उत्तराखंड में 2017 में बीजेपी की सरकार आने के बाद से 40 प्रतिशत मदरसे किए गए बंद
उत्तराखंड में पिछले 9 सालों से भाजपा की सरकार है और इन नौ सालों में 40 प्रतिशत मदरसों को बंद कर दिया गया।
उत्तराखंड में पिछले 9 सालों से भाजपा की सरकार है और इन नौ सालों में एक सुनियोजित योजना के तहत राज्य के 40 प्रतिशत मदरसों को बंद कर दिया गया। The Observer Post की एक रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में पुराने सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करीब चार में से दो मदरसे अब संचालित नहीं हो रहे हैं।
राज्य सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार,
पंजीकृत 452 मदरसों में से 179 बंद हो चुके हैं। यह संख्या कुल पंजीकृत मदरसों का लगभग 39.60 प्रतिशत है। वहीं, नियमों के उल्लंघन के कारण 19 अन्य मदरसों को सील किया गया है।
ये आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं,
जब उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मान्यता देने की व्यवस्था में बड़े बदलाव किए हैं।
हालांकि, उपलब्ध सरकारी आंकड़ों से यह स्पष्ट नहीं है कि बंद और सील किए गए सभी मदरसे पहले पंजीकृत 452 मदरसों की सूची में ही शामिल थे या इन अलग-अलग श्रेणियों में कुछ संस्थानों के नाम एक-दूसरे से मेल खाते हैं।
पुरानी व्यवस्था के तहत उत्तराखंड में कुल 452 मदरसे पंजीकृत थे। इनमें से 179 मदरसों के बंद होने के बाद राज्य में मदरसा शिक्षा और इससे जुड़े संस्थानों के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। इसके अतिरिक्त 19 मदरसों को निर्धारित नियमों और मानकों का पालन नहीं करने के कारण प्रशासन ने सील कर दिया है।
राज्य सरकार ने 3 फरवरी 2026 को उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया था। इस नए प्राधिकरण ने उत्तराखंड मदरसा बोर्ड की जगह ली है। अब राज्य में मदरसों सहित अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों को मान्यता देने की जिम्मेदारी इसी प्राधिकरण के पास है। नई व्यवस्था लागू होने के बाद शिक्षा विभाग ने संक्रमणकाल के दौरान एक अलग प्रक्रिया के तहत मदरसों के मान्यता आवेदनों पर कार्रवाई शुरू की। अभी तक केवल 30 मदरसों को राज्य के शिक्षा विभाग से मान्यता मिल सकी है। यह संख्या पुरानी व्यवस्था के तहत पंजीकृत 452 मदरसों का करीब 6.6 प्रतिशत है।
वहीं, 134 मदरसों ने शिक्षा विभाग के समक्ष मान्यता प्राप्त करने के लिए आवेदन किया है। इन आवेदनों की फिलहाल जांच और समीक्षा की जा रही है। इसके अलावा 54 मदरसों ने अभी तक मान्यता के लिए आवेदन ही नहीं किया है। ऐसे में इन संस्थानों की भविष्य की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि वे निर्धारित समय के भीतर आवेदन करते हैं या नहीं और सरकार द्वारा तय नियमों एवं शैक्षणिक मानकों को पूरा कर पाते हैं या नहीं।
शिक्षा विभाग द्वारा दी गई मान्यता से अलग नवगठित उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने भी 35 अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मान्यता प्रदान की है। इनमें 33 मदरसे और अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा संचालित दो अन्य शिक्षण संस्थान शामिल हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि प्राधिकरण से मान्यता प्राप्त इन 35 संस्थानों का आंकड़ा शिक्षा विभाग द्वारा मान्यता दिए गए 30 मदरसों से अलग है।
इसका अर्थ है कि शिक्षा विभाग और नवगठित प्राधिकरण द्वारा दी गई मान्यताओं को एक ही श्रेणी में नहीं रखा गया है। दोनों के आंकड़ों को जोड़ने से पहले यह समझना जरूरी है कि ये मान्यताएं अलग-अलग प्रक्रियाओं के तहत जारी की गई हैं। सरकार की ओर से अभी इस बारे में विस्तृत जानकारी नहीं दी गई है कि भविष्य में इन दोनों प्रक्रियाओं को किस प्रकार एकीकृत किया जाएगा।
राज्य सरकार ऐसे मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की भी निगरानी कर रही है, जो निर्धारित नियामक व्यवस्था से बाहर संचालित हो रहे हैं। सरकार का कहना है कि बिना आवश्यक मान्यता या नियमों का पालन किए चलने वाले संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
उत्तराखंड के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के विशेष सचिव पराग मधुकर धकाते ने बताया कि,
विभाग को जैसे-जैसे आवेदन प्राप्त हो रहे हैं, उनकी जांच की जा रही है।अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों से प्राप्त आवेदनों के आधार पर मान्यता देने की प्रक्रिया चल रही है। नियमों का उल्लंघन करते हुए संचालित पाए जाने वाले मदरसों और अन्य संस्थानों को बंद करने की कार्रवाई भी की जा रही है।
अब अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन 134 मदरसों के आवेदनों की जांच करना है, जिन्होंने नई व्यवस्था के तहत मान्यता मांगी है। इन संस्थानों को मान्यता देने से पहले यह देखा जाएगा कि वे सरकार द्वारा निर्धारित शैक्षणिक, प्रशासनिक और बुनियादी ढांचे से जुड़े मानकों को पूरा करते हैं या नहीं।
आने वाले दिनों में इन आवेदनों की जांच पूरी होने के बाद उत्तराखंड में मान्यता प्राप्त मदरसों की संख्या बढ़ सकती है। दूसरी ओर, नियमों का पालन नहीं करने वाले संस्थानों को बंद या सील करने की कार्रवाई भी जारी रहने की संभावना है। नई व्यवस्था के पूरी तरह लागू होने के बाद ही राज्य में संचालित मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की वास्तविक संख्या और उनकी मान्यता की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।