशन ऑर्डर को निरस्त कर दिया है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक 25 वर्षीय आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत को रद्द कर दिया है। आकृति अप्रैल में नोएडा में हुए श्रमिकों के प्रदर्शन से जुड़े मामले में करीब पांच महीने से जेल में बंद हैं। कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत आकृति के खिलाफ जारी डिटेंशन ऑर्डर को निरस्त कर दिया है साथ ही उन्हें 5 लाख रुपए देने का आदेश भी दिया है।
बता दें कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत किसी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए एक साल तक ही हिरासत में रखा जा सकता है।
Bar and Bench के मुताबिक, मंगलवार को जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से गढ़ी गई कहानी के आधार पर आकृति चौधरी को हिरासत में लिया गया था। ‘Bar and Bench ने अधिवक्ता चार्ली प्रकाश के हवाले से बताया कि अदालत ने नोएडा प्रशासन को आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है। हालांकि, आकृति अभी जेल से रिहा नहीं होंगी, क्योंकि प्रदर्शन से जुड़े अन्य मामलों में उन्हें जमानत मिलना बाकी है।
13 अप्रैल को शहर के विभिन्न हिस्सों में कई औद्योगिक इकाइयों के करीब 40 से 45 हजार श्रमिक लंबे समय से लंबित वेतन वृद्धि की मांग को लेकर एकत्र हुए थे। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण आपूर्ति बाधित होने से गैस की कीमतें बढ़ रही थीं और इसी बीच यह प्रदर्शन हुआ था। प्रदर्शन बाद में हिंसक हो गया था। सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर साझा किए गए वीडियो में कुछ प्रदर्शनकारियों को पथराव और संपत्ति में तोड़फोड़ करते हुए देखा गया था। हिंसा के सिलसिले में 14 अप्रैल को 350 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
करीब एक महीने बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने आकृति चौधरी और 60 वर्षीय सत्यम वर्मा के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मामला दर्ज किया। लखनऊ के रहने वाले सत्यम वर्मा पूर्व पत्रकार हैं, जबकि इतिहास की स्नातक आकृति चौधरी पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की रहने वाली हैं। दोनों श्रमिक संगठन ‘मजदूर बिगुल दस्ता’ के सदस्य हैं।
पुलिस ने आरोप लगाया था कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने, आगजनी कराने और अफरा-तफरी पैदा करने में दोनों की भूमिका “महत्त्वपूर्ण” थी। पुलिस का यह भी दावा था कि वर्मा और आकृति ने अलग-अलग इलाकों में लोगों को “सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने” के लिए उकसाया था। आकृति के परिवार का दावा था कि पुलिस ने उन्हें 11 अप्रैल को नोएडा के एक मेट्रो स्टेशन से हिरासत में लिया था। उनके पिता अरुण चौधरी ने सवाल उठाया था कि जिस व्यक्ति को 11 अप्रैल को ही हिरासत में ले लिया गया, उस पर 13 अप्रैल को हुई हिंसा का आरोप कैसे लगाया जा सकता है।
प्रत्यक्षदर्शियों ने आरोप लगाया था कि,
13 अप्रैल को हिंसा को नियंत्रित करने के लिए तैनात पुलिसकर्मियों ने प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट की थी। 16 अप्रैल को एक वीडियो सामने आया, जिसमें पुलिसकर्मी महिलाओं के साथ मारपीट करते दिखाई दे रहे थे। उत्तर प्रदेश कांग्रेस समेत कई सोशल मीडिया यूज़र्स ने इस वीडियो को साझा करते हुए दावा किया था कि इसमें वेतन वृद्धि की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रही महिला श्रमिकों पर नोएडा पुलिस को लाठीचार्ज और बदसलूकी करते देखा जा सकता है।
गौतम बुद्ध नगर पुलिस कमिश्नरेट ने इन आरोपों से इनकार किया था। पुलिस ने कहा था,
प्रथम दृष्टया यह वीडियो मॉर्फ किया हुआ या AI से बनाया गया प्रतीत होता है। यह नोएडा का नहीं, बल्कि किसी दूसरी जगह का मालूम पड़ता है।”
हालांकि, प्रशासन की जवाबी कार्रवाई के डर से अपनी पहचान उजागर न करने वाले प्रत्यक्षदर्शियों ने ‘स्क्रॉल’ को बताया कि वीडियो में वही दृश्य दर्ज था, जिसे उन्होंने अपनी आंखों से देखा था।
Scroll ने जियोलोकेशन विश्लेषण किया और वीडियो का एक प्रेस फोटोग्राफ से मिलान करके यह स्थापित किया कि,
घटनास्थल वास्तव में नोएडा के सेक्टर-6 स्थित ब्लॉक-ए और ब्लॉक-बी था। ‘स्क्रॉल’ की टीम ने घटनास्थल का दौरा कर कई ऐसे लोगों से भी बात की, जिन्होंने पुलिस को मारपीट करते देखा था। उस समय पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह को भेजे गए सवालों का कोई जवाब नहीं मिला था।
पुलिस द्वारा NSA लगाने के बाद मंगलवार 1 सितंबर को इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुनवाई होनी थी, कोर्ट ने आकृति चौधरी पर लगे राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत आकृति की हिरासत को रद्द कर दिया है।
आकृति की जमानत की तीन अर्जियाँ खारिज हो गई थी और राहत के लिए वो सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हे जमानत देने के बजाय हाईकोर्ट जाने की सलाह दी थी तथा मंगलवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट में हुई सुनवाई में उनकी हिरासत को चुनौती दिया गया। उनकी याचिका को स्वीकार करते हए न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने उनकी हिरासत को राज्य द्वारा “मनगढ़ंत कहानी” कहा है और इस मामले में पीठ ने निर्देश किया है कि यदि किसी मामले अन्य मामले में गिरफ़्तारी उचित नहीं है, तो उन्हें तत्काल रिहा कर दिया जाय।
यह घटना खबर में तब आई जब पीठ ने उनकी गिरफ़्तारी के क्रम में और भारतीय नागरिक सुरक्षा सहिंता(बीएनएसएस) के तहत नोटिस जारी की प्रक्रिया की। इस क्रम में बारीकी जांच और प्रक्रियात्मक खामियाँ पाई। इस मालमे में फिलहाल विस्तृत आदेश की प्रतीक्षा है। कोर्ट की सुनवाई के दौरान राज्य ने न्यायालय को सूचित किया है कि आकृति चौधरी को 12 अप्रैल 2026 को सुबह 10:56 बजे गिरफ़्तार किया गया था और उन्हें बीएनएसएस की धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया था। राज्य का विशेष मामला यह है कि उन्होंने भीड़ को आगजनी और पत्थर मारने के लिए उकसाया था।
खबर के अनुसार न्यायमूर्ति श्रीधरन ने पूछा कि क्या बीएनएसएस की धारा 126 के तहत पहले नोटिस तामील किया गया था। उसके जवाब में राज्य ने कहा,
धारा 126 के तहत कोई नोटिस नहीं दिया गया था और धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया गया था।
इस मामले में न्यायमूर्ति श्रीधरन ने इस प्रकार टिप्पणी की है-
बीएनएसएस के तहत नोटिस के अनुसार, अगर वह बयान देने को तैयार होती, तो उसे गिरफ्तार नहीं किया जाता। अब इसमे जीडी एंट्री देखिये, उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा, फिर नोटिस बनाया जाएगा”
कोर्ट ने जनरल डायरी में दर्ज जानकारी के आधार पर राज्य के बयान पर सवाल उठाते हुए पाया कि रिकॉर्ड से ये प्रतीत हो रहा है कि नोटिस तैयार करने से पहले ही आकृति चौधरी को गिरफ़्तार कर लिया गया था । यह टिप्पणी इस तथ्य के संदर्भ में की गई थी कि पीठ इस बात की जांच कर रही थी कि क्या वास्तव में राज्य द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के हिंसा में आकृति की भूमिका को स्थापित कर सकती है। कोर्ट को राज्य को ऐसे फुटेज दिखाने को कहा था जिसमें यह पता चले कि चौधरी ने हिंसा के लिए उकसाया था राज्य ने विडियो पेश करने के लिए समय मांगा था किन्तु कोर्ट ने यह कहते हुए समय देने से मना किया कि आकृति पहले ही 5 महीने जेल में गुजार चुकी हैं।