आज भी हर 10 मिनट में होता है एक दलित का शोषण
एससी एसटी अत्याचार अधिनियम के तीन दशक बाद कितने बदले हालात?
आज़ादी पूर्व भारत में किस प्रकार से अस्पृश्य जातियां के साथ बर्ताव किया जा रहा था इस बात का जिक्र करने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी जिन्हें खोखले बयान बाजी करनी है उन्हें चाहिए कि एक बार गोलमेज सम्मेलन जरूर पढ़ें। आज बहुत से बेतुके लोग सोशल मीडिया तथा समाज में बयान बाजी करते फिरते हैं कि जब दलितों को हजारों साल पानी नहीं मिला तो वह जिंदा कैसे हैं। मेरी सलाह है की इतिहास का ज्यादा पन्ना पलटने की उन्हें जरूरत नहीं वे बस गोलमेज सम्मेलन में शामिल तत्कालीन राजनीतिज्ञों को पढ़ें।
यह वही गोलमेज सम्मेलन है जहां डॉ. अंबेडकर ने अस्पृश्यता पर सब की बोलती बंद कर दी थी और विश्व भर में आपके झूठे हिंदूत्ववाद की धज्जियाँ उड़ा दी थी। हिंदुओं के बीच छुपे हुए झूठे सड़ांध दुनिया के सामने खोलकर रख दिया था।
आजाद भारत में समानता लाने के लिए कानून में बहुत सारे प्रावधान किए गए जिससे पिछड़े और शोषित समाज को मुख्य धारा में लाया जा सके। कानून के इन्हीं मुख्य धाराओं और प्रावधानों की वजह से सामंतवादियों का वह जत्था जो शोषण करना, जुल्म करना और दूसरों पर अत्याचार करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता था। जो दूसरों के सुदखोरी और बेगारी पर जातीय दम्भ के कारण शासन करता था अब उसे कानून की यह नीतियां नागवार गुजर रही थी। उसे यह बर्दाश्त नहीं था कि जो समाज उसके आगे घुटने टेके हुए जिंदा गिड़गिड़ा रहा था अब वह उनके आंखों में आंखें मिलाकर बात करना चाहता है। अब तक वे मजदूर जातियों को जैसे रखना चाहते थे वैसे रखने में कामयाब थे लेकिन आजाद भारत में संवैधानिक अधिकारों की वजह से उन्हें अपनी जमींदारी, सामंती, वर्णवादी व्यवस्था टूटती हुई दिखाई दे रही थी जिसे वे आसानी से अपने हाथ से निकलता हुआ नहीं देख सकते थे। और फिर शुरू होती है मुफ्तखोर तथा कामगार जातियों के बीच संघर्ष। इस संघर्ष के कुछ उदाहरण यहाँ रख रहा हूँ।
1- इसका सबसे बड़ा उदाहरण तमिलनाडु में हुए 1968 का वह नरसंहार हैं जिसने आजाद भारत की आत्मा को लहू -लुहान कर दिया था। जिसे दुनिया भर में आज किलवेनमणि नरसंहार के नाम से जाना जाता है। बात मात्र कुछ रुपए मजदूरी बढ़ाने की थी। पर यह जमींदारों को इतना नागवार गुजरा कि उन्होंने दलितों के इस "जुर्रत" की ऐसी भयानक सजा देने की ठानी ताकि देश का कोई गरीब कभी भी किसी सामंती के खिलाफ आवाज ना उठा सके। 200 बंदूकधारी,लठैत 25 दिसंबर की आधी रात में पूरी झोपड़ियों की बस्ती को घेर लेते हैं और सबको घसीटकर- पीटकर जिंदा जलाकर मार देते हैं।

2- आपातकाल के बाद बिहार की राजधानी पटना के समीप बेलछी गांव में 27 मई 1977 को भूमि विवाद के चलते गांव के सामंती और जमींदार लोगों ने 11 दलितों को भूमि विवाद में हाथ पैर बांधकर जिन्दा जला दिया था। इस घटना ने तत्कालीन राजनीति में भूचाल ला दिया था। माना जाता है कि इसी घटना की वजह से इंदिरा गांधी फिर राजनीति में वापसी कर पाई थीं।
3- इस घटना के 3 साल बाद 18 नवम्बर 1981 उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के दिहुली गाँव में 24 से ज्यादा दलितों को डकैतों की एक टीम ( जिसमें सभी उच्च वर्ग के लोग शामिल थे ) ने अपने खिलाफ कुछ जाटवों के गवाही देने की वजह से दिनदहाड़े गोलियों से छलनी कर हत्या कर दी थी। बता दूँ कि फूलन देवी के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना भी इसी दौर में हुई थी और ओमप्रकाश वाल्मीकि की मशहूर कविता ठाकुर का कुआं भी इसी दौर में लिखी गई थी।
4- आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में करमचेडू नाम का एक गांव है जिसमें तथाकथित उच्च जातियां एवं दलित जातियां समान रूप से रहते थे। जैसा कि देशभर का इतिहास है इस गांव की भी सारी जमीने यहां की उच्च जातियों जिनमे कम्मा प्रमुख तौर से हावी थे उन्हीं का दबदबा था। मजदूरी और तालाबों में पानी के लिए दोनों समुदाय में हमेशा संघर्ष होता रहता था। 17 जुलाई 1985 को कम्मा (सवर्ण) जातियों के कुछ युवक दलितों की बस्तियों से लगे हुए उस तालाब में अपनी भैंस धोने लगे जहां से वह पानी पीते थे। जब इसका विरोध कुछ लड़कों और महिलाओं ने किया तो वे बुरा मान गए। और इस प्रकार रात में सुनियोजित तरीके से कई गांव के लोगों को इकट्ठा कर दलितों की बस्ती पर हमला किया, उनकी पत्नियों के साथ बलात्कार किया तथा दर्जनों लोगों की हत्या की।

“यह 1950 और 1990 के बीच ऐसी बड़ी और शर्मनाक दलित नरसंहार है जिससे सरकार दुनिया भर में अपनी मुंह छिपाती फिर रही थी। बाकी प्रतिदिन की जो छुआछूत,मारपीट अपमान, शोषण की घटनाएं थी उसका तो कोई हिसाब ही नहीं था। हफ्तों अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लोगों से मजदूरी करवाना और अपनी मजदूरी (कमाई )के लिए उनको गिड़गिड़ाने के लिए विवश करना,बड़े बाल रखने, मूंछ रखने, घोड़ी पर बैठने,अच्छे नाम रखने पर जब चाहा चौराहे पर पीट देना यह सब आम बातें थी। कारखाने के मजदूरी से लेकर खेत में कार्य करने तक वंचित समाज की स्त्रियों को सुबह शाम जमींदारों तथा तथा कथित उच्च जातियों के अपमानित शब्द, गलियां सब बर्दाश्त करना पड़ता था।”
संविधान निर्माता ने तो अनुच्छेद 17 के अनुसार अस्पृश्यता को पूर्णतः देश में अपराध घोषित कर दिया था। लेकिन हजारों साल से जिनकी मानसिकता रूढ़िवादी बन चुकी थी वह भला कहां सुधरने वाले थे। इसलिए इस तरह के नरसंहार देश में रुकने का नाम नहीं ले रहा था।
ऐसे अपराधों को रोकने के लिए सरकार ने 11 सितम्बर 1989 को अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार अधिनियम बिल प्रस्तुत किया और 30 जनवरी 1990 को यह कानून लागू होता है। 1990 और 1992 के मध्य भारत की राजनीति में बहुत उथल-पुथल हुई थी।
यह कानून लागू होने के बाद जब गिरफ्तारियां होने लगी तब तथा कथित उच्च जातियों को जिनमे पिछड़ी जातियाँ तथा मुस्लिम जातियां भी शामिल है सबको इस कानून की ताकत का अंदाजा होने लगा। इसलिए क्रिया और प्रतिक्रिया के बीच यह उन्माद और बढ़ने लगे। सामूहिक नरसंहार तो अब रुक गए लेकिन प्रतिदिन होने वाले शोषण बढ़ने लगे जिम मंदिरों में जाना, मूछ रखना, घोड़ी पर बैठना, राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए लड़ना, जैसे अपराध बढ़ने लगे खैरलांजी की घटना उसकी एक कड़ी है। दूसरी तरफ इन तथाकथित उच्च जातियों और दलितों से अपने आप को बड़ा समझने वाली जातियों ने इस एक्ट के फर्जीवाड़े पर आरोप लगाना आरंभ कर दिया। वें तर्क देने लगे की इस एक्ट का दलित समाज दुरुपयोग कर रहा है।
दरअसल आज तक जितने भी इस एक्ट के तहत मामले दर्ज होते हैं अमूमन उनमें न्याय की दर एक चौथाई से थी कम लोगों को मिल पाता है। वह भी दशकों लग जाते हैं। मान लीजिए किसी गांव में किसी दलित के साथ कोई अभद्र व्यवहार करता है मसलन उसकी बेटी की शादी में उत्पात मचाता है इससे अजीज जाकर दलित थाने में रिपोर्ट लिखवा देता है। मामले पर कार्रवाई होती है, फिर मामला छानबीन और मुकदमे में तब्दील हो जाता है। कुछ साल यह प्रक्रिया चलती है चूकी दोनों एक ही गांव के रहने वाले लोग हैं, इसलिए अन्य ग्रामीण लोग दोनों तरफ के लोगों को समझाने बुझाने का कार्य करते हैं।
अनुसूचित जाति और जनजातियों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्हें उन्हीं की खेतों में मजदूरी करना पड़ता है, उन्ही के खेतों में अपनी बहन बेटियों के बारात रखने पड़ते हैं। मजबूरी आने पर उन्ही से कर्ज लेना पड़ता है। इसलिए ज्यादा समय तक वह कानूनी प्रक्रिया सह नहीं पाते और अपने विपक्षी से कोर्ट के बाहर समझौता कर लेते है। ऐसे ही आंकड़ों को दिखाते हुए गैर दलित समाज इस एक्ट के दुरुपयोग की बात उठाते हैं वे इसी फर्जी बताने लगते है।
इन्हीं आंकड़ों के दबाव में आकर 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट के जज सुभाष महाजन की बेंच ने इस एक्ट में संशोधन करने की बात कही थी। जबकि इसी बीच ऊना कांड, रोहित वेमुला एवं पायल तडवी आत्महत्या कांड भी हुए थे। इस संशोधन का प्रमुख उद्देश्य यह था कि अब इस एक्ट के तहत तुरंत गिरफ्तारियां नहीं होगी। जिसका देशभर के दलित संगठनों ने पुरजोर विरोध किया था। आज आजाद पार्टी के जो प्रमुख है चंद्रशेखर आजाद जी उस वक्त उनकी भीम आर्मी नई थी परंतु उन्होंने पूरे देश भर में 2 अप्रैल 2018 को भारत बंद का आह्वान कर सरकार को घुटने पर ला दिया था जिससे कि सरकार को पीछे हटना पड़ा।

समाज के इस दोहरे चरित्र के बावजूद 14 सितम्बर 2020 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक वाल्मीकि लड़की की बलात्कार करके अपराधी फेंक देते हैं जिसका अस्पतालों में इलाज के दौरान 15 दिन बाद मौत हो जाती है। इस बलात्कार की घटना ने सरकार को हिला दिया था जिससे उत्तर प्रदेश की सरकार इतने दबाव में आ गई कि उसने पीड़िता की लाश तक घरवालों को नहीं सौंपी और प्रशासन ने यूं ही उस लड़की के शव को सरेआम सड़क पर जला दिया।

आज की सरकार जो दिन-रात हिंदू धर्म की दुहाई देती रहती है उसने एक पल भी नहीं सोचा की लड़की हिंदू है और हिन्दू विधान से उसका अंतिम संस्कार होना चाहिए।
13 अगस्त 2022 को राजस्थान के एक स्कूल में इंद्र कुमार मेघवाल नाम के 9 वर्ष से बच्चे को एक शिक्षक अपने मटके में रखें पानी को छूने पर इतनी बुरी तरह पीटता है कि बच्चा कुछ दिनों बाद मर जाता है। इस घटना के अगले ही महीने इस राजस्थान में राजेंद्र मेघवाल नाम के एक दलित नवयुवक को कुछ सरफिरे सिर्फ इसलिए मार देते हैं कि उन्हें उसका मूंछ हा रखना पसंद नहीं था।
क्या यह सब घटनाए एक विकसित भारत की पहचान हो सकती है? देश में आज भी हर दस मिनट में एक दलित का शोषण किया जाता है। हर वर्ष 57000 से ज्यादा दलित अपराध से जुड़े मामले थानों में दर्ज होते हैं। इससे तीन गुना ऐसे मामले हैं जो थाने तक पहुंचते ही नहीं पाते । जेन जी के बच्चों को यह एक्ट असमानता का प्रतीक लग सकता है। उनके दिल में हजार सवाल होंगे इस तरह के क़ानून के लिए। परंतु उन्हें यह सब समझने के लिए देश का इतिहास समझना होगा। देश में आज भी हो रहे हर ऐसे अत्याचार की पृष्ठभूमि पर सवाल उठाना होगा।
सवर्ण समाज में भी आज ऐसे बहुत से बच्चे हैं जो दलित बच्चों के साथ मिलजुल कर रहते हैं, वह मानते हैं कि अब हमारे बीच ऐसी कोई बात नहीं है, पर उनकी जिम्मेदारी इससे और आगे बढ़ जाती है। उन्हें ऐसे लोगों के खिलाफ भी आवाज उठाना होगा जो इस प्रकार के अपराधों में शामिल होते हैं।
जिस दिन गैर दलित समाज ऐसे अपराधियों का बहिष्कार करने लगेगा उस दिन हिंदू धर्म की कई समस्याए स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। गैर दलित समाज को यह समझना होगा कि रोज होने वाली हजार हत्याएं प्रशासनिक समस्या हो सकती हैं परंतु “एक मनुष्य होकर दूसरे मनुष्य को अपने से कमतर समझने की दुर्भावना से किया गया एक भी अपराध हजार अपराधों के बराबर है” और ऐसा जब तक होता रहेगा तब तक यह अधिनियम लागू रहेगा। अब यह गैर दलित समाज को तय करना है कि वें यह अधिनियम कब तक देश में देखना चाहते हैं।
Dr. Sanjeev Kumar
डॉ. संजीव कुमार श्री शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, दुर्ग (छत्तीसगढ़)में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। दलित विषय पर डॉक्टरेट हैं।
