किताबी संडे- समलैंगिक रिश्तों पर हिन्दी की पहली किताब
इंद्रधनुषी प्यार, पीडोफ़िलिया और बहुत पुरानी चॉकलेट
इस उदास नस्ल में
चूहे की मौत की ख़बर से अख़बार रंगीन है
खेल पृष्ठ क्रिकेट से भरा है
संपादकीय पाकिस्तानी भुखमरी से सुसज्जित है
धारा-377 गाहे-ब-गाहे कोने में सिमटी दिख जाती है
पाठक पन्ना पलट देते हैं।
- कृति राज
धारा 377 जिसने एक लंबे समय तक भारत को एक प्रेम प्रतिबन्धित समाज बनाये रखा, उसकी शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई थी। ब्रिटिश नैतिकता की भूमि पर उपजा यह क़ानून आज़ादी के सालों बाद भी हमारे समाज को नियंत्रित करता रहा। अपने अन्य प्रावधानों के अतिरिक्त धारा 377 दो पुरुषों या दो स्त्रियों के बीच के संबंधों को न सिर्फ़ अप्राकृतिक, ग़ैर क़ानूनी बताती थी बल्कि इसे अपराध की श्रेणी में रखती थी।
कई सारे आंदोलनों, मुक़दमों और एक लंबी उठा पटक के बाद साल 2018 में भारत की अदालत ने माना कि दो व्यस्क लोग अपनी मर्ज़ी से अपने एकांत को कैसे जीते हैं यह उनका निजी मामला है और सरकार और क़ानून इस निजता का उल्लंघन नहीं कर सकती। इस साल जब इन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किए सात साल होने को हैं और धीरे धीरे यह संबंध हमारे समाज में, हमारी फ़िल्मों में और संवेदनशील तरीके से बरते जाने लगे है, उनकी चिर उपस्थिति धीरे धीरे सामान्य स्वीकृति की ओर बढ़ रही है;ऐसे में यह जानना और देखना दिलचस्प है कि हिंदी साहित्य का अतीत इसे कैसे देख रहा था इसके बारे में क्या राय रखता था।

पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ का कहानी संग्रह चॉकलेट उस बीते समय की खिड़की खोलता है और उस समय की वैचारिकी की एक झलक हमारे सामने रखता है। यह कहानी संग्रह पहली बार 1927 में प्रकाशित हुआ था।ये कहानियाँ पहले मतवाला नामक पत्र में प्रकाशित हुई और उसके बाद पुस्तकाकार रूप में। इन कहानियों पर लंबा विवाद रहा, इसे घसलेटी साहित्य तक कहा गया, विवाद इतना था कि यह बात गाँधी जी तक पहुँची और उन्होंने ने भी इस पर टिप्पणी की। आज जब मैं इस कहानी संग्रह को दुबारा पढ़ता हूँ तो यह जानने की कोशिश करता हूँ कि एक कहानियों में ऐसा क्या था जो इस सारे विवाद की जड़ बना।
इस कहानी संग्रह में कुल आठ कहानियाँ हैं – चॉकलेट,पालट,हम फ़िदाये लखनऊ,कमरिया नागिन -सी बल खाये, चॉकलेट चर्चा, हे सुकुमार, व्यभिचारी प्यार और जेल में। इन कहानियों का अंदाज़ – ए – बयाँ उग्र की अपनी शैली में है – बेलौस और कथ्य को सीधे सीधे कहना जैसा हम उनकी आत्मकथा अपनी ख़बर में भी देखते हैं। इन कहानियों में पारसी थिएटर हैं, ट्रेन में होने वाली चर्चाएँ हैं, फ़राख़ दिल ज़मींदारों के क़िस्से हैं और इन सब में वे लड़के हैं जो इन कहानियों के सूत्रधार बनते हैं।लड़के जिन्हें कभी चॉकलेट कहा जाता है, कभी पॉकेट बुक तो कभी पालट,
“अच्छा स्पष्ट सुनो, चॉकलेट की परिभाषा याद कर लो।मुमकिन है कभी तुम्हें भी उसका सामना करना पड़े।‘चॉकलेट’ देश के उन भोले-भाले,कमसिन और सुंदर लड़कों को कहते हैं, जिन्हें समाज के राक्षस अपनी ‘वासना’ की तृप्ति के लिए सर्वनाश के मुख में धकेलते हैं। यह बच्चे समाज के अच्छे- अच्छों तक से नष्ट किए जाते हैं और दुश्चरित्र बनाए जाते हैं।प्रान्त-प्रान्त में इनके भिन्न-भिन्न पर्याय हैं। हमारे युक्त-प्रदेश के लोग इन्हें चॉकलेट, पॉकेट-बुक आदि नामोपनामों से याद करते हैं।अनेक अनेक ऐसे उपनाम भी हैं जिन्हें सभ्य भाषा लिख नहीं सकती”
ये संग्रह पढ़ते हुए लगता है कि जैसे भारत यौनविकार के एक आपातकाल में हैं जहाँ हर दूसरा व्यक्ति पीडोफिलिक है, किशोर इस शोषण का शिकार हो रहे हैं और कोई भी जगह चाहे वह सिनेमा हॉल हो या किसी के घर की बैठक सुरक्षित नहीं है। हम जैसे जैसे कहानियों की दुनिया में आगे बढ़ते हैं हम जान पाते हैं कि इस समय के समाज में हर जगह ग्रूमिंग का जाल बिछाए लोग है।मसलन संग्रह की कहानी पालट में एक पात्र महाशय जी हैं जो स्थानीय डिप्टी कलेक्टर के पुत्र हरिसुन्दर वर्मा के पुत्र के ‘प्रेम’ में हैं जिससे परिचय बढ़ाने को वह हिंदी सिनेमा की तरकीबें इस्तेमाल करते हैं और परिचय प्रगाढ़ हो जाने के बाद नित्य उसका ‘पवित्र चुम्बन’ लेते हैं, हरिसुंदर को समझाते हुए वह कहते हैं,
“बोले – चुम्बन पवित्र प्रेम-चिह्न है।माँ बच्चे को पवित्र प्रेम से चूमती है। भाई अपनी छोटी बहन या छोटे भाई का पवित्रतापूर्ण चुम्बन लेता है।”
इस चूमने की परिणति यह होती है कि हरिसुंदर बीमार हो जाता है, बीमारी की वज़ह से परीक्षा नहीं दे पाता और फेल हो जाता है। कहानी का अंत महाशय जी के ‘रुपए बिगड़ने’ और हरिसुंदर की मृत्यु में होता है। कहानी का सूत्रधार महाशय जी को उसके घर न आने की चेतावनी देता है ताकि वे कहीं उसके घर के बच्चों को चॉकलेट या पालट न बना दें।
मृत्यु की यह घटना अन्य कहानियों में भी घटित होती दिखती है। इन कहानियों में महाशय जी जैसे पात्र कभी जेल जाते दिखते हैं,कभी पीटे जाते हैं और कभी ‘व्यभिचारी प्यार’ के कवि कल्याणचंद्र की तरह पालट के नाम रुपए छोड़ अपने अपराधबोध में आत्महत्या कर लेते हैं। जब इस तरह के पात्र सजा पाते हैं तब उग्र उस सज़ा से संतुष्ट नहीं दिखते । हम फ़िदाये लखनऊ का पात्र प्रसाद जो अध्यापक है, उसे इन कामों की वज़ह से स्कूल से निकाल दिया जाता है। बाद में वह कलकत्ते चला जाता है और इन्ही कामों की वज़ह से उसे सात साल की सजा मिलती है और कहानी का सूत्रधार टिप्पणी करता है,
“उसे फाँसी क्यों न दे दी गई। ऐसे नर-पशुओं को तो प्राणदंड ही मिलना चाहिए”
इस संग्रह को पढ़ते हुए यह सवाल आता है कि उग्र इन कहानियों के माध्यम से क्या कहना चाहते थे? ठहरकर पढ़ने पर मालूम होता है कि इन कहानियों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह पीडोफ़ीलिया को इंद्रधनुषी प्यार के साथ मिला देती है और ऐसा कोई संकेत, सूत्र पाठक के सामने नहीं रखती जिससे दोनों के अंतर को स्पष्ट किया जा सके। यह तकनीक दुनिया के कई समाजों में इस्तेमाल होती आई हैं मसलन अमेरिका के कुछ राज्यों में दक्षिणपंथी यही बात कह रहे थे कि अगर गे पुरुषों को स्कूल में अध्यापक के तौर पर रखा गया तो वे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों का यौन शोषण करेंगे, चॉकलेट कहानी संग्रह अंतत: उसी वैचारिकी की पाले में खड़ा दिखायी देता है। पलट कहानी में तो सूत्रधार साफ़ साफ़ कहता है,
“क्या आप इसे प्रेम कहते हैं? प्रेम?अभागा प्रेम भी सोचता होगा कि किसी से काम पड़ा है।पुरुष पर-उसके सौंदर्य के लिए-पुरुष का प्रेम होना! मेरी समझ से तो भाई, जैसे ‘नारि न मोह नारि के रूपा’ वैसे ही ‘पुरुष न मोह पुरुष के रूपा’ भी होना चाहिए।”
यह ठीक है कि यह संग्रह इसी थीम पर आधारित है लेकिन इस संग्रह की कहानी चॉकलेट चर्चा का ‘चॉकलेट’ 21-22 साल का कॉलेज में पढ़ने वाला युवक है जिसकी मूल समस्या असल में रैगिंग है जिसे उग्र ‘चॉकलेटपंथी’ में रिड्यूस कर देते हैं। दूसरे,इस किताब में एक बहुत महीन प्रच्छन सांप्रदायिकता है। यह वही समय था जब उर्दू को मुसलमानों की भाषा के रूप में देखे जाने की बात स्थापित हो रही थी, भारतेन्दु ‘उर्दू का स्यापा’ में उर्दू बीबी की मौत की घोषणा कर चुके थे। इस कहानी संग्रह में लगभग हर पात्र किशोर लड़कों के सौन्दर्य की प्रशंसा में उर्दू में लिखे शेर पढ़ता रहता है और प्रकारांतर से एक समूची भाषा को पीडोफ़िलिया की भाषा में बदल देने का प्रयास करता दिखायी देता है। एक पात्र जब बहस के लिए यह कहता है कि सूरदास भी कृष्ण पर सौ जान से फ़िदा थे या तुलसी ने विनय पत्रिका में राम का नख शिख वर्णन किया है तो सूत्रधार तुरंत उसे टोकते हुए कहता है,
“चुप भी रहो! पूरे नास्तिक जान पड़ते हो। लौंडों का समर्थन करने के लिए भगवान रामचन्द्र और श्रीकृष्ण तक को घसीट ले रहे हो।”
सांप्रदायिकता के झीने आवरण में लिपटी यह चॉकलेट उस समय की प्रतिगामी सोच का पता देती है जब इन्द्रधनुषी प्यार के रंग में नहाने, उसका उत्सव मनाने की जगह उसे एक यौन विकृति में बदल दिया जा रहा था।
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चॉकलेट (कहानी संग्रह)
पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’
प्रकाशन वर्ष 1927
पुनर्प्रकाशन- राजपाल एंड संस 2021
Vivek Kumar Shukla
लेखक हिन्दी साहित्य के अध्येता हैं, एक उपन्यास प्रकाशित। फ़िलहाल डेनमार्क की ओर्हुस यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं।