Literature

अमित उपमन्यु की कविताओं में डार्क रियलिटीज का बीहड़ दिखता है : लीलाधर मंडलोई

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 5 min read
अमित उपमन्यु की कविताओं में डार्क रियलिटीज का बीहड़ दिखता है : लीलाधर मंडलोई

अमित उपमन्यु के कविता संकलन 'अतिरिक्त शून्य' का विमोचन समारोह

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में शनिवार को Unbound Script से प्रकाशित अमित उपमन्यु के कविता संग्रह ‘अतिरिक्त शून्य’ का विमोचन समारोह आयोजित किया गया।

विमोचन के बाद अमित की कविताओं पर परिचर्चा सत्र का भी आयोजन किया गया। परिचर्चा सत्र को हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि-गद्यकार और संपादक लीलाधर मंडलोई, चर्चित लेखक और पत्रकार प्रियदर्शन, सुपरिचित कवि-आलोचक सविता सिंह, अशोक कुमार पांडेय, सुपरिचित कवयित्री-उपन्यासकार और आलोचक प्रोफेसर सुजाता और हिंदी के जाने-माने कवि अदनान कफ़ील दरवेश ने संबोधित किया।

आयोजन की शुरुआत में अमित उपमन्यु ने अपनी जानना, गति के नियम, नयी राह, अख़बार, अन्य पुरुष आदि कविताओं का पाठ किया।

परिचर्चा सत्र को संबोधित करते युवा कवि अदनान कफ़ील दरवेश ने कहा कि जब मुझे अमित के कविता संग्रह ‘अतिरिक्त शून्य’ को पढ़ने का मौका मिला तो मैने इसे एक दूसरे नजरिये से देखा। मैने देखा कि संग्रह में कविता का नया भूगोल जुड़ रहा है या नहीं। नवाचार है या नहीं। मैने पाया कि अमित की कविताओं में नवाचार पर्याप्त है। कवि भाषिक बर्ताव को लेकर सहज और लोकतांत्रिक भी है। अंग्रेजी और उर्दू के शब्दों का बहुतायत में इस्तेमाल करते है अमित। भाषा को लेकर कोई झिझक नहीं है अमित में।

अमित की कविताओं में एक अलग किस्म का अलगाव दिखता है और वो अलगाव समय और समाज दोनों से है। काव्य रूढि को भी तोड़ते दिखते हैं अमित। इनकी कविताओं को पढ़ने से लगता है कि इनकी कविता कई परतों में होती है। अमित अर्थबहुलता और संश्लिष्टता का एक अतिरिक्त बोझ पाठकों पर तो डालते हैं लेकिन कोई दबाब नहीं। कोई भार नहीं। इनकी कविताओं को पढ़ कर लगता है कि ये डिस्टोपियन कवि हैं।

सुपरिचित कवयित्री-उपन्यासकार और आलोचक प्रोफेसर सुजाता ने अमित की कविताओं की आलोचकीय व्याख्या करते कहा कि अमित अनाग्रही कविताओं के कवि हैं। इनकी कविताओं में एक अलग किस्म का Weightlessness है। खासकर प्रेम कविताओं में। अमित की प्रेम कविताएं वेदना का दबाव नहीं डालती है पाठकों पर।

खास बात यह है कि कविताओं को पढ़ कर लगता है कि कवि को अपने प्वाइंट को प्रूव करने की कोई हड़बड़ी नहीं है और कोई जिद भी नहीं। शिल्प को लेकर भी कोई आग्रह नहीं दिखता है अमित की कविताओं में। बिल्कुल अनगढ़ कविता रचते हैं कवि अमित। एक शब्द में कहना हो तो अमित एक Unimposing कवि हैं।

चर्चित कवि, लेखक और प्रियदर्शन ने अमित को बीहड़ ढंग के मौलिक कवि की संज्ञा देते कहा कि अमित की कविताओं में दृश्य का विलगाव दिखता है, परंपरा से विलगाव दिखता है। अमित की कविताओं में अर्थ के भीतर का अर्थ चकित करता है। खास बात यह है कि दुरुहता के बावजूद अमित अर्थबहुलता को पाठकों पर थोपते नहीं हैं।

अशोक कुमार पाण्डेय ने अपने संक्षिप्त उद्बोधन में अमित उपमन्यु के कवि बनने की प्रक्रिया को याद करते हुए उनसे अपने अभिन्न सम्बन्धों की चर्चा की। ग्वालियर के दिनों को याद करते हुए उन्होंने गीतों से कविता तक की उनकी यात्रा का ज़िक्र करते हुए उम्मीद जाहिर की कि उनकी अगली किताब जल्दी ही आए।

सुपरिचित कवि-आलोचक सविता सिंह ने कहा कि अमित की कविता में अवधारणा है। इनके कविता संग्रह का जो शीर्षक है 'अतिरिक्त शून्य' वो स्वंय में एक बहुत बड़ा Concept है। अमित की कविताओं का पाठ करते वक्त लगता है कि बहुत कुछ टूट रहा है।

ये जो टूटने की बात इनकी कविताओं में आती है वो इन्हें डिस्टोपिया का कवि बनाता है। अमित अपनी कविता में कहते हैं- या तो बदलो या नष्ट हो जाओ। अमित की कविताओं को किसी अल्टरनेटिव की तलाश नहीं है। अमित को तलाश है तो सिर्फ अतिरिक्त की। जो जाहिर नहीं है उसे लिखना चाहते हैं अमित। बस एक वाक्य में कहे तो Post Human Poet हैं अमित।

परिचर्चा सत्र की अध्यक्षता कर रहे हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि-गद्यकार और संपादक लीलाधर मंडलोई ने अमित उपमन्यु को डार्क रियलिटीज का कवि कहा। उन्होंने कहा कि डार्क रियलिटीज को सिंपल नैरेटिव से नहीं कहा जा सकता है, इसलिए अमित की कविताएं कहन में संश्लिष्ट जरूर है लेकिन इनका कहन बिल्कुल मौलिक है।

अमित की कविताओं के विविध आयामों पर चर्चा करते कवि लीलाधर मंडलोई ने कहा कि अमित रुपकों का बेहतर इस्तेमाल करते हैं। अमित की कविताओं से गुजरते लगता है कि इन्होनें अपना सुर गढ़ा है और इनकी लय भी अपनी है। इनकी कविताएं संशलिष्ट इसलिए है क्योंकि कवि अमित एक साथ कई कलाओं में आवाजाही करते हैं। पेशे से इंजीनियर हैं, फिल्मकार हैं, फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखते हैं, गीत भी लिखते हैं और खास बात यह है कि ये पढ़ाकू कवि हैं। यही वजह है इनकी कविता टूटी-फूटी और बिखरी हुई भी रहती है। इनके अवचेतन में मूर्त और अमूर्त भी रहता है।

जब समय की बात आती है तो अभी का दौर डार्क रियलटीज का ही दौर है और इस भीषण समय में अमित की कविता में समय एक लंपट साम्राज्य की तरह जानबूझकर नहीं आता है। क्योंकि वर्तमान सत्ता के इस समय का यथार्थ ही यही है। लंपटों का साम्राज्य कायम है और अमित इस यथार्थ को बिल्कुल डार्क रियलटीज की तरह देखते हैं इसलिए इनकी कविताएं संश्लिष्ट दिखती है।

धन्यवाद ज्ञापन अनबाउन्ड स्क्रिप्ट के संपादक आशीष मिश्र ने किया। समारोह में मंच संचालन की जिम्मेदारी युवा लेखक मनीष निभा रहे थे। द क्रेडिबल न्यूज़ इस आयोजन का मीडिया पार्टनर था।

विमोचन समारोह में वरिष्ठ कवि विष्णु नागर, वरिष्ठ कांग्रेस नेता गुरदीप सिंह सप्पल, अनबाउन्ड स्क्रिप्ट के निदेशक अलिंद माहेश्वरी, ग्वालियर दक्षिण के पूर्व विधायक प्रवीण पाठक सहित अनेक सुधिजन उपस्थित थे।