पराग पावन की कविताएं: कठकरेजा समय में मनुष्यता का अलाप
कविता के अनुक्रम में नत्थी मनुष्यता के सरोकार
Poetry lifts the veil from the hidden beauty of the world, and makes familiar objects be as if they were not familiar.- -P.B. Shelley
शेली ने कविता के बारे में यह बात 1821 में कही थी।मुझे नहीं पता उनके इर्द-गिर्द की दुनिया उनके समय में कैसी थी, लेकिन हम जिस समय में रह रहे हैं वह धीरे धीरे असहनीय हो चला है, इतना कि कविता अब कहती है कि “जितना जल्दी हो सके इस दुनिया को बदल देना चाहिए”।
आज सुबह जब मैं यह लिख रहा हूँ, घर से खबरें आ रहीं है कि दिल्ली को छावनी में बदल दिया गया है कि वहाँ कोई आंदोलन न हो सके, ट्रेनों से युवाओं को इस शक़ में उतार लिया जा रहा है कि वे किसी आंदोलन का हिस्सा बनने जा रहे हैं। इस समय में हिंदी की युवा कविता हमसे क्या कहना चाह रही है? पराग पावन की कविताएँ इस समय का और किसी युवा के मन में क्या चल रहा है इसकी बानगी बताती हैं। हिंदी के वरिष्ठ कवि रघुवीर सहाय ने कभी अपनी कविता “हँसो जल्दी हँसो” में कहा था ‘हँसो तुम पर निगाह रखी जा रही है’ अब सिर्फ़ निगाह नहीं रखी जा रही अब वह समय है जिसे पराग कहते हैं “जब हर हँसी संदिग्ध थी” । हँसी भी अब सत्ता से बचने में क़ारगर नहीं रही। हर हँसी शक़ के घेरे में है ।

“जब हर हँसी संदिग्ध थी” की कविताएँ अपने समय को दर्ज़ तो करती ही हैं जैसी कविता से अपेक्षा होती है लेकिन इन कविताओं की महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने प्रतिरोध को लिखने, अपने सवालों को पूछने के क्रम में ये कविताएँ किसी भी मेटाफर का सहारा नहीं लेती, सीधे सीधे सवाल पूछती है ताकि किसी काव्य युक्ति के चलते इन सवालों को टाला न जा सकें ना ही इन सवालों के संदर्भ बदले जा सकें-
हमारी बेरोज़गारी पर
भाषण देता है प्रधानमंत्री
पर हमें काम नहीं देता
वह अठारह घंटे करता है काम
जबकि हम मानते हैं कि आठ घंटे से अधिक काम
किसी भी व्यक्ति का शोषण है
यदि अठारह घंटे को बाँटा जाये
तो कम से कम दो लोगों को मिल सकता है काम
एक तीसरे की आँख में भी
उग सकती है दो घंटे की चमक
'बेरोज़गार' शीर्षक से लिखी इस इस संग्रह में तीस कविताएँ है जिनसे गुज़रते हुए मालूम होता है कि आज़ादी के इतने साल भी रोज़गार का सवाल बदला नहीं है, वह अभी भी मुँह बाये सामने खड़ा है जिसमें सब कुछ डूबता चला जा रहा है।यह अनायास नहीं कि हिंदी के लगभग हर युवा कवि की कविता में यह प्रसंग बार बार आता है। हर कवि अपने तरीके से इस सवाल का मूल खोजने की कोशिश में है, हिंदी के ही एक दूसरे कवि निशांत ने कभी इसे ऐसे लिखा था कि “हम उसकी नौकरी नहीं पचा पा रहे” ।
पराग की कविताएँ बेरोज़गारी के इस कालचक्र के हर असर को लिखती है लेकिन यह सब दया का पात्र न बन जाय और आप च्च च्च ! कहकर आगे न बढ़ जाये इसलिए उनसे सीधा सवाल करती है जिन्होंने इस सवाल के कब का ख़त्म हो जाने की घोषणाएँ कर रखी थी। बेरोज़गारी इन कविताओं में सिर्फ़ के राजनीतिक मुद्दा नहीं रहती बल्कि महीन अर्थों में वह सूत्र बनती है जिससे हिन्दी कविता दुनिया भर की कविताओं से जुड़ती है। विस्लावा शिम्बोर्स्का ने भी अपनी कविता में यह अफ़सोस जताया था कि नई सदी में हमें भूख़ और बेरोज़गारी की समस्यायें हल कर लेनी थी लेकिन अफ़सोस कि हमारी सदी भी अब बूढ़ी हो चली है और ये समस्याएँ अभी भी हल नहीं हुई। बसंत आता है और ड्योढ़ी से लौट जाता है, इन कविताओं का समर्पण लिखते हुए कवि दुनिया की सुन्दरताओं के बारे में कहता है,
उन सुन्दरताओं को जिन्हें बेरोज़गारी निरस्त करती है; उस बर्बाद उम्र को जो कभी नहीं लौटेगी
इस समर्पण को पढ़ते हुए लगता है हम कैसे कठकरेजा समय में रह रहे हैं जहाँ जिस उम्र में वसंत देखना था, अफ़सोस सिर्फ़ पतझड़ में गिरे पत्तों का होना था उस उमर में एक कवि उस उम्र के बर्बाद होने का अफ़सोस कर रहा है जो एक अदद नौकरी के न होने से रीत गई है। बेरोज़गारी के इस कोलाहल के बीच हम अपने समय के संदर्भ भूल न जाएँ, उन्हें कालचक्र में किसी नियति से उपजा होना न मान लें इसलिए कविता याद दिलाती चलती है,
अगर प्रधानमंत्री मनुष्य होता
तो बेरोज़गार उसे याद दिलाते:
तुमने हर साल दो करोड़ नौकरी का वादा किया था।
पराग पावन का यह संग्रह सिर्फ़ बेरोज़गारी और एन.एफ़.एस तिवारियों का आख्यान नहीं है, यह संग्रह अपनी चेतना में धान रोपती महिलाओं, महिषासुर, मुक्तिबोध के मेहतर का बयान भी है। यह संग्रह उस लड़की का बयान भी है जो बरसात को छूकर गीला कर देना चाहती थी, पर उसी बरस विवाह में कूदकर मार गई जो विवाह में गंधाती रहेगी लेकिन इन सब के बीच निश्चित सिर्फ़ इतना पाया गया कि उस लड़की का कभी कोई प्रेमी नहीं था। इन आख्यानों में आत्मीयता पराग की कविताओं का प्रमुख स्वर है। जैसे जैसे हम संग्रह में आगे बढ़ते हैं इन कविताओं में बसी आत्मीयता की गंध हमें अपने घेरे में ले लेती हैं। आत्मीयता के इस आलोक में हम देखते हैं कि कवि मंगलेश डबराल के हमारे बीच से जाने के दो साल बाद कवि उन्हें कैसे याद करता है,
मेरी आवाज़ का पेड़ रह-रह कर काँपता है
मैं हारता नहीं हूँ,मैं थकता नहीं हूँ
मैं एक दृढ़ चुप विनम्र मछली की तरह खड़ा हूँ
इस महासैलाब की धारा के विपरीत
पर इतनी दूर है सुंदरता
कि मुझे तुम्हारी पंक्तियों की डोर चाहिए
जिससे खींचकर संभव करूँगा अच्छाई
यह तरल आत्मीयता बीते हुए चुम्बनों को याद करती है जो अब समय के किसी तल में सोते हैं, उन मृतकों को याद करती है जो अब कभी लौटकर हमारी दुनिया में वापस नहीं आयेंगे, उनकी आदतें अब जीवन का हिस्सा नहीं याद बनकर हमारे भीतर रहेंगी। आत्मीयता की इस दुनिया में बहनें हैं जिनकी याद का अनुक्रम बनाते हुए पराग लिखते हैं,
ऐसा क्या था
जिसने हँसना सिखाया था
उसके लिए रची जा रही कविता
दुःख से शुरू होती हैं
अपने समय को टटोलते, लोगों, दृश्यों को याद करते इस संग्रह में प्रेम पृष्ठभूमि के राग की तरह बजता रहता है। प्रेम के लिए इस बड़ी दुनिया में कभी कवि पंजे भर जगह तलाशता है, उस दुनिया में जहाँ ईश्वर अल्लाह के पसरने की भी जगह है लेकिन प्रेम से मुलाक़ात के लिए पंजे भर ज़मीन नहीं इस धरती के पास। प्रेम की इन कविताओं को पढ़कर लगता है मनुष्यता के क्रम में जो चिर अनन्त चीज़ हम मनुष्यों के पास रह गई है वह प्रेम है। प्रेम न कर पाने वालों को यह अजूबा लग सकता है कि प्रेम में पड़े दो लोग भला दुनिया के किस काम के, उन सबसे पराग कहते हैं,
प्यार करने वालों से पूछो
एक रात में भी हो सकती है इतनी रौशनी
कि तुम ताउम्र नाप सकते हो
जीवन का अंधेरा।
आत्मीयता के इस लोक में कवि का सबसे पुराना साथी उनके भाई विहाग है । विहाग जिनके होने से साथ आने की महिमा प्रकट होती है, जो पराग के जीवन में, कविता में रस की तरह घुले हुए है । पराग की कविताओं को पढ़ते हुए विहाग एक अदृश्य संगतकार की तरह लगते है जिनकी अदृश्य उपस्थिति में ये कविताएँ जीवन का संगीत रचती है,
ओ मेरी आत्मा के पहरेदार!
हर चीज को दो बनाते हुए
अगर हम थक भी गए
तब भी निष्प्राण नहीं होने देना है
उस स्त्री का तिलिस्म
बस यही मृत्यु है
इसे ही हम बाँटेगे आधा-आधा
आधी-आधी मृत्यु को रोकेंगे
कविता की ढाल से ।
पराग पावन का यह कविता संग्रह पढ़ना हमारे समय के मनुष्य की चिंताओं, आकांक्षाओं, स्मृतियों को पढ़ना है। इस संग्रह में कुछ सवाल है, कुछ प्रेम, अपने समय से उपजा ग़ुस्सा है, हताशा है जो तनकर खड़ा होना सिखाती है,नमक भर विषाद है, एक वृहत्तर परिवार है वह सब है जिनसे इस कविता के मनुष्य की निर्मिति होती है। पराग अपने कविता संग्रह में जो मनुष्य रचते हैं शायद हमारे समय और हमारी सभ्यता का सबसे प्रामाणिक प्रतिरूप है ।
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जब हर हँसी संदिग्ध थी
पराग पावन
राजकमल प्रकाशन, 2025
Vivek Kumar Shukla
लेखक हिन्दी साहित्य के अध्येता हैं, एक उपन्यास प्रकाशित। फ़िलहाल डेनमार्क की ओर्हुस यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं।
