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संडे स्पेशल: शेर सिंह की दगाबाज़ी, सेठ साहब की सादगी और करोड़ों का स्टेल्थ 'चश्मा'!

Athar Kalim Ahmed/S.R.Husaini Athar Kalim Ahmed/S.R.Husaini | 1h ago · 7 min read
संडे स्पेशल: शेर सिंह की दगाबाज़ी, सेठ साहब की सादगी और करोड़ों का स्टेल्थ 'चश्मा'!

यह व्यंग्यात्मक कॉलम अंतरराष्ट्रीय राजनीति के ताज़ा घटनाक्रम—विशेषकर अमेरिका, सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच चल रहे कूटनीतिक दोहरेपन पर एक करारा तंज़ है।

यह व्यंग्यात्मक कॉलम अंतरराष्ट्रीय राजनीति के ताज़ा घटनाक्रम—विशेषकर अमेरिका, सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच चल रहे कूटनीतिक दोहरेपन पर एक करारा तंज़ है। चूँकि इस गंभीर वैश्विक मुद्दे को एक स्थानीय मोहल्ले की कहानी (Allegory) में ढाल दिया गया है, इसलिए कॉलम का पूरा लुत्फ़ उठाने के लिए इसके किरदारों का असल संदर्भ (Context) समझना ज़रूरी है:-

पात्र परिचय:-

  1. शेर सिंह (लालची चौकीदार):यह अमेरिका (विशेषकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी हथियार बेचने की नीति) का प्रतीक है।
  2. सेठ साहब: यह सऊदी अरब का प्रतीक है, जो अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर आँख मूंदकर भरोसा करता है।
  3. बब्बन कबाड़ी (गुलेल वाला आवारा लड़का):यह यमन के हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) का प्रतीक है, जो सस्ते ड्रोन्स और देसी मिसाइलों से बड़े हमले करते हैं।
  4. करोड़ों का स्टेल्थ 'सफेद हाथी': यह हाल ही में अमेरिका द्वारा सऊदी अरब को बेचे गए 24.3 अरब डॉलर के 'F-35' (F-35 Stealth Fighter Jets) और महंगे रक्षा सौदों का प्रतीक है।
  5. पुराने मॉडल का 'सफेद हाथी': यह पूर्व में सऊदी अरब द्वारा ख़रीदे गए अमेरिकी 'F-15' लड़ाकू विमानों का प्रतीक है, जिन्हें हूतियों ने मार गिराया था।

पृष्ठभूमि (Background):

हाल ही में ओमान की राजधानी मस्कट में अमेरिका ने हूतियों के साथ एक गुप्त बैठक की। इस बैठक में हूतियों ने अमेरिकी और इजरायली जहाज़ों पर हमला न करने का आश्वासन दिया, लेकिन सऊदी अरब के जहाज़ों को इस सुरक्षा गारंटी से बाहर रखा। इसके तुरंत बाद, अमेरिका ने सऊदी अरब की सीधे तौर पर सैन्य मदद करने (यानी यमन में अपनी सेना भेजने) से इनकार कर दिया, और इसके बजाय उन्हें 24.3 अरब डॉलर के 'F-35' फाइटर जेट बेच दिए। इस कॉलम में अमेरिका के 'हथियार बाज़ार' की सच्चाई को मोहल्ले की एक दिलचस्प और चुटीली कहानी में ढाल दिया गया है ।

आइए पढ़िए पूरी कहानी...

दुनिया में कुछ रिश्ते इतने एकतरफ़ा और 'ब्लाइंड ट्रस्ट' (Blind Trust) पर कायम होते हैं कि उन्हें देखकर अक्ल दंग रह जाती है। मुहल्ले के लालची चौकीदार 'शेर सिंह' और अमीर-कबीर 'सेठ साहब' का रिश्ता भी बिलकुल ऐसा ही है। शेर सिंह उस स्वार्थी दोस्त की तरह है जो तोहफ़े में आपकी ही महंगी घड़ी मांगता है और फिर उसी घड़ी में समय देखकर बताता है कि "माफ़ करना सेठ जी, मेरी ड्यूटी का टाइम ख़त्म हो गया है।" हम बचपन से सुनते आ रहे हैं कि दोस्त वह जो मुसीबत में काम आए, लेकिन शेर सिंह की डिक्शनरी में दोस्त वह है जिसे मुश्किल वक्त में अकेला छोड़कर, उसकी मजबूरी का भरपूर फ़ायदा उठाते हुए उसे मुहल्ले का सबसे महंगा सिक्योरिटी सिस्टम बेचा जाए।

सेठ साहब की सादगी, मासूमियत और तथाकथित 'शराफ़त' का यह आलम है कि वे पिछले कई दशकों से इसी शेर सिंह के डसने का शिकार हैं, और हर बार डसे जाने के बाद बिल भी खुद ही खुशी-खुशी चुकाते हैं। शेर सिंह की इस दगाबाज़ी और डबल गेम का ताज़ा और सबसे शानदार लतीफ़ा पिछले दिनों नुक्कड़ वाले खुफ़िया चायखाने में पेश आया। ख़बरें हैं कि शेर सिंह, जो खुद को मुहल्ले का चौधरी और सेठ साहब का इकलौता बॉडीगार्ड कहता है, उसने चायखाने में मुहल्ले के आवारा लड़के 'बब्बन कबाड़ी' (जिसका निशाना बहुत पक्का है) के साथ बैठकर चाय पी और कमाल की 'चौकीदारी महारत' का मुज़ाहिरा (प्रदर्शन) किया।

शेर सिंह ने बब्बन कबाड़ी से कहा,

"देखो भाई, मैं अब इस गली के झगड़ों से खुद को दूर कर रहा हूँ। तुम बस मेन रोड पर मेरे और मेरे 'चहेते साले' की दुकान पर पत्थर मत मारना। अलबत्ता, अगर तुम्हारा दिल चाहे तो सेठ साहब की हवेली पर शौक से निशानेबाज़ी की प्रैक्टिस करो, मैं बीच में नहीं आऊंगा।"

बब्बन कबाड़ी ने भी हामी भर ली। ज़रा तसव्वुर (कल्पना) करें, आपने मुहल्ले के जिस बदमाश से बचने के लिए भारी तनख्वाह पर एक बॉडीगार्ड रखा था, वह रात को उसी बदमाश के साथ सिगरेट पी रहा है और कह रहा है कि "मेरे केबिन पर पत्थर मत मारना, बाकी सेठ जी की हवेली खुली है, जितना चाहे लूट लो, बस मेरी ड्यूटी के समय में शोर मत मचाना!"

जब बब्बन कबाड़ी को सेठ साहब की हवेली की धुलाई (पिटाई) का यह 'एनओसी' (NOC) मिल गया, तो शेर सिंह ने अपनी असली दुकान खोली। सेठ साहब ने घबराकर शेर सिंह को फ़ोन लगाया: "शेर सिंह भाई! बब्बन कबाड़ी ने हवेली का रास्ता घेर लिया है, हमारी गाड़ियां फंसी हुई हैं, जल्दी से अपना डंडा लेकर आओ और हमारी मदद करो!" अब शेर सिंह, जिसके डीएनए में चौकीदारी से ज़्यादा 'प्रॉपर्टी डीलिंग' और 'सेल्समैनशिप' भरी है, उसने बड़े प्यार से जवाब दिया:-

"देखिए सेठ साहब! मुझे सर्दियों की रातों में गलियों की धूल-मिट्टी रास नहीं आती, वैसे भी मैं किसी और की लड़ाई में अपना डंडा नहीं चलाता। लेकिन आप घबराएं मत! मैं आपके लिए एक बंपर ऑफ़र लाया हूँ; मैं आपको करोड़ों रुपये में इम्पोर्टेड 'स्टेल्थ' (Stealth) रोबोटिक सफेद हाथी दे रहा हूँ, और खुशखबरी यह है कि हाथियों के साथ महावत बिलकुल फ्री! बताइए, पेमेंट कैश करेंगे, ऑनलाइन ट्रांसफर करेंगे, या अपनी दो-चार दुकानों की रजिस्ट्री सीधी मेरे नाम करेंगे?"

यह सौदा बिलकुल ऐसा है कि आपकी रसोई में दो चूहे घुस आएं, आप घबराकर दोस्त को बुलाएं, और वह चूहे-मार दवा देने के बजाय आपको करोड़ों रुपये का जंगी टैंक बेच दे और कहे कि "इसे खुद ड्राइव करके चूहों पर चढ़ा दो!" ज़रा मंज़र की कल्पना करें:-

एक तरफ़ बब्बन कबाड़ी है जो पैरों में हवाई चप्पल पहने, कबाड़ के पाइपों और देसी गुलेल से हमले कर रहा है, और उससे निपटने के लिए सेठ साहब को दुनिया का सबसे महंगा 'स्टेल्थ' सफेद हाथी बेचा जा रहा है। यानी एक ऐसा हाथी जो ख़तरा देखते ही गायब हो जाता है। अरे भाई! जिस दुश्मन की आँखों में हया न हो, उससे छिपने के लिए करोड़ों की 'गायब होने वाली' तकनीक का क्या अचार डालना है? यह शेर सिंह की वह कातिलाना मार्केटिंग है जहां वह पहले पड़ोसी को आपके घर पत्थर मारने का इशारा करता है, फिर उसी से खुफ़िया डील करके अपना केबिन बचाता है, और आख़िर में आपके डर को कैश करवाते हुए आपकी पूरी तिजोरी साफ़ कर देता है।

सेठ साहब का यह महंगा सिक्योरिटी बजट और दिखावे का शौक वैसे भी काफ़ी पुराना है। मुहल्ले वालों को आज भी याद है कि इससे पहले भी शेर सिंह ने उन्हें पुराने मॉडल का एक बेहद महंगा और चमकदार 'सफेद हाथी' बेचा था। मुहल्ले के सालाना जश्न पर इस करोड़ों के सफेद हाथी को खूब चमकाया गया, उसने हवेली के अहाते में क्या शानदार करतब दिखाए और रंग-बिरंगा धुआं उड़ाया कि पूरा मुहल्ला वाह-वाह कर उठा। लेकिन जब हकीकत में बब्बन कबाड़ी से जंग छिड़ी और हवेली पर पत्थरों की बारिश हुई, तो ऐन मौके पर बब्बन ने अपनी पचास रुपये की देसी गुलेल से ऐसा अचूक निशाना लगाया कि वह करोड़ों का मगरूर (घमंडी) सफेद हाथी धड़ाम से औंधे मुंह गिर पड़ा।

अब पुरानी ज़िल्लत से सबक सीखने के बजाय सेठ साहब ने नया 'स्टेल्थ' हाथी बांध लिया है। हाथी तो हवेली में आ गया है, लेकिन अब उसे चलाने के लिए उसका विलायती चारा और मासिक सर्विसिंग भी शेर सिंह ही की दुकान से ब्लैक में खरीदनी पड़ रही है। सेठ साहब हाथी की पॉलिश पर लाखों उड़ा रहे हैं, और दूसरी तरफ़ बब्बन कबाड़ी हवेली के बाहर बैठा अब भी अपनी उसी पचास रुपये की गुलेल के रबड़ को खींचकर मज़े से ठहाके लगा रहा है।

इस डील की सबसे दिलचस्प बात इन रोबोटिक हाथियों की 'स्टेल्थ' तकनीक है। अगर ज़रा गहराई में जाकर देखें तो शेर सिंह की दोस्ती, वादे और वफ़ादारी भी सौ प्रतिशत 'स्टेल्थ' ही है। जब सौदा हो रहा हो और नोट गिने जा रहे हों, तो शेर सिंह आपका सगा भाई बना नज़र आता है, लेकिन जैसे ही मुश्किल वक्त आता है या कोई पत्थर आपकी तरफ़ आता दिखाई देता है, तो शेर सिंह की मदद फ़ौरन 'स्टेल्थ मोड' में चली जाती है और ऐसे गायब होती है कि सेठ साहब दूरबीन लेकर भी ढूंढें तो कुछ नज़र नहीं आता। दूसरी तरफ़ सेठ साहब की रक्षात्मक सादगी और मासूमियत पर भी रोना आता है, जो 50 रुपये की गुलेल और कबाड़ को मार गिराने के लिए करोड़ों का हाथी खरीद रहे हैं। यह तो बिलकुल ऐसा है जैसे आपके गुसलखाने (बाथरूम) में कॉकरोच (Cockroach) निकल आए, और आप उसे कुचलने के लिए बाज़ार से ब्रांड न्यू 'फेरारी' (Ferrari) खरीद लाएं! मुहल्ले की सियासत का सीधा सा आर्थिक उसूल है, जब बब्बन कबाड़ी का पचास रुपये का पत्थर सेठ साहब के करोड़ों के इम्पोर्टेड हाथी से टकराता है, तो बब्बन कबाड़ी हंसकर दूसरा पत्थर उठा लेता है, जबकि हाथी का मालिक उसके इलाज का बिल देखकर सीधा आईसीयू (ICU) पहुंच जाता है।

शेर सिंह की इस खुली दगाबाज़ी, पीठ में छुरा घोंपने की नीति और खुफ़िया चायखाने की बातचीत के बाद भी अगर सेठ साहब को यह लगता है कि शेर सिंह उनका सच्चा रक्षक है, तो फिर उन्हें किसी नए सिक्योरिटी सिस्टम की नहीं, बल्कि दिमागी बीमारियों के किसी बहुत बड़े और महंगे अस्पताल की ज़रूरत है। क्योंकि शेर सिंह दुनिया का वह इकलौता 'हमदर्द' है जो आपको नदी में डूबता देखकर लाइफ़ जैकेट तो नहीं फेंकता, अलबत्ता किनारे पर खड़े होकर आपको एक बेहद इम्पोर्टेड और ब्रांडेड चश्मा ज़रूर बेच देता है, ताकि जब आप पानी के अंदर गोते खाएं तो आप बेहद स्टाइलिश, हाई-टेक और मुकम्मल 'वीआईपी' लगें!
Athar Kalim Ahmed/S.R.Husaini

Athar Kalim Ahmed/S.R.Husaini

महाराष्ट्र के अतहर कलीम अहमद और एस.आर.हुसैनी उर्दू समाचार पत्रों और विभिन्न वेबसाइट के लिए "आईना खाना" के नाम से हास्य और व्यंग्यात्मक कॉलम लिखते हैं।