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सहारनपुर में दशकों पुरानी मस्जिद पर चला बुलडोजर, अखिलेश-मायावती ने योगी सरकार पर बोला हमला

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 7 min read
सहारनपुर में दशकों पुरानी मस्जिद पर चला बुलडोजर, अखिलेश-मायावती ने योगी सरकार पर बोला हमला

यूपी में दशकों पुराने मस्जिद को ध्वस्त किए जाने के बाद प्रदेश की राजनीति का पारा चढ़ गया है।

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर बनी जिस मस्जिद को अवैध घोषित किया गया था, उसे शनिवार सुबह ध्वस्त कर दिया गया। भाजपा की योगी सरकार की इस कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था।

यह प्रशासनिक कार्रवाई जिला न्यायाधीश की अदालत के 4 सितंबर के फैसले के बाद की गई। अदालत ने मस्जिद प्रबंधन समिति की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें धार्मिक ढांचे को सरकारी जमीन पर अतिक्रमण माना गया था। इससे पहले जुलाई में सिटी मजिस्ट्रेट ने मस्जिद को अवैध घोषित करते हुए इसे गिराने का आदेश दिया था।

दशकों पुराने इस मस्जिद को ध्वस्त किए जाने के बाद प्रदेश की राजनीति का पारा चढ़ गया है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इस घटने पर योगी सरकार पर निशाना साधते एएनआई से बात करते कहा कि,


योगी के कहने पर अधिकारियों ने ये किया है। क्या हाई कोर्ट में न्याय नहीं मिल सकता था? क्या अपील के लिए वे लोग सुप्रीम कोर्ट में नहीं जा सकते थे? अधिकारियों ने सरकार के इशारे पर ये काम किया है जिससे अगली कोर्ट में उन्हें न्याय ना मिल जाए। "

अखिलेश यादव ने कहा कि,

वे लोग सनातनी कभी नहीं हो सकते जो दूसरे धर्मों का सम्मान न करते हों, जो दूसरे की आस्था के साथ खिलवाड़ करते हों। एक सच्चा हिंदू कभी दूसरे का अपमान नहीं कर सकता। हमने तो यही सनातन में सीखा है। वसुधैव कुटुंबकम यही बताता है कि पूरा विश्व एक परिवार है। सच्चा सनातनी सौहर्द पसंद लोग हैं। सौहार्द सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। ये इसलिए हो रहा है क्योंकि भगवान प्रभु श्री राम के धन में चोरी करते हुए ये लोग पकड़े गए। चढ़ावे की चोरी में ये लोग पकड़े गए। SIT बनाकर जेल भेजने वाली बात से इनका सब कुछ छिन गया। जनता जान गई है कि ये किस तरह के लोग हैं इसलिए वे इसे सांप्रदायिक एंगल दे रहे हैं।

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने योगी सरकार की इस कार्रवाई की आलोचना की है।


उन्होंने एक्स पोस्ट करते कहा कि,

उत्तर प्रदेश में आए दिन मस्जिदों को काफी आपाधापी में अवैध बताकर उनको ध्वस्त करने का जो सरकारी अभियान चल रहा है वह ठीक नहीं है। सरकार को ऐसे निगेटिव हालात से बचने के लिये इस पर तुरन्त रोक लगाकर इसके समाधान के अन्य उपाय ज़रूर करने चाहिये। वैसे भी एक संवैधानिक सेक्युलर सरकार द्वारा सभी धर्मों के मानने वालों एवं उनके धार्मिक स्थलों आदि का एक समान आदर-सम्मान व उनकी सुरक्षा करने का उत्तरदायित्व बनता है।

बसपा प्रमुख ने कहा कि,

मज़हब में मस्जिदें हर दिन इबादत बल्कि दिन में कई बार जमात के साथ नमाज़ पढ़ने का मुख्य व अभिन्न अंग हैं, जिसको ध्यान में रखकर व भारतीय परम्परा के अनुसार सम्मान देना देश व व्यापक जनहित में ज़रूरी है। इसके साथ ही, बिना नियम-क़ानून का समुचित अनुपालन किये हुये किसी भी अभियुक्त का मकान ध्वस्त करके उसके पूरे परिवार को सामूहिक तौर पर सज़ा देकर बेघर बार कर देने की कार्रवाईयों से भी लोग काफी विचलित हैं। बीजेपी सरकार में ’क़ानून द्वारा क़ानून का राज’ का व्यवहार ज़रूरी है।

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।


उन्होंने एक्स पोस्ट करते कहा कि,

क्या मुसलमानों के लिए अब मज़हबी आज़ादी का संवैधानिक हक़ भी नहीं बचा है? हमारी इबादतगाहों पर बार-बार कमज़ोर और मनगढ़ंत वजहों के नाम पर बुलडोज़र क्यों चलाया जाता है?

ओवैसी ने आगे कहा कि,

मस्जिद पहले थी, कलेक्ट्रेट बाद में आया। मस्जिद कमेटी ने 1911 के दस्तावेज़ अदालत में पेश करके यह साबित करने की कोशिश की कि यह मस्जिद कलेक्ट्रेट से पहले से मौजूद थी। एक सदी से भी ज़्यादा वक़्त से वहाँ लगातार नमाज़ होती रही है। यानी यह कोई आज खड़ी कर दी गई इमारत नहीं है, बल्कि लंबे अरसे से एक इबादतगाह के तौर पर इस्तेमाल होती रही है। यही वक़्फ़ बाय यूज़र की बुनियाद है, जिसे क़ानून में भी मान्यता मिली है।

इस पूरे मामले पर सहारनपुर के डीआईजी अभिषेक सिंह ने कहा कि ,

सहारनपुर कलेक्ट्रेट में एक मस्जिद थी। सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने पाया कि इसका निर्माण सरकारी जमीन पर अवैध रूप से किया गया था। मस्जिद समिति की ध्वस्तीकरण के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी गई।”
लेकिन हैरानी की बात ये हैं कि बीती रात जब मस्जिद गिराए जाने की खबर फैली, तो जिलाधिकारी ने वहां मौजूद भीड़ से कहा कि मस्जिद को केवल सील किया जाएगा। लेकिन सुबह तक मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित 70 साल से अधिक पुरानी मस्जिद को जिला प्रशासन ने शनिवार सुबह करीब 5 बजे ध्वस्त कर दिया।
बता दें कि इस मस्जिद का निर्माण ब्रिटिश शासन के दौरान कलेक्ट्रेट में काम करने वाले मुस्लिम कर्मचारियों के लिए कराया गया था, जिन्हें नमाज अदा करने के लिए दूर जाना पड़ता था।

डीआईजी ने कहा, “कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सभी एहतियाती कदम उठाए गए हैं। इस कार्रवाई के दौरान सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जा रहा है।”

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, ध्वस्तीकरण से पहले समाजवादी पार्टी की लोकसभा सांसद इकरा हसन को सहारनपुर जाने से रोकने के लिए कैराना स्थित उनके आवास पर नजरबंद कर दिया गया था।


सांसद इकरा हसन ने कहा,

रातभर मेरे कैराना स्थित आवास पर बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात रहे और मुझे सहारनपुर जाने से रोकने के लिए नजरबंद कर दिया गया। मैं कलेक्ट्रेट मस्जिद के मुद्दे पर अधिकारियों से मिलने और अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों की चिंताओं को सामने रखने के लिए सहारनपुर जाना चाहती थी, लेकिन मुझे घर से बाहर निकलने तक की अनुमति नहीं दी गई।”

कैराना सांसद हसन ने बताया कि,

निचली सिविल कोर्ट का आदेश आया था, उसके बाद पूरी मस्जिद को सील कर दिया गया और आसपास बैरिकेडिंग लगा दी गई। इस बीच, लोग अधिकारियों से बात करके इस मामले में कुछ समय की गुज़ारिश करना चाहते थे। लोग हाई कोर्ट जाना चाहते थे, लेकिन समय नहीं दिया गया और सहारनपुर ज़िले के सभी प्रमुख लोगों को हाउस अरेस्ट किया गया। सुबह-सुबह मस्जिद को ढहा दिया गया। यह शर्मनाक है। यह इतना बड़ा गुनाह है कि उन्हें इसका अंजाम ज़रूर भुगतना होगा। हम इस मामले को कोर्ट में ले जाएंगे। यह हमारा अधिकार है। लेकिन जिस तरह से यह कार्रवाई की गई, वह दिखाता है कि लोकतंत्र की हत्या कैसे हुई है। 'क्विक जस्टिस' को ही मानक तरीका माना जा रहा है। अगर हर फ़ैसला सिर्फ़ सरकारी आदेशों के आधार पर ही लिया जाना है, तो फिर कानूनी व्यवस्था की कोई ज़रूरत ही नहीं है। यह घटना पूरी तरह से निंदनीय है।"

समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता धर्मेंद्र कुमार सिंह ने कहा,

यह सरकार पहले दिन से ही बुनियादी सवालों से बचना चाहती है और इस तरह का नैरेटिव गढ़ती है। भारतीय न्यायपालिका और संविधान में एक व्यवस्था निर्धारित है। न्याय पाने का अवसर सभी अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक उपलब्ध है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद ही वह अंतिम माना जाता है। इसलिए यह देखना जरूरी है कि क्या संबंधित पक्ष को अपील करने का अवसर दिया गया था।”

उन्होंने आगे कहा,

किसी भी आदेश के बाद अपील दाखिल करने के लिए एक निश्चित समय दिया जाता है। वह एक महीना या कोई अन्य निर्धारित अवधि हो सकती है। संबंधित पक्ष को उच्च अदालत के आदेश में हुई किसी गलती को उससे ऊपर की अदालत में चुनौती देने का अधिकार है। लेकिन यह सरकार अदालतों से आदेश मिलते ही इतनी जल्दबाजी में कार्रवाई करती है कि उससे समाज में नफरत पैदा होती है।”

मस्जिद को जुलाई में “अनधिकृत ढांचा” घोषित किया गया था और सिटी मजिस्ट्रेट ने 30 दिनों के भीतर जमीन खाली करने का आदेश दिया था। अदालत ने 315 वर्गमीटर सरकारी भूमि पर “अनधिकृत कब्जे” के लिए कथित “अवैध कब्जाधारियों” पर 6.41 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया था। यह आदेश उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1972 के तहत पारित किया गया था।

इससे पहले सहारनपुर के सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने बताया था कि राजस्व विभाग ने विकास त्यागी नामक व्यक्ति की शिकायत की जांच करने के बाद कार्रवाई शुरू की थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर सरकारी जमीन पर मस्जिद का निर्माण किया गया है। मार्च 2025 में एक राजस्व अधिकारी (लेखपाल) ने मस्जिद के कथित प्रबंधक और मौलवी अब्दुल हमीद के खिलाफ सरकारी संपत्ति पर अनधिकृत कब्जे की शिकायत दर्ज कराई थी। प्रतिवादियों को अप्रैल 2025 में नोटिस जारी किए गए थे और उनकी ओर से उसी वर्ष 11 जून को आपत्तियां दाखिल की गई थीं।