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अमेरिकी ट्रेड डील के दबाव में UPI पेमेंट पर ट्रांजेक्शन चार्ज लेने की हो रही तैयारी?

Satish Verma Satish Verma | 07 Aug, 2026 · 6 min read
अमेरिकी ट्रेड डील के दबाव में UPI पेमेंट पर ट्रांजेक्शन चार्ज लेने की हो रही तैयारी?

भारत में UPI की शुरुआत के बाद से ही अमेरिकी पेमेंट कंपनियां Visa और Mastercard संभावित कारोबार के नुकसान का मुद्दा उठाती रही हैं।

ऐसे समय में जब अमेरिका के साथ भारत सरकार ट्रेड डील को फाइनल करने की तैयारी में हैं उसी समय संसद में एक बिल पेश किया गया है जिसमें UPI और Rupay Debit Card के पेमेंट पर शुल्क लगाने की अनुमति मिल सकती है। यह अकारण नहीं है। दरअसल अमेरिका लगातार अपने अधिकांश व्यापारिक साझेदारों पर उनके डिजिटल पेमेंट सिस्टम में सभी कंपनियों पर ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ बनाने का दबाव डालता रहा है। UPI पेमेंट पर शुल्क लगने की तैयारी को भी आर्थिक जानकार ट्रंप प्रशासन के दबाव बनाने की नीति के रूप में ही देख रहे हैं।

Indian Express के अनुसार, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने मार्च 2026 में घरेलू कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली भारत की डिजिटल भुगतान नीतियों को विदेशी व्यापार बाधा के रूप में वर्गीकृत किया था। विभिन्न क्षेत्रों में ऐसी बाधाओं को हटाना ट्रेड डील के तहत अमेरिका की प्रमुख मांगों में शामिल है जिसमें UPI पेमेंट और क्रेडिट लेनदेन पर शुल्क लगाना भी है। बता दें कि भारत में UPI की लोकप्रियता लगातार बढ़ी है। इसकी सबसे बड़ी वजह इसका सुविधाजनक और फिलहाल बिना ट्रांजैक्शन शुल्क वाला होना है। हालांकि प्रस्तावित बदलावों के बाद बैंक और पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर UPI और RuPay डेबिट कार्ड से भुगतान पर शुल्क लगा सकते हैं और संभव है कि इसका बोझ आखिरकार ग्राहकों तक पहुंचे।

2016 में भारत में UPI की शुरुआत के बाद से अमेरिकी पेमेंट कंपनियां Visa और Mastercard संभावित कारोबार के नुकसान का मुद्दा उठाती रही हैं। भारत में लोग कार्ड से भुगतान करने के बजाय तेजी से मुफ्त UPI पेमेंट की ओर बढ़े हैं।

दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के मुताबिक, इन कंपनियों को UPI और RuPay पर जीरो ट्रांजैक्शन चार्ज, सरकार द्वारा RuPay को बढ़ावा देने और UPI के जरिए क्रेडिट कार्ड भुगतान में RuPay को शुरुआती बढ़त दिए जाने पर आपत्ति रही है। GTRI के अनुसार, इन नीतियों ने RuPay को मजबूत किया है और अमेरिकी कार्ड कंपनियों की फीस से होने वाली कमाई को प्रभावित किया है।

Visa और Mastercard ऐसे मॉडल पर काम करती हैं जिसमें बैंक, पेमेंट प्रोसेसर और कार्ड नेटवर्क व्यापारियों के ट्रांजैक्शन से फीस कमाते हैं। UPI जैसा व्यापक, इंटरऑपरेबल और जीरो मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR वाला प्लेटफॉर्म इस कमाई को सीमित करता है। MDR वह शुल्क है जो भुगतान को प्रोसेस करने वाले बैंक व्यापारियों से लेते हैं। इसका इस्तेमाल ट्रांजैक्शन प्रोसेसिंग, सेटलमेंट और पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत पूरी करने में किया जाता है।

GTRI के मुताबिक RuPay अमेरिकी कंपनियों के लिए एक और चुनौती है, क्योंकि यह भारत का अपना कार्ड नेटवर्क है और इसे देश की घरेलू नीतियों के साथ ज्यादा करीब से जोड़ा जा सकता है। मार्च में यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव यानी USTR ने भारत की उन डिजिटल पेमेंट नीतियों को विदेशी व्यापार बाधा के रूप में वर्गीकृत किया था, जिन्हें वह घरेलू कंपनियों के पक्ष में मानता है। ऐसे कई मुद्दे प्रस्तावित भारत-अमेरिका ट्रेड डील में अमेरिका की प्रमुख मांगों में शामिल हैं।

USTR ने कहा था कि उसने अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट सर्विस कंपनियों को UPI इकोसिस्टम में समान अवसर नहीं मिलने को लेकर चिंता जताई है। इसमें खास तौर पर UPI के जरिए होने वाले क्रेडिट ट्रांजैक्शन में RuPay के मुकाबले अमेरिकी कंपनियों को समान अवसर नहीं मिलने की बात कही गई। नवंबर 2020 में नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी NPCI ने UPI के जरिए ऑनलाइन भुगतान शुरू करने वाले थर्ड-पार्टी ऐप प्रोवाइडर्स के लिए 30 प्रतिशत मार्केट शेयर की सीमा घोषित की थी। पहले इस सीमा को जनवरी 2023 से लागू किया जाना था, लेकिन NPCI ने इसकी समयसीमा आगे बढ़ा दी। मौजूदा समयसीमा दिसंबर 2026 निर्धारित है।

USTR के अनुसार,

31 दिसंबर 2025 तक अमेरिका के स्वामित्व वाली दो इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट ऐप कंपनियां मिलकर भारत के 80 प्रतिशत से ज्यादा UPI ट्रांजैक्शन प्रोसेस कर रही थीं। ये कंपनियां Walmart समर्थित PhonePe और Google Pay हैं।

भारत ने ट्रेड डील के तहत अब तक अमेरिका की कई मांगों पर सहमति जताई है, खासकर डिजिटल सेक्टर में। सबसे प्रमुख कदमों में हालिया केंद्रीय बजट में भारत ने विदेशी कंपनियों को देश में डेटा सेंटर स्थापित करने पर 2047 तक टैक्स में छूट देने की घोषणा की। इसे अमेरिका की एक महत्वपूर्ण मांग से जोड़कर देखा गया। पिछले साल सरकार ने टैरिफ दबाव के बीच 6 प्रतिशत का तथाकथित ‘Google Tax’ भी खत्म कर दिया था। अमेरिका का कहना था कि डिजिटल सर्विस टैक्स उसकी Apple, Amazon, Google और Facebook जैसी टेक कंपनियों के खिलाफ है।

कांग्रेस के संचार विभाग के प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने गुरुवार, 6 अगस्त को एक्स पर दावा किया कि कानूनी संशोधन के पीछे असली वजह अमेरिका का दबाव है।


इसके जवाब में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि MDR केवल व्यापारियों यानी मर्चेंट पर लागू होता है, ग्राहकों या अंतिम उपभोक्ताओं पर नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। उन्होंने लिखा कि यह प्रक्रिया संसद द्वारा Taxation and Other Laws (Amendment) Bill, 2026 पारित किए जाने के बाद आगे बढ़ेगी। इस विधेयक में Payment and Settlement Systems Act, 2007 की धारा 10A में संशोधन का प्रस्ताव है।


भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जिसके घरेलू पेमेंट सिस्टम को लेकर अमेरिका ने आपत्ति जताई है। पिछले महीने अमेरिका ने US Trade Act of 1974 की धारा 301 के तहत ब्राजील पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया। यह प्रावधान अमेरिकी सरकार को उन देशों के खिलाफ जांच और कार्रवाई करने की अनुमति देता है जिनकी आर्थिक नीतियों को अमेरिकी व्यापार के लिए भेदभावपूर्ण या बाधा पैदा करने वाला माना जाता है। ब्राजील के खिलाफ कार्रवाई का आधार वहां की सरकार के कुछ ऐसे कदमों को बताया गया, जो कथित तौर पर अमेरिकी कंपनियों को नुकसान पहुंचाते हैं। इनमें कम लागत वाला इंस्टेंट पेमेंट प्लेटफॉर्म ‘Pix’ भी शामिल है।

USTR ने कहा कि ब्राजील के सेंट्रल बैंक ने Pix को बनाया है और वही इसका मालिक, संचालक और नियामक है। अमेरिकी कंपनियों ने चिंता जताई है कि ब्राजील का केंद्रीय बैंक Pix को विशेष सुविधा देता है, जिससे अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट सर्विस कंपनियों को नुकसान होता है। ।

USTR ने और कई देशों की नीतियों पर भी सवाल उठाए हैं। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक इंडोनेशिया का National Payment Gateway यानी NPG यह अनिवार्य करता है कि देश के भीतर होने वाले सभी रिटेल डेबिट और क्रेडिट कार्ड ट्रांजैक्शन इंडोनेशिया में स्थित स्विचिंग संस्थानों के जरिए ही प्रोसेस किए जाएं। एक नए समझौते के जरिए इस मुद्दे को हल करने की कोशिश की गई है।

खाड़ी सहयोग परिषद यानी GCC के सदस्य देशों को लेकर भी USTR ने कहा है कि कई देश अपने घरेलू कार्ड ब्रांड विकसित कर रहे हैं और ऐसे नियम लागू कर रहे हैं जो अमेरिकी पेमेंट कंपनियों की बाजार तक पहुंच को सीमित करते हैं। अमेरिका ने कतर के उस फैसले पर भी आपत्ति जताई जिसमें फरवरी 2025 से सरकारी संस्थानों में अंतरराष्ट्रीय कार्ड स्वीकार करना बंद करने की घोषणा की गई थी। इसके अलावा सऊदी अरब के केंद्रीय बैंक ने अमेरिकी पेमेंट नेटवर्क द्वारा दी जाने वाली कुछ सेवाओं को देश के भीतर स्थानीय स्तर पर संचालित करने की अनिवार्यता लागू की है। अमेरिका ने इस पर भी आपत्ति जताई है।

इस पूरे विवाद के केंद्र में एक बड़ा सवाल ह। क्या भारत में UPI और RuPay को मिलने वाली जीरो-फीस भविष्य में जारी रहेगी, या भारत-अमेरिका ट्रेड डील और डिजिटल पेमेंट सेक्टर में ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ की अमेरिकी मांग के बीच मौजूदा व्यवस्था में बदलाव होगा? फिलहाल सरकार का कहना है कि MDR को लेकर अंतिम फैसला नहीं हुआ है और यदि इसे लागू किया भी जाता है तो MDR व्यापारियों पर लागू होता है, सीधे ग्राहकों पर नहीं।

Satish Verma

Satish Verma

सतीश वर्मा पेशे से पत्रकार हैं। हिंदी की मुख्यधारा की पत्रकारिता में इन्हें 20 साल से ज्यादा का अनुभव है।