जर्मनी में दक्षिणपंथी पार्टी की जीत: हिटलर की वापसी?
जर्मनी में धुर दक्षिण और वाम का मिलन: क्या आर्थिक हताशा मिटा रही है विचारधाराओं की दूरी?
सैक्सोनी-अनहाल्ट में AfD की ऐतिहासिक जीत ने जर्मनी की राजनीति को हिला दिया है। बहुमत से तीन सीट दूर खड़ी धुर-दक्षिणपंथी पार्टी को सत्ता तक पहुँचाने की चाबी अब एक ऐसे दल के पास हो सकती है, जिसकी आर्थिक जड़ें वाम में हैं। लेकिन रूस, आप्रवासन और व्यवस्था-विरोध पर दोनों की भाषा आश्चर्यजनक रूप से मिलती है।
जर्मनी की राजनीति में 6 सितंबर 2026 की तारीख लंबे समय तक याद रखी जाएगी। पूर्वी राज्य सैक्सोनी-अनहाल्ट के चुनाव में धुर-दक्षिणपंथी ‘अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी’ यानी AfD ने करीब 43.8 प्रतिशत मत और 83 सदस्यीय विधानसभा में 39 सीटें जीत लीं। बहुमत के लिए 42 सीटें चाहिए। यानी सरकार बनाने से वह केवल तीन सीट दूर है। 2021 में इसी दल को 20.8 प्रतिशत मत मिले थे। पाँच वर्ष में उसका समर्थन लगभग दोगुना हो गया, जबकि राज्य पर दो दशक से शासन कर रही क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) करीब 17.2 प्रतिशत पर सिमट गई। मतदान भी 76.5 प्रतिशत के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा। इसे केवल कम मतदान से पैदा हुआ आकस्मिक नतीजा नहीं कहा जा सकता।
इस चुनाव का सबसे विचित्र पहलू यह है कि दक्षिणपंथी AfD के लिए सत्ता का रास्ता वाम खेमे का दल वागेनक्नेख्त एलायंस (BSW) खोल सकता है। BSW को पाँच सीटें मिली हैं। यदि उसके विधायक AfD का साथ देते हैं, तो संख्याबल बहुमत के पार पहुँच सकता है। CDU, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी और दूसरे मुख्यधारा के दल फिलहाल AfD के साथ किसी समझौते से इनकार कर रहे हैं। जर्मनी में इसे ‘ब्रांडमाउअर’, अर्थात धुर-दक्षिणपंथ के चारों ओर खड़ी राजनीतिक आग की दीवार, कहा जाता है। लेकिन जब मतदाता किसी दल को आधे के करीब वोट दे दें, तो यह दीवार नैतिक संकल्प के साथ-साथ अंकगणित की भी परीक्षा बन जाती है।
क्या BSW चरम वामपंथी दल है?
BSW को सीधे ‘चरम वाम’ कहना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। इसकी संस्थापक सहारा वागेनक्नेख्त लंबे समय तक पूर्वी जर्मनी की कम्युनिस्ट परंपरा से निकली पार्टी Die Linke की प्रमुख नेता थीं। आर्थिक मामलों में BSW मजबूत कल्याणकारी राज्य, ऊँची मजदूरी, पेंशन की सुरक्षा और बड़े कॉरपोरेट हितों पर अंकुश जैसी वामपंथी बातें करता है। पर आप्रवासन, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक उदारवाद पर उसका रुख कई बार रूढ़िवादी दिखाई देता है। इसीलिए राजनीतिक वैज्ञानिक उसे ‘वाम-रूढ़िवादी’ या ‘पॉपुलिस्ट’ कहते हैं।
AfD और BSW की वैचारिक उत्पत्ति भिन्न है। AfD जर्मन राष्ट्रवाद, कड़ी आप्रवासन नीति, यूरोपीय संघ के प्रति संदेह और पारंपरिक सांस्कृतिक पहचान पर जोर देता है। फिर भी दोनों दल यूक्रेन को हथियार भेजने का विरोध करते हैं, रूस से संबंध सामान्य करने और प्रतिबंधों पर पुनर्विचार की वकालत करते हैं तथा बर्लिन और ब्रसेल्स के राजनीतिक प्रतिष्ठान को आम लोगों से कटा हुआ बताते हैं। यही साझा धरातल संभावित सहयोग को संभव बनाता है। राजनीति की पुरानी सीधी रेखा, जिसके एक छोर पर वाम और दूसरे पर दक्षिण था, अब कुछ-कुछ घोड़े की नाल जैसी दिख रही है।
ध्यान रहे कि सैक्सोनी-अनहाल्ट कभी जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य यानी पूर्वी जर्मनी का हिस्सा था। 1990 में एकीकरण के बाद पश्चिमी जर्मनी ने भारी निवेश किया, सड़कें, रेल, नगर और उद्योग आधुनिक हुए; फिर भी आर्थिक विषमता पूरी तरह नहीं मिट सकी। राज्य की आबादी 1990 के लगभग 29 लाख से घटकर आज करीब 21–22 लाख रह गई है। युवाओं, खासकर शिक्षित महिलाओं के पश्चिम की ओर जाने से अनेक छोटे शहरों में उम्रदराज आबादी, खाली घर और श्रमिकों की कमी बढ़ी।
AfD की यात्रा: यूरो-विरोध से राष्ट्रवाद तक
AfD का जन्म 2013 में यूरो मुद्रा और यूरोपीय कर्ज-संकट के विरोध से हुआ था। उसके शुरुआती नेतृत्व में अर्थशास्त्री और विश्वविद्यालयों से जुड़े रूढ़िवादी चेहरे प्रमुख थे। 2015 के शरणार्थी संकट के बाद पार्टी का केंद्र तेजी से आप्रवासन-विरोध, इस्लाम-विरोध और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर खिसक गया। पूर्वी राज्यों में उसका संगठन अधिक उग्र और अधिक सफल दोनों हुआ। जिस पार्टी को आरंभ में असंतुष्ट रूढ़िवादियों का अस्थायी मंच समझा गया था, उसने धीरे-धीरे स्थायी मतदाता वर्ग, स्थानीय कार्यकर्ता और सोशल मीडिया की प्रभावी मशीन खड़ी कर ली।
2025 के संघीय चुनाव में AfD पूरे जर्मनी में लगभग 21 प्रतिशत मत लेकर दूसरी बड़ी शक्ति बनी, लेकिन पूर्वी राज्यों में उसका प्रदर्शन कहीं मजबूत था। सैक्सोनी-अनहाल्ट में उसे पार्टी-सूची के करीब 37.1 प्रतिशत मत मिले थे। सितंबर 2026 के प्रांतीय चुनाव का 43.8 प्रतिशत इसलिए अचानक आया विस्फोट नहीं, बल्कि कई चुनावों से बढ़ रही धारा का अगला चरण है। विशेष बात यह है कि विरोधी दलों द्वारा सत्ता से दूर रखे जाने पर AfD स्वयं को ‘सबसे अधिक वोट पाने के बावजूद दबाई गई आवाज’ के रूप में प्रचारित करता रहा। यह पीड़ित-भाव उसकी राजनीतिक पूँजी बन गया।
संपत्ति का अंतर और भी गहरा है। जर्मन केंद्रीय बैंक के 2017 के सर्वेक्षण में पश्चिमी जर्मनी के परिवारों की औसत संपत्ति लगभग 92,500 यूरो थी, जबकि पूर्वी जर्मनी में केवल 23,400 यूरो। यानी लगभग एक चौथाई। कारण केवल वर्तमान वेतन नहीं है। पश्चिम में कई परिवारों को मकान, जमीन, कारोबार और वित्तीय संपत्ति पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिली; कम्युनिस्ट पूर्व जर्मनी में निजी पूँजी संचय की गुंजाइश सीमित थी। एकीकरण के बाद भी विरासत का यह अंतर बना रहा। इसलिए एक ही देश और समान नागरिकता के बावजूद शुरुआती रेखा समान नहीं थी।
यह कहना गलत होगा कि पूर्वी जर्मनी केवल गरीबी की कहानी है। बेरोजगारी एकीकरण के शुरुआती वर्षों की तुलना में बहुत घटी है और कई औद्योगिक परियोजनाएँ वहाँ पहुँची हैं। फिर भी सैक्सोनी-अनहाल्ट को जर्मनी के सबसे कम आय वाले राज्यों में गिना जाता है। ऊँची ऊर्जा कीमतें, उद्योगों पर दबाव, महँगाई, पेंशन को लेकर चिंता और सार्वजनिक सेवाओं के सिमटने का डर यहाँ राष्ट्रीय औसत से अधिक तीखा महसूस होता है। आर्थिक आँकड़े बेहतर होने पर भी ‘हम पीछे छोड़ दिए गए’ की भावना बनी रह सकती है।
AfD का मतदाता केवल पूँजीपति नहीं
धुर-दक्षिणपंथ को केवल धनी पूँजीपतियों की राजनीति मानना भी तथ्य से मेल नहीं खाता। 2025 के जर्मन संघीय चुनाव के मतदाता-अध्ययनों में AfD को ब्लू-कॉलर कामगारों के बीच लगभग 38 प्रतिशत समर्थन मिला, जबकि अपनी आर्थिक स्थिति खराब बताने वालों में उसका समर्थन करीब 39 प्रतिशत था। 2024 के थुरिंगिया चुनाव में खराब आर्थिक स्थिति बताने वाले मतदाताओं में 51 प्रतिशत और कामगारों में 49 प्रतिशत ने AfD को वोट दिया था। सैक्सोनी में उसी वर्ष कामगारों के बीच यह आँकड़ा 45 प्रतिशत था।
यह बदलाव यूरोपीय वामपंथ के लिए भी गंभीर प्रश्न है। बीसवीं सदी में फैक्टरी मजदूर, ट्रेड यूनियन सदस्य और कम आय वाले परिवार सोशल डेमोक्रेट या कम्युनिस्ट दलों का स्वाभाविक आधार माने जाते थे। अब उद्योग बंद होने, अस्थायी रोजगार, कस्बों के खाली होने और सांस्कृतिक परिवर्तन के बीच वही मतदाता आर्थिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सीमा को एक ही प्रश्न की तरह देखने लगा है। पारंपरिक वाम यदि केवल महानगरीय, शिक्षित और सांस्कृतिक रूप से उदार वर्ग की भाषा बोलता दिखे, तो राष्ट्रवादी दक्षिण कल्याणकारी राज्य और कामगार-सम्मान की भाषा उधार ले लेता है। BSW इसी खाली जगह को बाईं ओर से भरने का प्रयास है।
इन आँकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हर AfD मतदाता गरीब है या केवल आर्थिक संकट के कारण दक्षिणपंथी हुआ है। आप्रवासन, अपराध का भय, राष्ट्रीय पहचान, जलवायु नीतियों की लागत, कोविड काल का अविश्वास और मुख्यधारा मीडिया से असंतोष भी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन यह जरूर स्पष्ट होता है कि असुरक्षित श्रमिक वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अब पारंपरिक समाजवादी या सोशल डेमोक्रेटिक दलों के बजाय राष्ट्रवादी दल में संरक्षण ढूँढ रहा है। AfD मुक्त बाजार की कुछ नीतियाँ रख सकता है, पर चुनावी भाषा में वह स्वयं को ‘पकिया जर्मनों’ की ढाल बनाकर प्रस्तुत करता है।
वाइमर गणराज्य की चेतावनी
जर्मनी का इतिहास इस समानांतर उभार को भयावह संदर्भ देता है।
1928 के संसदीय चुनाव में नाजी पार्टी को केवल 2.6 प्रतिशत मत मिले थे। महामंदी के बाद 1930 में उसका हिस्सा 18.3 प्रतिशत और कम्युनिस्ट पार्टी KPD का 13.1 प्रतिशत हो गया। जुलाई 1932 तक नाजी पार्टी 37.3 प्रतिशत और KPD 14.3 प्रतिशत पर पहुँच गई। दोनों को मिलाकर आधे से अधिक मत उन दलों को मिले, जो वाइमर की उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था को उसके तत्कालीन रूप में स्वीकार नहीं करते थे। दूसरी ओर मध्यमार्गी गठबंधन टूटते गए, सरकारें अस्थिर हुईं और संसद के बजाय राष्ट्रपति के आपात आदेशों पर निर्भरता बढ़ी।
लेकिन आज के जर्मनी को 1932 मान लेना ऐतिहासिक भूल होगी। वर्तमान संविधान में मजबूत संवैधानिक न्यायालय, संघीय ढाँचा, स्वतंत्र मीडिया, नागरिक समाज और नाजी अनुभव से निकली सुरक्षा-व्यवस्था है। AfD और BSW भी एक जैसे दल नहीं हैं; उनके मतदाता और लक्ष्य कई जगह टकराते हैं। फिर भी वाइमर की उपयोगी चेतावनी यह है कि लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं चलता। जब बड़ी संख्या में नागरिकों को लगता है कि स्थापित दल उनकी भाषा नहीं समझते, तब परस्पर विरोधी कट्टर विकल्प एक साथ मजबूत हो सकते हैं। वे एक-दूसरे को डर के उदाहरण की तरह इस्तेमाल करते हैं और राजनीतिक केंद्र खोखला होने लगता है।
यह प्रवृत्ति केवल जर्मनी तक सीमित नहीं है। नॉर्वे में दक्षिणपंथी प्रोग्रेस पार्टी (FrP) और वामपंथी Rødt अलग-अलग सामाजिक आधार और नीतियाँ रखते हैं, फिर भी दोनों ने समय-समय पर खुद को स्थापित सत्ता-वर्ग के विकल्प के रूप में पेश किया है।
क्या AfD सरकार बना पाएगा?
फिलहाल उत्तर स्पष्ट नहीं है। AfD के पास 39 सीटें हैं और बहुमत के लिए 42 चाहिए। BSW की पाँच सीटें निर्णायक हो सकती हैं, पर समर्थन अपने आप तय नहीं है। प्रत्यक्ष गठबंधन, बाहर से समर्थन, किसी मतदान में अनुपस्थिति या विपक्षी दलों द्वारा वैकल्पिक सरकार, कई रास्ते संभव हैं। मुख्यधारा दलों की ‘आग की दीवार’ बची रही तो AfD सबसे बड़ा दल होकर भी विपक्ष में रह सकता है। दीवार टूटी तो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पहली बार जर्मनी के किसी राज्य में धुर-दक्षिणपंथी नेतृत्व वाली सरकार बनने का रास्ता खुलेगा।
इस अंकगणित में एक और लोकतांत्रिक दुविधा छिपी है। यदि शेष दल केवल AfD को रोकने के लिए अत्यंत असमान गठबंधन बनाते हैं, तो सरकार वैधानिक तो होगी लेकिन मतदाताओं को अवसरवादी लग सकती है। यदि वे AfD को सत्ता में आने देते हैं, तो प्रशासन, शिक्षा, सार्वजनिक प्रसारण, पुलिस और प्रवासन जैसे क्षेत्रों में संस्थागत बदलाव का जोखिम होगा। बेहतर उत्तर केवल गठबंधन की तकनीक नहीं, बल्कि स्पष्ट शासन-कार्यक्रम है। स्थानीय अस्पताल, परिवहन, ऊर्जा, उद्योग और पेंशन पर दिखने योग्य परिणाम। ‘हम AfD नहीं हैं’ लंबे समय तक पर्याप्त चुनावी संदेश नहीं रह सकता।
इस परिणाम को केवल मतदाताओं की मूर्खता, नस्लवाद या अतीत की वापसी कहकर खारिज करना आसान होगा, लेकिन उससे समस्या हल नहीं होगी। नस्लवाद और लोकतंत्र-विरोधी भाषा का स्पष्ट प्रतिरोध जरूरी है; साथ ही उन ठोस परिस्थितियों को सुनना भी जरूरी है जिनमें ऐसा वोट पैदा होता है। जैसे घटती आबादी, कम विरासत-संपत्ति, असुरक्षित रोजगार, महँगी ऊर्जा, कमजोर स्थानीय सेवाएँ और निर्णय-प्रक्रिया से दूरी। यदि लोकतांत्रिक केंद्र इन प्रश्नों का विश्वसनीय उत्तर नहीं देता, तो चरम दल उनके उत्तर पर कब्जा कर लेते हैं।
सैक्सोनी-अनहाल्ट का संदेश यही है: धुर दक्षिण और वाम इसलिए पास नहीं आते कि उनकी पूरी विचारधारा एक हो गई है, बल्कि इसलिए कि दोनों को एक ही टूटे हुए भरोसे से राजनीतिक ऊर्जा मिलती है। मतदाता जब वर्तमान व्यवस्था को समस्या मानने लगे, तो दिशा से अधिक महत्वपूर्ण ‘व्यवस्था-विरोध’ हो जाता है। जर्मनी के सामने अब असली चुनौती AfD को केवल सत्ता से रोकना नहीं, बल्कि उस सामाजिक दरार को भरना है जिसने लगभग हर दूसरे मतदाता को उसकी ओर धकेल दिया। लोकतंत्र की अग्नि-दीवार संसद में बनती है, पर उसकी नींव रोजगार, सम्मान, समान अवसर और यह विश्वास है कि शासन नागरिक की बात सुनता है।
Praveen Kumar Jha
प्रवीण कुमार झा नार्वे में रहते हैं। पेशे से डॉक्टर हैं, मन से लेखक। कई चर्चित किताबें प्रकाशित