मुल्तान की मिट्टी से दिल्ली की धूल तक: दरयागंज वाया बाज़ार फ़त्ते ख़ाँ
एक उपन्यास जो विभाजन के वक़्त भारत आए परिवार की तीन पढ़ियों की कथा है
मुल्तान की मिट्टी छोड़ कर दिल्ली की मिट्टी से जुड़ जाने वाले लोग। ऐसे जुड़े कि जैसे मुल्तान कहीं पीछे छूट गया।
विभाजन पर कई किताबें लिखी गयी है, लेकिन दरयागंज वाया बाज़ार फ़त्ते ख़ाँ किताब का हासिल है विस्थापन का दोहराव।
स्थान, समय और पीढ़ियों में।
जैसे यह एक कुचक्र हो।

438 पृष्ठों की यह पुस्तक शुरू होती है मुल्तान के बहावलपुर रियासत है। जहाँ हिंदू, मुसलमान और सिख यूँ रहते थे, जैसे सभी एक ही मुल्तानी मिट्टी के बने हैं। उनकी भाषा या संस्कृति पंजाबी, बलूची या आज की भारतीय या पाकिस्तानी नहीं, बल्कि मुल्तानी थी। बुल्ले शाह की धरती जहाँ बड़े भाई को ‘भापे’ और बीवी को ‘कुवार’ बोलते थे। और एक दिन अचानक यह पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।
सैकड़ों मारे गए, और जो बचे, उन्हें भाग कर दिल्ली के शरणार्थी कैंप में आकर रहना पड़ा। लाल किले पर हुए मुशायरे में पंडित नेहरू के सामने एक लाहौरी शायरी पर उनकी आँखों में आँसू आ जाते हैं—
एस मुलक दी वंड कोलों
खोए तुसी वी ओ, खोए असी वी हाँ
इना आजादियाँ हत्थों बरबाद
होए तुसी वी ओ, होए असी वी हाँ
(इस मुल्क के टुकड़े कर/खोए आपने भी है, खोया हमने भी है)

लेकिन मुल्तान और विभाजन की कहानी पहले सौ पृष्ठ में ही है। उसके बाद की कहानी दिल्ली की है, जहाँ विस्थापित हुए ये मुल्तानी अपनी नयी जिंदगी शुरू करते हैं। लेखक सुजाता ने बहुत बारीकी से धीरे-धीरे संवादों को मुल्तानी से हिंदी में बदल दिया है। सिवाय कुछ बुजुर्गों द्वारा गाहे-बगाहे कहावत के सभी दिल्ली की जबान बोल रहे हैं। उन्हें जब कोई पाकिस्तानी या पंजाबी कहता है, तो वे कहते हैं कि हम हिंदुस्तानी हैं।
ये बहुत जल्दी भारत के रोजमर्रा जीवन में घुलने लगते हैं। सरकारी नौकरी में, दुकानें चला कर, किताबें लिख कर, और यहाँ तक कि बंबई फिल्म उद्योग में गायक और फिल्मकार बन कर भी। कई बार पढ़ते हुए लगता है कि वह मुसलमान महिला जो विभाजन के समय एक हिंदू के साथ भाग कर फिल्मों में गायक बनी है, वह किसी की सच्ची कहानी है। मशहूर शायर कुमार कातिब सुना-सुना लगता है। लेकिन न जाने ये किरदार किन पर आधारित हैं।
पुस्तक में एक सिख किरदार है, जो इस ग्लानि में जी रहा है कि दंगों के समय उसने एक मुसलमान साथी की हत्या की थी, लेकिन उसे चैन मिला जब पता लगा कि वह उसके चाकू से नहीं मरा। नियति ऐसी कि दिल्ली के सिख दंगों में एक बार फिर उसे वही दिन देखने पड़ते हैं।
इसी तरह कश्मीर भाग कर आए लोगों और वहाँ से कश्मीरी पंडितों का पलायन भी विस्थापन के दोहराव के रूप में दिखाया गया है। जैसे विभाजन और विस्थापन एक सतत प्रक्रिया हो, और इस भँवर में घिरे लोगों के आँसू सूख गए हों।
उपन्यास में एक पंक्ति है—
‘कुलवन्ती को अभावों से डराया नहीं जा सकता था। उसने जीवन में कभी मुलायम गद्दों, छत्तीस पकवानों, ठंडी हवाओं की कल्पना नहीं की थी। वह रिफ्यूजी कैंपों में जीवन के बदतर दिन की सबसे क्रूर सच्चाई से वाक़िफ़ पीढ़ी थी’
हालाँकि यह पुस्तक की कमी नहीं कही जाएगी, लेकिन कालखंड कुछ तेज़ी से भागते हैं। विभाजन से नेहरू की मृत्यु के बीच बीस साल का समय बहुत जल्दी गुजर जाता है। और उतनी ही तेजी से इमरजेंसी से गुजरते हुए सिख दंगे, और उसके बाद के कश्मीरी पंडितों का पलायन भी। हालाँकि इससे पुस्तक का प्रवाह बढ़ता ही है, लेकिन इस किताब में दो-तीन सौ पन्ने और होते, तो भी पठनीय होता।
भाषा की समस्या बहुत नहीं है, क्योंकि लेखक ने सामान्य समझ की मुल्तानी जबान का भी अनुवाद फुटनोट में दे दिया है। कुछ कामुक प्रसंग ऐसे उपमाओं से लिखे गए हैं कि कहीं से अश्लील नहीं दिखते, बल्कि किसी महाकाव्य की याद दिलाते हैं।
रही बात विस्थापन के दोहराव की, तो इसी किताब में पंक्तियाँ हैं—
‘दोहराना भी कोई आसान चीज नहीं है…यूँ कि सोचो सदियों से आदमी मोहब्बत करता आया है, लेकिन हर बार उसे इज़हार करने के लिए नए तरीक़े ईजाद करने पड़ते हैं। बात वही है, दोहराव ही है, लेकिन उसमें भी करामात ढूँढ ले, वही शायर है’
इस साल पढ़ी गयी किताबों में ‘कई चाँद थे सरे आसमाँ’ में जो बड़ा फ़लक दिखा था, कुछ-कुछ इस किताब में दिखा।
ज़रूर पढ़ी जानी वाली किताब।
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किताब के बारे में लेखिका सुजाता की बात
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दरयागंज वाया बाज़ार फ़त्ते ख़ाँ
सुजाता
राजकमल पेपरबैक्स
मूल्य 550 रुपए
पृष्ठ 438
Praveen Kumar Jha
प्रवीण कुमार झा नार्वे में रहते हैं। पेशे से डॉक्टर हैं, मन से लेखक। कई चर्चित किताबें प्रकाशित
