नंदीग्राम के घटनाक्रम से भाजपा की हताशा की पोल खुल गई है?
एक विधानसभा सीट के लिए इतना दंद-फंद?
पश्चिम बंगाल में पिछले दो दिनों में
- पहले तृणमूल कांग्रेस से उसका चुनावी सिंबल छीन लिया गया।
- फिर उसके उम्मीदवार ने मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी से मुलाक़ात की और अचानक नामांकन वापस ले लिया।
- ममता बनर्जी ने इसके बाद कांग्रेस उम्मीदवार के समर्थन का ऐलान किया।
- और इस ऐलान की स्याही सूखी भी नहीं थी कि वर्षों पुराने मामले में कांग्रेसी उम्मीदवार मिलन प्रधान को वर्षों पुराने के मामले गिरफ्तार कर लिया गया।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले कुछ दिनों में घटनाओं का यह सिलसिला इतना तेज़ रहा है कि नंदीग्राम का उपचुनाव अब केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं रह गया है। यह चुनावी संस्थाओं, दलों के भीतर चल रहे संघर्ष और सत्ता तथा विपक्ष के बीच बदलते राजनीतिक समीकरणों का भी परीक्षण बन गया है।
सबसे पहले बात उस फैसले की, जिसने पूरे विवाद की शुरुआत की। चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को तृणमूल कांग्रेस के पारंपरिक नाम ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और उसके चुनाव चिह्न ‘फूल और घास’ को अंतरिम रूप से फ्रीज़ कर दिया। आयोग के सामने ममता बनर्जी और दूसरे गुट के बीच पार्टी के संगठनात्मक नियंत्रण और नाम-चिह्न पर दावा था। आयोग ने अंतिम फैसला आने तक दोनों गुटों को अलग नाम और चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने का निर्देश दिया। ममता बनर्जी के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ का चुनाव चिह्न दिया गया, जबकि दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफ़ाफ़ा’ चिह्न मिला।
यह फैसला महज़ चुनाव चिह्न बदलने का मामला नहीं है। तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक पहचान पिछले 28 वर्षों से ‘फूल और घास’ के साथ जुड़ी रही है। इसलिए चुनाव से ठीक पहले इस पहचान का इस्तेमाल न कर पाना पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और संगठनात्मक चुनौती है। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के फैसले की आलोचना की है और इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है। दूसरी ओर, आयोग का कहना है कि दो गुटों के बीच मूल पार्टी के नाम और चिह्न पर विवाद के कारण अंतरिम व्यवस्था आवश्यक थी।
इसके तुरंत बाद नंदीग्राम में दूसरा बड़ा घटनाक्रम हुआ। ममता बनर्जी के गुट ने कुछ दिन पहले ही संचिता प्रधान डे को नंदीग्राम से उम्मीदवार बनाया था। लेकिन 18 सितंबर को उन्होंने अपना नामांकन वापस ले लिया। नामांकन वापस लेने से पहले उनकी भाजपा नेता और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात हुई थी। उपलब्ध रिपोर्टों में साफ़ है कि इस मुलाक़ात के बाद ही उन्होंने नाम वापस लिया है।
इस घटनाक्रम के बाद ममता बनर्जी ने नंदीग्राम में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने की घोषणा की। उन्होंने कांग्रेस को ‘सिस्टर पार्टी’ बताया और कहा कि यह फैसला INDIA गठबंधन को मज़बूत करने की दिशा में है। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि कांग्रेस ने ममता बनर्जी से समर्थन नहीं माँगा था और समर्थन की घोषणा उनका अपना राजनीतिक फैसला था। इस तरह ममता का कदम केवल नंदीग्राम के चुनावी समीकरण से जुड़ा नहीं था, बल्कि विपक्षी दलों के बीच बदलते संबंधों का भी संकेत था।
लेकिन इसके कुछ ही घंटों बाद घटनाक्रम ने एक और मोड़ ले लिया। कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को पश्चिम बंगाल पुलिस ने एक पुराने मामले में गिरफ्तार कर लिया। रिपोर्टों के अनुसार मामला 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़े एक हत्या प्रकरण का है। गिरफ्तारी का समय इसलिए राजनीतिक चर्चा का विषय बना क्योंकि यह ममता बनर्जी की ओर से प्रधान को समर्थन देने की घोषणा के बाद हुई। कांग्रेस ने इस कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध बताया है। दूसरी ओर, गिरफ्तारी के कानूनी आधार और पुराने मामले की न्यायिक स्थिति को अलग प्रश्न के रूप में देखना आवश्यक है। केवल घटनाओं के क्रम के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कि गिरफ्तारी राजनीतिक कारणों से ही हुई, अपने आप में स्थापित तथ्य नहीं है।
यहीं से नंदीग्राम की कहानी दिलचस्प और जटिल हो जाती है। एक ओर चुनाव आयोग का पार्टी के नाम और चिह्न को लेकर अंतरिम फैसला है। दूसरी ओर ममता गुट के उम्मीदवार का अचानक चुनाव मैदान से हट जाना है। उसके बाद कांग्रेस को समर्थन और फिर कांग्रेस उम्मीदवार की गिरफ्तारी है। अलग-अलग घटनाओं को यदि अलग-अलग देखा जाए तो हर घटना की अपनी संस्थागत और कानूनी व्याख्या हो सकती है। लेकिन जब वे इतने कम समय में एक के बाद एक घटती हैं, तो स्वाभाविक रूप से राजनीतिक सवाल उठते हैं।
इन घटनाओं का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है कि नंदीग्राम का चुनाव अब केवल भाजपा बनाम तृणमूल या भाजपा बनाम कांग्रेस की सीधी लड़ाई के रूप में नहीं देखा जा सकता। पार्टी विभाजन, चुनाव चिह्न का विवाद, उम्मीदवार का नामांकन वापस लेना, विपक्षी समर्थन और पुराने आपराधिक मामले में गिरफ्तारी, इन सबने चुनाव को कहीं अधिक जटिल बना दिया है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक संस्था की कार्रवाई का परीक्षण उसके समय, प्रक्रिया और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए। चुनाव आयोग के फैसले का परीक्षण उसके संवैधानिक और वैधानिक आधार पर, उम्मीदवार की नाम वापसी का उसके अपने निर्णय और परिस्थितियों के आधार पर तथा गिरफ्तारी का कानून और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। लेकिन राजनीतिक लोकतंत्र में केवल कानूनी प्रक्रिया ही पर्याप्त नहीं होती। संस्थाओं की निष्पक्षता में जनता का विश्वास भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
2007 के मामले में 2026 में गिरफ़्तारी पर टिप्पणी करते हुए पूर्व आई पी एस आर के विज ने लिखा
किसी पुराने प्रकरण में, लम्बे समय बाद, बिना किसी नए evidence के अचानक arrest करना, unless की व्यक्ति फ़रार हो, कोर्ट ने सामन्यतः आपत्ति की है.
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