कर्नाटक में 7,500 से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए जाने के मामले में भाजपा एजेंट पर FIR
कर्नाटक की मतदाता सूचियों से नाम हटाने के लिए दाखिल करीब 4,000 आवेदनों में अधिकांश मुस्लिम मतदाताओं से संबंधित थे।
कर्नाटक की बेल्लारी सिटी विधानसभा सीट पर मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटवाने की कथित कोशिश का मामला सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी के बूथ स्तर के एजेंट टी. श्रीनिवास मोथकुर पर विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान फॉर्म 7 के जरिए 7,500 हजार से अधिक मतदाताओं के नाम हटाने की मांग करने का आरोप है। दुरुपयोग को लेकर उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है।
The Hindu ने मंगलवार को प्रकाशित रिपोर्ट में बताया कि,
कर्नाटक की मतदाता सूचियों से नाम हटाने के लिए दाखिल करीब 4,000 आवेदनों में अधिकांश मुस्लिम मतदाताओं से संबंधित थे। यह जानकारी फॉर्म 10 के आंकड़ों पर आधारित है, जिसमें फॉर्म 7 के तहत प्राप्त आवेदनों का विवरण संकलित किया जाता है।
फॉर्म 7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी नाम को शामिल करने पर आपत्ति जताने या पहले से दर्ज नाम हटाने की मांग के लिए होता है। राजनीतिक दल अलग-अलग मतदान केंद्र क्षेत्रों के लिए बूथ स्तर के एजेंट नियुक्त करते हैं। ये एजेंट मतदाता सूची तैयार करने और उसके पुनरीक्षण के दौरान बूथ स्तर के अधिकारियों के साथ काम करते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार,
कर्नाटक में फॉर्म 7 के कथित दुरुपयोग से जुड़ी यह छठी प्राथमिकी है। इससे पहले दर्ज पांच मामलों में से तीन में भाजपा सदस्यों को आरोपी बनाया गया है। कांग्रेस का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है। हालांकि, मोथकुर ने नाम हटाने की मांग करने के आरोप से इनकार किया है।
मोथकुर ने 21 सितंबर को बेल्लारी सिटी कॉरपोरेशन को पत्र लिखकर कहा था कि कई बूथ स्तर के अधिकारियों ने उनके फॉर्म 7 आवेदन स्वीकार करने से मना कर दिया। इसके बाद उन्होंने बाकी आवेदन सीधे निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी को सौंप दिए। उसी दिन चुनाव अधिकारियों ने जवाब दिया कि संबंधित मतदाताओं के कहीं और पंजीकृत होने, अनुपस्थित रहने या स्थायी रूप से दूसरी जगह चले जाने के दावों के समर्थन में दस्तावेज अथवा अन्य जानकारी नहीं दी गई थी। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि बिना पर्याप्त आधार के ऐसे दावों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी ने अपने जवाब में बताया कि,
कोई बूथ स्तर का एजेंट एक दिन में किसी बूथ स्तर के अधिकारी को दस से अधिक आवेदन नहीं दे सकता। दावे और आपत्तियां दर्ज करने की अवधि में किसी एजेंट की ओर से 30 से अधिक आवेदन आने पर निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी या सहायक अधिकारी को उनकी दोबारा जांच करनी होती है। एजेंटों को यह घोषणा भी देनी होती है कि उन्होंने आवेदनों में दर्ज विवरण का सत्यापन किया है और उसे सही पाया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य नाम हटाने की मांग को जांच के दायरे में रखना और गलत आवेदनों के आधार पर कार्रवाई रोकना है।
इसके बाद 22 सितंबर को मोथकुर ने चुनाव अधिकारियों को एक और पत्र लिखा। इसमें उन्होंने बेल्लारी विधानसभा क्षेत्र की प्रारूप मतदाता सूची में शामिल 7,561 मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियां दाखिल करने की तैयारी बताई और नामों की सूची संलग्न की। अधिकारियों ने यह अनुरोध भी खारिज कर दिया। उनका कहना था कि केवल शिकायत के आधार पर मतदाताओं के पंजीकरण की पुष्टि नहीं की जा सकती।
इसके बाद कांग्रेस के बूथ स्तर के एजेंट गौतम एस. ने मोथकुर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन मतदाताओं के नाम हटवाने की कोशिश की गई, उनमें अधिकांश अल्पसंख्यक समुदाय से थे। मोथकुर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता में लोक शांति के खिलाफ शरारत से संबंधित प्रावधान के तहत मामला दर्ज किया गया है। मोथकुर ने कहा कि उन्होंने और एक अन्य बूथ एजेंट ने ऐसे मतदाताओं की पहचान की थी, जो स्थानांतरित हो चुके थे या अनुपस्थित थे। उनके मुताबिक, यह विवरण केवल सत्यापन के लिए निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी को दिया गया था। उन्होंने मतदाताओं के नाम हटाने की मांग करने से इनकार किया।
गुरुवार को कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अंबु कुमार ने कहा कि थोक में फॉर्म 7 आवेदन दाखिल करने में अनियमितता पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई होगी। जिला निर्वाचन अधिकारियों और निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों को भेजे परिपत्र में उन्होंने बताया कि उनके कार्यालय को बड़े पैमाने पर आवेदन मिलने की सूचनाएं प्राप्त हुई हैं। इनमें कुछ आवेदन कथित तौर पर वास्तविक नहीं थे। अधिकारियों को इनकी जांच करने के निर्देश दिए गए हैं।
यह घोषणा डीके शिवकुमार और कांग्रेस विधायकों के चुनाव अधिकारी कार्यालय के बाहर प्रदर्शन के बाद हुई। घोषणा के बाद शिवकुमार ने प्रदर्शन वापस ले लिया। जून 2025 में शुरू हुए SIR की प्रक्रिया और गति पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
चिंताएं जताई गई हैं कि इससे वास्तविक मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं। दिए गए विवरण के अनुसार, मई में सुप्रीम कोर्ट ने इस कवायद की वैधता बरकरार रखी थी, लेकिन स्पष्ट किया था कि इससे निर्वाचन आयोग को किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं मिल जाता।