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BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को सुप्रीम कोर्ट से लगा बड़ा झटका

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 6 min read
BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को सुप्रीम कोर्ट से लगा बड़ा झटका

सुप्रीम कोर्ट ने BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की ताकत को कम करते हुए उनके फैसलों पर कैंची चलाई है।

सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को याद दिलाया कि वह केवल प्रो-टेम चेयरमैन हैं, लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित पदाधिकारी नहीं। इसलिए वह BCI के केवल रोजमर्रा के कामकाज का प्रबंधन कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला लेने से पहले BCI को भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को प्रक्रिया में शामिल करना होगा।

Live Law की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के कामकाज पर निगरानी और कड़ी कर दी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक नए चुनावों के जरिए BCI का पुनर्गठन नहीं हो जाता, तब तक संस्था द्वारा लिए जाने वाले हर नीतिगत फैसले में अटॉर्नी जनरल (AG) और सॉलिसिटर जनरल (SG) को “सक्रिय रूप से शामिल” किया जाए।


मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं, ने स्पष्ट किया कि,

BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा का पद पर बने रहना किसी ऐसी व्यवस्था के रूप में नहीं माना जा सकता, जो वर्ष 2030 तक जारी रहेगी। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया कहा कि उनका पद केवल “प्रो-टेम” यानी अस्थायी व्यवस्था के तहत है, जब तक कि नए सिरे से गठित BCI अपने पदाधिकारियों का चुनाव नहीं कर लेती।

कोर्ट का यह हस्तक्षेप राज्य बार काउंसिलों के चुनाव से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आया। इन याचिकाओं में मिश्रा के BCI चेयरमैन पद पर बने रहने और ऐसे नोटिफिकेशन की वैधता को चुनौती दी गई थी, जिनमें चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन का कार्यकाल 2030 तक बढ़ाने की बात कही गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के ये निर्देश ऐसे समय में आए हैं, जब कुछ दिन पहले ही कोर्ट ने NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के विवाद में BCI के हस्तक्षेप की आलोचना की थी। BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने शुरुआत में राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि वे छात्रों का नामांकन न करें। यह कदम छात्रों द्वारा दीक्षांत समारोह में CJI को आमंत्रित किए जाने के विरोध में किए गए प्रदर्शन के बाद उठाया गया था। बाद में मिश्रा ने नामांकन पर लगाई गई रोक वापस ले ली और अंततः छात्रों के खिलाफ कार्यवाही भी बंद कर दी गई। इसके बाद मिश्रा ने अपने शब्दों या BCI की कार्रवाई से छात्रों को हुई तकलीफ के लिए उनसे माफी मांगी थी।

बुधवार को पीठ ने कहा कि उसकी तत्काल चिंता किसी व्यक्ति का आचरण नहीं, बल्कि BCI का संस्थागत कामकाज है। कोर्ट ने कहा कि राज्य बार काउंसिलों के चुनाव उसकी ओर से दिए गए निर्देशों के अनुसार हो चुके हैं और अब वैधानिक चुनावी व्यवस्था को बहाल करने की जरूरत है।

कोर्ट के सामने विवाद का एक प्रमुख मुद्दा 2025 में जारी BCI के वे नोटिफिकेशन थे,

जिनमें मनन कुमार मिश्रा और वाइस-चेयरपर्सन एस. प्रभाकरण का कार्यकाल पांच साल करने की बात कही गई थी। जबकि दलील दी गई कि BCI Rules के Rule 12(2) के तहत चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन का कार्यकाल केवल दो वर्ष निर्धारित है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने पीठ को बताया कि,

मिश्रा को 2 मार्च 2025 को सर्वसम्मति से चेयरमैन चुना गया था और उनका कार्यकाल 17 अप्रैल 2025 से शुरू होकर 16 अप्रैल 2030 तक बताया गया था। उन्होंने यह भी बताया कि 9 जनवरी 2025 के एक प्रस्ताव के जरिए चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन का कार्यकाल तीन वर्ष से बढ़ाकर पांच वर्ष करने की कोशिश की गई, जबकि नियमों में कार्यकाल केवल दो वर्ष निर्धारित है।

इस पर पीठ ने सवाल उठाया कि जब नियम दो साल का कार्यकाल निर्धारित करते हैं, तो ऐसा विस्तार कैसे प्रभावी हो सकता है। कोर्ट ने टिप्पणी की,

“दिलचस्प बात यह है कि इसमें कार्यकाल को तीन साल से बढ़ाकर पांच साल करने की बात कही गई है, जबकि नियम केवल दो साल का कार्यकाल निर्धारित करते हैं।”

दीवान ने Advocates Act की धारा 4(3) के प्रावधान पर भी सवाल उठाया। इस प्रावधान के तहत BCI के सदस्य तब तक अपने पद पर बने रह सकते हैं, जब तक उनके उत्तराधिकारी निर्वाचित नहीं हो जाते। उन्होंने तर्क दिया कि जिस प्रावधान का उद्देश्य केवल प्रशासनिक शून्य पैदा होने से रोकना था, उसका इस्तेमाल चुनाव टालने और मौजूदा पदाधिकारियों को पद पर बनाए रखने के लिए किया गया।

पीठ ने कहा कि,

यह प्रावधान केवल एक संक्रमणकालीन और अस्थायी व्यवस्था है। कोर्ट ने कहा कि अब जब राज्य बार काउंसिलों के चुनाव पूरे हो चुके हैं, तो इस प्रावधान को लेकर विवाद शायद आगे कायम नहीं रहना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब नवनिर्वाचित राज्य बार काउंसिलों को Advocates Act की धारा 4(1)(c) के तहत BCI के लिए अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करने की वैधानिक शक्ति का इस्तेमाल करना होगा। इसके बाद यही प्रतिनिधि BCI के चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन का चुनाव करेंगे।

पीठ ने सवाल किया,

“क्या इस बात में कोई संदेह है कि मौजूदा पदाधिकारी 2030 तक अनिश्चितकाल के लिए पद पर बने नहीं रह सकते?

कोर्ट ने BCI में शक्तियों के केंद्रीकरण से जुड़ी चिंताओं पर भी विचार किया। इनमें वर्तमान और पूर्व BCI पदाधिकारियों के नियंत्रण वाले ट्रस्टों के गठन और उनके कामकाज से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोप भी शामिल थे।

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने 2020 में बनाए गए Bar Council of India Trust for Promotion of Education, Legal and Professional Reforms and Improvement in Research (PEARL Trust) का उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रस्ट की डीड में 11 मैनेजिंग ट्रस्टियों को उनके BCI सदस्य बने रहने की अवधि से अलग, “मूल और स्थायी ट्रस्टी” बनाया गया है।

पीठ ने सवाल उठाया कि,

क्या BCI जैसी निर्वाचित संस्था अपनी संपत्तियों का इस्तेमाल ऐसा Trust बनाने के लिए कर सकती है, जिसमें कुछ व्यक्ति उस संस्था के सदस्य न रहने के बाद भी स्थायी रूप से ट्रस्टी बने रहें।

इसके बाद दीवान ने सुझाव दिया कि BCI के पुनर्गठन तक भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल, जो BCI के पदेन सदस्य हैं, उन्हें परिषद के हर महत्वपूर्ण फैसले में शामिल किया जाना चाहिए।

गौरतलब है कि पिछले दिनों BCI के उपाध्यक्ष ने अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। उन्होंने 150 करोड़ रुपये के फंड को एक निजी ट्रस्ट में ट्रांसफर करने की जांच कराने की मांग की थी। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के सह-अध्यक्ष वाई.आर. सदाशिव रेड्डी ने काउंसिल के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को पत्र लिखकर 15 दिनों के भीतर उनके इस्तीफे की मांग की थी। साथ ही उन्होंने काउंसिल के 150 करोड़ रुपये के फंड को एक निजी ट्रस्ट में ट्रांसफर करने, काउंसिल के पदों पर “परिवार के सदस्यों की नियुक्ति” और 2012 से मिश्रा के लगातार पद पर बने रहने जैसे मामलों की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की थी।

वरिष्ठ अधिवक्ता सी.यू. सिंह ने कहा कि फिलहाल चेयरमैन के कार्यालय से बिना व्यापक विचार-विमर्श के प्रस्ताव जारी किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश के दोनों शीर्ष कानून अधिकारियों की भागीदारी अंतरिम अवधि में एक संस्थागत नियंत्रण प्रदान करेगी। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को BCI के रोजमर्रा के कामकाज का हिस्सा बनने की जरूरत नहीं है। हालांकि, जब भी कोई महत्वपूर्ण नीतिगत फैसला लिया जाना हो, तब उन्हें इसमें शामिल किया जाना चाहिए।

BCI की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह और गुरु कृष्णकुमार ने इस व्यवस्था पर सहमति जताई।

कोर्ट ने कहा कि,

नए BCI के गठन तक मौजूदा व्यवस्था के तहत रोजमर्रा का कामकाज जारी रह सकता है। लेकिन “जब कोई नीतिगत फैसला लिया जाता है, तो अटॉर्नी जनरल जैसे स्वतंत्र रूप से काम करने वाले स्थायी पदेन सदस्य की भागीदारी आवश्यक है।”