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पश्चिम बंगाल उपचुनाव में ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार को दिया समर्थन

TCN Desk TCN Desk | 59m ago · 6 min read
पश्चिम बंगाल उपचुनाव में ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार को दिया समर्थन

नए नाम और निशान पर भड़कीं ममता बनर्जी, कहा- यह राजनीतिक बदले की कार्रवाई

पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शुक्रवार को तृणमूल कांग्रेस के आंतरिक गुटीय विवाद से जुड़े घटनाक्रम को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ‘‘काला दिन’’ बताया। उनकी यह प्रतिक्रिया उनके खेमे की नंदीग्राम उपचुनाव प्रत्याशी के नामांकन वापस लेने के बाद आई। ममता ने कहा कि उनका खेमा अब नंदीग्राम के साथ-साथ असम में भी कांग्रेस का समर्थन करेगा।

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए ममता ने कहा कि,

उनका खेमा संवैधानिक पद का अनादर नहीं करता, लेकिन उन्होंने पूरे घटनाक्रम को ‘‘असंवैधानिक, गैरकानूनी, अलोकतांत्रिक और एक राजनीतिक दल के अहंकार को संतुष्ट करने के लिए की गई पूरी तरह पक्षपातपूर्ण बदले की कार्रवाई’’ बताया।

ममता ने आगे कहा कि,

हम संवैधानिक पद का अनादर नहीं करते, लेकिन हमें लगता है कि आज का दिन हमारे लोकतांत्रिक इतिहास का काला दिन है। देश में जो कुछ हो रहा है, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण, असंवैधानिक, गैरकानूनी और अलोकतांत्रिक है। यह एक राजनीतिक दल के अहंकार को संतुष्ट करने के लिए की गई पूरी तरह पक्षपातपूर्ण बदले की कार्रवाई है।’


ममता ने यह भी आरोप लगाया कि उनके गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न नहीं रखने देने की चेतावनी पहले ही दे दी गई थी।

ममता ने आगे कहा कि,

उन्होंने पहले ही कहा था—‘नाम भी नहीं रखने दूंगा, निशान भी नहीं रखने दूंगा।’ ये लोग कौन हैं? आज वे सत्ता में हैं, लेकिन कल सत्ता में नहीं भी रह सकते। उन्हें अपनी सीमाएं समझनी चाहिए।’’

ममता का यह बयान उनके खेमे की नंदीग्राम उपचुनाव प्रत्याशी संचिता प्रधान डे द्वारा शुक्रवार को नामांकन वापस लिए जाने के बाद आया। नामांकन वापस लेने की अंतिम तारीख शनिवार थी। इससे पहले चुनाव आयोग ने एक अंतरिम आदेश जारी कर तृणमूल कांग्रेस के दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों द्वारा ‘‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’’ नाम और उसके पारंपरिक ‘‘घास पर दो फूल’’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी।

इसके बाद चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’’ नाम और ‘‘फुटबॉल खिलाड़ी’’ चुनाव चिह्न आवंटित किया। इस गुट को पश्चिम बंगाल, मेघालय और त्रिपुरा में मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल माना जाएगा।
वहीं, अरूप रॉय के नेतृत्व वाले गुट को ‘‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’’ नाम और ‘‘लिफाफा’’ चुनाव चिह्न दिया गया।

संचिता प्रधान डे ने पूर्व राज्य मंत्री अखिल गिरि की मौजूदगी में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट की उम्मीदवार के रूप में नंदीग्राम से अपना नामांकन दाखिल किया था। शुक्रवार को डे ने कोलकाता में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से भी मुलाकात की। नामांकन वापसी की अंतिम तारीख से एक दिन पहले हुई इस मुलाकात को बदलते चुनावी समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है।



उन्होंने कहा,

वे नहीं जानते कि मैं ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस को नहीं छोड़ सकती। जब तक मैं इस दुनिया में हूं, यह हमेशा मेरे साथ रहेगी। यह बिल्कुल गंदा खेल है, लेकिन हम भी इसका मुकाबला करने के लिए तैयार हैं। मैं चाहती हूं कि भाजपा भारत की सत्ता से बाहर हो। हम इंडिया गठबंधन में एकजुटता चाहते हैं।’

ममता ने आगे कहा, ‘‘नंदीग्राम में हम कांग्रेस पार्टी का समर्थन करेंगे। यह देश के व्यापक हित में है। रेजीनगर पर मैं बाद में फैसला करूंगी। असम में हम चुनाव नहीं लड़ रहे हैं।’ ममता बनर्जी ने भाजपा पर ‘‘वोट चोरी’’ और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगाते हुए कहा कि यह बेहद दुखद स्थिति है। उन्होंने कहा, ‘‘हमसे पहले उद्धव ठाकरे को भी इसी तरह की स्थिति का सामना करना पड़ा था। मेरे मन में ऐसे किसी व्यक्ति के लिए कोई सम्मान नहीं है, जो केवल भाजपा के अहंकार को संतुष्ट करने में लगा हुआ है।’’

यह पूरा घटनाक्रम चुनाव आयोग के उस अंतरिम आदेश के बाद सामने आया है, जिसमें तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों के लिए पार्टी के पारंपरिक नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई। इसके बाद दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए गए।

सूत्रों के मुताबिक, ममता बनर्जी गुट ने पार्टी के नाम के लिए तीन विकल्प दिए थे। इनमें ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ भी शामिल था। चुनाव चिह्न के लिए गुट ने दो विकल्प—फुटबॉल खिलाड़ी और क्रिकेट का बल्ला—सुझाए थे। दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए अरूप रॉय गुट ने दो नाम प्रस्तावित किए थे—जातीयताबादी तृणमूल कांग्रेस’, जिसका अर्थ राष्ट्रवादी तृणमूल कांग्रेस है, और गणतांत्रिक तृणमूल कांग्रेस, यानी डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस। इस गुट ने चुनाव चिह्न के लिए ब्लैकबोर्ड, लिफाफा और मशाल के विकल्प दिए थे। चुनाव आयोग ने आखिरकार डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न को मंजूरी दी।

आयोग ने कहा कि,

विवाद पर अंतिम फैसला आने तक दोनों गुटों को पार्टी का नाम और ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होगी।

तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न पर रोक लगाने का चुनाव आयोग का फैसला ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। बागी गुट ने इस फैसले का स्वागत किया है, जबकि भाजपा ने दावा किया कि ममता बनर्जी की पार्टी अब “मृत्युशय्या पर” है। वहीं, ममता के समर्थकों ने आयोग के फैसले को “गैरकानूनी” करार दिया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट इस साल हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार और उसके बाद पार्टी में हुई बगावत से उबरने की कोशिश कर रहा है। ऐसे समय में पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न गंवाने से उनकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।

नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होने हैं। दुर्गा पूजा के बाद कोलकाता नगर निगम और हावड़ा नगर निगम के चुनाव भी कराए जाएंगे। ममता बनर्जी गुट और बागी गुट ने दोनों विधानसभा उपचुनावों में अपने-अपने उम्मीदवार उतारे हैं।

चुनाव आयोग के फैसले के बाद कांग्रेस ने ममता बनर्जी का समर्थन किया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि भाजपा और चुनाव आयोग राजनीतिक दलों को तोड़ने के लिए एक ही तरीके का इस्तेमाल करते हैं।


राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर लिखा,

पहले शिवसेना, फिर एनसीपी और अब तृणमूल कांग्रेस। हर बार वही तरीका—भाजपा और चुनाव आयोग मिलकर एक पार्टी को तोड़ते हैं और फिर उसका चुनाव चिह्न छीन लिया जाता है। जब पूरी पार्टी चोरी हो सकती है, तो करोड़ों भारतीयों के वोटों की चोरी होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। वोट चोरी, सरकार चोरी और अब पार्टी चोरी—ये हमारे लोकतांत्रिक पतन के प्रतीक बन गए हैं।

उन्होंने आगे लिखा,

चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी जनादेश की रक्षा करना है, लेकिन इसके बजाय वह उन ताकतों की सहायता कर रहा है जो जनता के फैसले को पलटती हैं। यह लड़ाई केवल ममता बनर्जी की नहीं है। यह हर राजनीतिक दल और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव चाहने वाले प्रत्येक मतदाता की लड़ाई है।

वहीं, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दोनों गुटों को अलग-अलग चुनाव चिह्न मिलने संबंधी एक मीडिया रिपोर्ट साझा करते हुए लिखा, “अगर चुनाव आयोग लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने वाले फैसले लेता है, तो उसकी प्रतिष्ठा और सम्मान बढ़ेगा। बाकी कुछ नहीं कहना है… केवल एक सवाल है—क्या चुनाव आयोग को हमारे द्वारा जमा किए गए हलफनामे मिल गए हैं?”