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Allahabad HC ने क्यों कहा, तानाशाह अधिकारी यूपी को दमनकारी राज्य बना देंगे?

TCN Desk TCN Desk | 8h ago · 6 min read
Allahabad HC ने क्यों कहा, तानाशाह अधिकारी यूपी को दमनकारी राज्य बना देंगे?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी (डीएम) मेधा रुपम पर कड़ी टिप्पणी की है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में उत्तर प्रदेश सरकार और गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी (डीएम) मेधा रुपम पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी को कठोर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लेने के आधारों की तीखी आलोचना की। Live Law की एक रिपोर्ट के अनुसार, 15 पन्नों के इस आदेश में कहा गया कि,

जब ब्यूरोक्रेसी और पुलिस अपने कर्तव्यों और शपथ के अनुसार काम करती है, तो राज्य के नागरिक उन्हें बहुत सम्मान देते हैं। लेकिन अगर अधिकारी अपनी शपथ को भूलकर उसके खिलाफ काम करते हैं, तो जनता उन्हें ब्रिटिश शासन की दमनकारी व्यवस्था की तरह देख सकती है। इससे लोगों में गुस्सा और असंतोष बढ़ सकता है और सामाजिक अशांति पैदा हो सकती है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर गलत काम करने वाले अधिकारी नहीं सुधरे, तो ऐसा समय दूर नहीं जब उनकी वजह से उत्तर प्रदेश एक Orwellian Dystopia यानी भय और तानाशाही से भरे राज्य में बदल जाए।


दरअसल इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ी 25 वर्षीय आकृति चौधरी पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के आरोपों को रद्द करते हुए गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) के डीएम मेधा रुपम को कड़ी फटकार लगाई है। बता दें कि मेधा रुपम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं।

कोर्ट ने सरकारी कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई और कहा कि,

अगर उत्तर प्रदेश पुलिस और अधिकारी अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करते रहे, तो उत्तर प्रदेश एक Orwellian Dystopia यानी ऐसा दमनकारी राज्य बन सकता है, जहां सरकार और प्रशासन लोगों की आजादी पर अत्यधिक नियंत्रण रखें।

बता दें कि 24 वर्षीय आकृति चौधरी को अप्रैल में नोएडा में हुए मजदूरों के प्रदर्शन के सिलसिले में हिरासत में लिया गया था। यह प्रदर्शन बाद में हिंसक हो गया था। आकृति का नाम 11 एफआईआर में दर्ज है और वह फिलहाल ग्रेटर नोएडा की कासना जेल में बंद हैं।

हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि यह रकम डीएम और उन सभी अधिकारियों के वेतन से वसूली जाए, जो इस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार थे। इनमें एनएसए के तहत हिरासत की शुरुआती रिपोर्ट तैयार करने वाले थाना प्रभारी तक शामिल हैं।

अदालत ने कहा कि,

आईएएस और आईपीएस सेवाओं में देश की सबसे प्रतिभाशाली युवा प्रतिभाएं कठिन तीन चरणों वाली चयन प्रक्रिया के बाद आती हैं। सेवा में प्रवेश करने से पहले अधिकारी संविधान, देश की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा करने तथा ईमानदारी और निष्पक्षता से अपने कर्तव्यों का पालन करने की शपथ लेते हैं। अधिकारियों को समझना चाहिए कि उनकी वफादारी किसी राजनीतिक सरकार या नेता के प्रति नहीं, बल्कि संविधान के प्रति है। उन्हें जनता के प्रति ईमानदार और निष्पक्ष रहना चाहिए। लोकतंत्र में जनता मालिक है और अधिकारी उसके सेवक हैं।

हाई कोर्ट ने कहा कि,

जब नौकरशाह और पुलिस अधिकारी अपनी शपथ के अनुसार काम करते हैं, तो जनता उन्हें बहुत ऊंचा सम्मान देती है। लेकिन जब वे अपनी शपथ भूलकर उसके खिलाफ काम करते हैं, तो लोग उन्हें ब्रिटिश शासन के दमनकारी अवशेष के रूप में देखने लगते हैं। इससे जनता में गुस्सा, नफरत और अशांति पैदा होती है।

अदालत ने चेतावनी दी कि,

यदि अधिकारी नागरिकों की आजादी का बिना उचित कारण और कानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन करते रहे, तो कोर्ट कड़े आदेश देकर पीड़ित नागरिकों को मुआवजा दिला सकता है और अधिकारियों के दमनकारी व्यवहार को रिकॉर्ड पर दर्ज कर सकता है।

अदालत ने कहा कि गौतमबुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम का आचरण निंदा के योग्य है। आकृति के खिलाफ पुलिस की रिपोर्ट में केवल आरोप थे और उनके समर्थन में कोई भरोसेमंद सबूत मौजूद नहीं था। ऐसे में डीएम से उम्मीद थी कि वह सभी रिकॉर्ड की बारीकी से जांच करेंगी। डीएम को यह भी देखना चाहिए था कि क्या आकृति के खिलाफ एनएसए जैसे कठोर और दमनकारी कानून का इस्तेमाल वास्तव में जरूरी था और सामान्य कानून पर्याप्त क्यों नहीं था।

आकृति एक छात्र कार्यकर्ता हैं, उनका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और वह मजदूरों के अधिकारों के समर्थन में प्रदर्शन कर रही थीं। रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं मिला जिससे साबित हो कि उन्होंने हिंसा भड़काई थी। अदालत ने कहा कि इन परिस्थितियों से ऐसा लगता है कि डीएम आकृति को उदाहरण बनाकर दूसरे लोगों को मजदूरों के समर्थन में सार्वजनिक स्थानों पर अपनी बात रखने से रोकना चाहती थीं। कोर्ट ने कहा कि डीएम ने अपनी संवैधानिक शपथ का उल्लंघन किया है, इसलिए आकृति को मुआवजा दिया जाना उचित है।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में एनएसए का आदेश रद्द होने के बाद भी आकृति तुरंत जेल से बाहर नहीं आ पाएंगी, क्योंकि उनके खिलाफ दूसरे आपराधिक मामले भी दर्ज हैं। उन मामलों में जमानत मिलने तक उन्हें विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहना होगा। इसके बावजूद डीएम द्वारा अधिकारों का लापरवाही से इस्तेमाल किए जाने और आकृति के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होने के कारण अदालत ने उन्हें पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।

यह रकम बिना उचित विचार किए हिरासत का आदेश जारी करने वाली डीएम और इस कार्रवाई में शामिल अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूली जाएगी। इनमें आकृति के खिलाफ शुरुआती रिपोर्ट तैयार करने वाला थाना प्रभारी भी शामिल होगा।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि डीएम और संबंधित पुलिस अधिकारियों के आचरण पर कोर्ट की नाराजगी उनकी सेवा पुस्तिका में दर्ज की जाए। हाई कोर्ट ने कहा कि एनएसए के तहत किसी व्यक्ति को हिरासत में रखना एक असाधारण कदम है। इसका इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति को जेल में रखने के लिए नहीं किया जा सकता, जिसे उसके मामले के तथ्यों के आधार पर जमानत मिलने की संभावना हो।

अदालत के मुताबिक,

डीएम द्वारा दिए गए हिरासत के आधार बार-बार दोहराए गए, अटकलों पर आधारित और केवल निजी राय जैसे थे। उन आरोपों के समर्थन में एक भी ठोस सबूत या सामग्री पेश नहीं की गई। केवल आरोप और अधिकारियों की राय किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

अदालत ने कहा कि,

हर समाज में तनाव और सरकार के कामकाज को लेकर असहमति होती है। लोगों को शांतिपूर्ण आंदोलन करने देना प्रेशर कुकर की सेफ्टी वॉल्व की तरह है। इससे लोगों के भीतर जमा गुस्सा और दबाव बाहर निकलता रहता है।

यदि विरोध-प्रदर्शनों को रोका जाएगा और लोगों की भावनाओं को दबाया जाएगा, तो एक समय के बाद वे सड़कों पर फूट सकती हैं। ऐसी स्थिति में हिंसा होने का खतरा बढ़ जाता है, जिसे नियंत्रित करना पुलिस और प्रशासन के लिए मुश्किल हो सकता है।

पैरा 25 में अदालत ने कहा कि एनएसए के तहत आकृति को लगातार जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।

गौरतलब है कि नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन के बाद हुई हिंसा के कारण पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की। कुल 15 FIR दर्ज हुईं, जिनमें सैकड़ों लोगों को आरोपी बनाया गया और कम से कम60 लोगों को जेल भेजा गया। एक महीने बाद भी आरोपियों के परिवार इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि आगे क्या होगा। इनमें राजमिस्त्री से लेकर इतिहास के छात्र, NIT से पढ़े व्यक्ति और निजी कंपनी में काम करने वाले लोग तक शामिल हैं।

जिस जिलाधिकारी मेधा रुपम ने आकृति की हिरासत का आदेश दिया था, कोर्ट ने उनके काम को “हंसी के योग्य”बताया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस की रिपोर्ट में आकृति के खिलाफ सिर्फ आरोप लगाए गए थे और उनके खिलाफ कोई ठोस और विश्वसनीय सबूत नहीं था।ऐसे में जिलाधिकारी मेधा रुपम को सावधानी से पूरे मामले की जांच करनी चाहिए थी। उन्हें यह देखना चाहिए था कि आरोपों के समर्थन में वास्तव में कोई सबूत है या नहीं। इसके बाद ही उन्हें यह तय करना चाहिए था कि आकृति के खिलाफ NSA जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल जरूरी है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि जिलाधिकारी को यह भी देखना चाहिए था कि क्या सामान्य कानून आकृति के खिलाफ कार्रवाई के लिए पर्याप्त नहीं था।