लेखक हिन्दी साहित्य के अध्येता हैं, एक उपन्यास प्रकाशित। फ़िलहाल डेनमार्क की ओर्हुस यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं।
यह किताब पढ़ने की ढेरों वज़हें हैं, जहाँ एक ओर शहर जीते जागते लोगों की तरह हैं तो वहीं दूसरी ओर हिंदी स्मृति लोक का हिस्सा बन चुके लोग हमारे जीवन का हिस्सा बनने को हैं। अक्स पढ़कर लगता है कि हमारे वरिष्ठों के पास बताने को कितनी बातें, सुनाने को कितनी कहानियाँ है और हम समय के फेर में फँसे उन्हें सुनना मुल्तवी किए रहते हैं । “ वे हमारे बचपन और माँ के यौवन का दौर था” यह वाक्य शायद हिंदी में माँ पर लिखे गए सुंदरतम वाक्यों में से एक है और यह किताब सिर्फ़ इस एक वाक्य के लिए भी बार बार पढ़ी जा सकती है ।
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