हिटलर का आखिरी जन्मदिन
हिटलर का जन्मदिन राष्ट्रीय उत्सव की तरह मनाया जाता था लेकिन आखिरी जन्मदिन पर विनाश का उत्सव मन रहा था
20 अप्रैल 1889 को हिटलर ऑस्ट्रिया के छोटे से क़स्बे में कस्टम विभाग के एक कर्मचारी की तीसरी पत्नी के तीसरे बच्चे के रूप में जन्मा था।
उसके दादा जोहान जार्ज हिडलर एक घुमंतू चक्की वाले थे जिन्होंने जब अपनी तीसरी शादी मारिया आना शिकलग्रबर से 1837 में की तो उसका पाँच साल का बेटा एलिओस भी साथ आ गया, चूँकि वह अवैध संतान था तो उसे माँ का जातिनाम मिला और वह अगले 44 वर्षों तक एलिओस शिकलग्रबर के नाम से ही जाना जाता रहा। 1847 में मारिया की मृत्यु के बाद जोहान तीस साल तक ग़ायब रहा और 84 की उम्र में जब नमूदार हुआ तो उसके नाम की वर्तनी बदलकर हिटलर हो गई थी। जोहान ने अब एलिओस को अपना नाम देना निश्चय किया और 23 नवंबर 1876 को डोलरशाइम के पैरिश पुजारीने बपतिस्मा रजिस्टर में उसका नाम एलिओस हिटलर के रूप में दर्ज किया जिसके बाद उसे विरासत में अपने एक चाचा की संपत्ति मिल सके।
यहीं से एडोल्फ़ को अपना उपनाम 'हिटलर' मिला था।
सत्ता में आने से पहले तक तो उसके जन्मदिन मनाने का कोई खास रिफ्रेंस नहीं मिलता लेकिन सत्ता में आने के बाद सादगी का दावा करने वाले हिटलर का जन्मदिन नाजी जर्मनी में एक राष्ट्रीय उत्सव की तरह मनाया जाने लगा। 20 अप्रैल का यह दिन धीरे-धीरे नाज़ी शासन के व्यक्तिपूजक राजनीतिक संस्कार का हिस्सा बन गया था। शासन ने हिटलर की छवि को राष्ट्र, राज्य और जर्मन भविष्य के साथ इस तरह जोड़ दिया था कि उसके जन्मदिन का समारोह भी राजनीतिक निष्ठा प्रदर्शित करने का अवसर बन गया।

यह दिन विशेष रूप से युवाओं के लिए महत्वपूर्ण बनाया गया। Hitlerjugend यानी हिटलर यूथ और Bund Deutscher Mädel यानी जर्मन लड़कियों के संगठन के सदस्य इस अवसर पर आयोजित समारोहों, परेडों और सामूहिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। 20 अप्रैल को युवाओं के लिए हिटलर के प्रति निष्ठा व्यक्त करने और संगठन में नए सदस्यों को शामिल करने के अवसर के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता था।
जन्मदिन के समारोहों में सबसे महत्वपूर्ण तत्व था सामूहिक प्रदर्शन। शहरों और कस्बों को नाज़ी झंडों, बैनरों और हिटलर के चित्रों से सजाया जाता था। सार्वजनिक स्थानों पर सभाएँ होतीं और नाज़ी संगठन अपनी वर्दियों में मार्च करते। रेडियो, समाचार-पत्र और प्रचार माध्यम हिटलर के जन्मदिन को व्यापक रूप से प्रचारित करते और उसके जीवन तथा कथित उपलब्धियों को जर्मन राष्ट्र के गौरव से जोड़ते। नाज़ी प्रचार व्यवस्था का उद्देश्य यही था कि नागरिकों को हिटलर केवल सरकार के प्रमुख के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र की नियति के प्रतीक के रूप में दिखाई दे।
स्कूलों में भी इस दिन का विशेष महत्व था। जर्मन बच्चों को हिटलर के प्रति प्रेम, आज्ञाकारिता और निष्ठा सिखाई जाती थी। पाठ्यपुस्तकों और कक्षा की गतिविधियों में Führer के प्रति समर्पण को सामान्य नागरिक गुण के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। हिटलर का चित्र कक्षाओं में सामान्यतः मौजूद रहता था। इस प्रकार जन्मदिन का आयोजन बच्चों के लिए केवल उत्सव नहीं, बल्कि राजनीतिक शिक्षण और वैचारिक प्रशिक्षण का भी माध्यम बन जाता था।

नाजी पार्टी के युवा संगठन Hitlerjugend के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण अवसर था। युवा सदस्य वर्दी पहनकर सामूहिक कार्यक्रमों में शामिल होते, मार्च करते, राष्ट्रवादी गीत गाते और हिटलर के प्रति निष्ठा की शपथ लेते। नाज़ी नेतृत्व के लिए ऐसे समारोहों का उद्देश्य एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना था जो Führer और राष्ट्र के प्रति बिना सवाल किए आज्ञाकारी रहे और भविष्य में सैनिक तथा पार्टी कार्यकर्ता बने। 1939 तक 10 से 18 वर्ष की आयु के 82 प्रतिशत से अधिक योग्य युवाओं का संबंध Hitlerjugend या उसके महिला संगठन से हो चुका था।
1939 में उसका 50 वां जन्मदिन राष्ट्रीय उत्सव की तरह मनाया गया। उसके मंत्रिमंडल के सदस्यों ने उसकी तारीफ़ में लम्बे-लम्बे भाषण दिया। बेहद महंगे उपहार दिए गए। देश भर में रैलियाँ निकाली गईं। हर गाँव/क़स्बे/शहर में केक काटे गए। हिटलर जैसे जर्मनी के भगवान में तब्दील हो गया। बर्लिन को दुल्हन की तरह सजाया गया।

इस पूरे आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि हिटलर का जन्मदिन निजी और सार्वजनिक के बीच की सीमा को मिटा देता था। जन्मदिन के बहाने राज्य नागरिकों से अपनी राजनीतिक निष्ठा प्रदर्शित करवाता था। परेड, झंडे, भाषण, रेडियो प्रसारण, स्कूल समारोह और युवाओं की शपथ, सब मिलकर एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति बनाते थे जिसमें Führer के प्रति निष्ठा को जर्मन राष्ट्र के प्रति निष्ठा के बराबर स्थापित किया जाता था। यही नाज़ी व्यक्तिपूजा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक थी।
आखिरी जन्मदिन
20 अप्रैल 1945 को हिटलर का 56वां जन्मदिन आया तो जर्मनी सोवियत संघ में बड़ी हार का सामना कर रहा था और उस दिन मित्र देशों की सेनाएं बर्लिन पर भारी बमबारी कर रही थीं और हिटलर अपने बंकर में छिपा था।

उसके मंत्रिमंडल के सबसे क़रीबी सदस्य हिमलर, रिबनट्रॉप और गोर्रिंग अपनी लूट के साथ उससे दूर जा चुके थे। गोर्रिंग और हिमलर तो मित्र सेना से संपर्क करके हिटलर को किनारे लगाने और सत्ता की बागडोर अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहे थे। हिटलर ने इसे गद्दारी माना और जल्द ही एस एस ने गोर्रिंग को गिरफ़्तार कर लिया गया।
बचा सिर्फ़ गोएबल्स था। हिटलर ने उसे अपनी पत्नी और छह बच्चों को बमबारी से बर्बाद घर से अपने सुरक्षित बंकर में लाने को कहा। कुछ ज़रूरी काग़ज़ात जला दिए गए। हिमलर के मित्र सेना से संपर्क की ख़बर उसे मिल चुकी थी लेकिन अब वह कुछ कर नहीं सकता था। रूसी सेना लगातार उसके क़रीब पहुँच रही थी।

बंकर में उसकी प्रेमिका इवा भी थी। इवा ने उससे सिर्फ़ एक इच्छा जताई थी- पत्नी के रूप में उसके साथ मरना। हिटलर ने यह इच्छा पूरी की। 29 अप्रैल 1945 को गोएबल्स ने बंकर में वाल्टर वैगनर नामक नगरपालिका कर्मचारी को बुलाया। वर वधू ने शादी के समय वचन दिया कि वे ‘शुद्ध आर्य नस्ल’ के हैं और उनमें शादी के समय कोई ‘आनुवंशिक’ बीमारी नहीं है। शैम्पेन आई, शाकाहारी पकवान बने और हिटलर ने अपना आख़री भाषण दिया। इसके बाद वह अपने कमरे में चला गया और उसने अपनी वसीयत लिखवाई। अब भी वह द्वितीय विश्वयुद्ध के सारे विनाश के लिए ख़ुद को नहीं, यहूदियों को ही ज़िम्मेदार ठहरा रहा था।
गोएबल्स को उसने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। उसी रात बुरी ख़बरों की फ़ेहरिस्त में एक और ख़बर आई कि इटली में मुसोलिनी और उसकी प्रेमिका क्लारा पेटाकी को खंभे से लटकाकर मार दिया गया है। हिटलर ऐसी मौत नहीं मरना चाहता था। सबसे पहले उसने अपने प्रिय अलशीसियन कुत्ते ब्लॉन्डी को ज़हर दिया और दूसरे दो कुत्तों को गोली मार दी। दो महिला सचिवों को रूसियों के हाथ पड़ने पर उपयोग के लिए ज़हर के कैप्सूल दिए और 30 अप्रैल 1945 को सुबह 2.30 बजे उसने सबसे हाथ मिलाया। मौत सामने थी और उसके स्टाफ ने एक आख़री जश्न मनाया।
शाम साढ़े तीन बजे हिटलर इवा के साथ अपने कमरे में गया। बाहर खड़े गोएबल्स और कुछ अन्य साथियों ने ख़ामोशी से एक गोली चलने की आवाज़ सुनी। जब वे अंदर गए तो लाखों जर्मनो को नफ़रत और युद्ध की आग में झोंकने वाला फ्यूहरर मृत पड़ा था, इवा ने ज़हर खाना चुना था। बाहर गूंज रही रूसी तोपों की आवाज़ जैसे हिटलर के अंत का जश्न मना रही थी। उसके आदेश के अनुसार उसकी लाश बाहर पार्क में गैसोलीन डालकर जला दी गई।
गोएबल्स ने रूसियों से बातचीत की आख़री कोशिश की और फिर जब वह समझ गया कि किसी समझौते की कोई उम्मीद नहीं है तो जर्मनी के एक दिन के इस चांसलर ने पत्नी और बच्चों सहित ज़हर ख़ाकर जान दे दी। हज़ार वर्षों का का सपना देखने वाली हिटलर की तीसरी राईष उसके मौत के हफ़्ते भर के अंदर नष्ट हो गई। बर्लिन ने लाल सेना की हिंसा, तबाही और बलात्कार का नंगा नाच देखा।

तानाशाहों के बारे में और जानकारी के लिए मेरी किताब 'बीसवीं सदी के तानाशाह' पढ़ सकते हैं।