न नक्शा पास, न NOC: कैसे सरकारों की लापरवाही से मौत का जाल बनी सत्य निकेतन की PG बिल्डिंग?
वह सवाल एक बार फिर सामने आ गया है, जिसका जवाब देने में दिल्ली सरकार बार-बार नाकाम रही है—जिन इमारतों में हजारों छात्र रहते हैं, वे आखिर कितनी सुरक्षित हैं?
रविवार को सत्य निकेतन में पांच मंजिला बॉयज़ पीजी के ढहने से वह सवाल एक बार फिर सामने आ गया है, जिसका जवाब देने में दिल्ली सरकार बार-बार नाकाम रही है—जिन इमारतों में हजारों छात्र रहते हैं, वे आखिर कितनी सुरक्षित हैं?
जबकि दिल्ली में डबल क्या ट्रिपल इंजन की सरकार है। केंद्र, राज्य और अब तो एमसीडी में मेयर भी बीजेपी का ही है। तो फिर इस हादसे की जिम्मेदारी कौन लेगा। छह छात्रों की मौत का जिम्मेदार कौन है।
दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास स्थित इस इमारत का इस्तेमाल पेइंग गेस्ट हाउस के रूप में किया जा रहा था। इसमें एक बेसमेंट और उसके ऊपर पांच मंजिलें थीं। बताया जा रहा है कि बेसमेंट में मरम्मत का काम चल रहा था, तभी दोपहर करीब डेढ़ बजे पूरी इमारत भरभराकर गिर गई। शाम तक छह लोगों की मौत हो चुकी थी और कई लोगों को मलबे से बाहर निकाला गया था। बचाव दल उन लोगों की तलाश में जुटे थे, जिनके अब भी मलबे में फंसे होने की आशंका थी।
सत्य निकेतन कोई अकेला मामला नहीं है। दिल्ली में दर्जनों ऐसे इलाके हैं, जो शहर के विश्वविद्यालयों, कोचिंग सेंटरों और निजी शिक्षण संस्थानों के कारण धीरे-धीरे छात्र बस्तियों में बदल गए हैं। कटवारिया सराय, साकेत, मुनिरका, बेर सराय, मुखर्जी नगर, मालवीय नगर, कमला नगर, किंग्सवे कैंप, मॉडल टाउन और रूप नगर जैसे इलाके शैक्षणिक सत्र के दौरान छात्रों से भरे रहते हैं। इन सभी जगहों पर लगभग एक जैसा आवासीय और व्यावसायिक ढांचा विकसित हो चुका है। सत्य निकेतन भी इसी बड़ी समस्या का हिस्सा है।
लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने इस मामले में एक्स पोस्ट करते कहा कि,
छात्रों का जीवन पहले ही संघर्षों से भरा था - अब हालात जानलेवा हैं। कॉलेज या विश्वविद्यालय में अच्छे हॉस्टल न होने के कारण छात्र PG में एक छत के नीचे 40-40 की संख्या में, अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर हैं। हर छात्र की जान कीमती है और उसकी रक्षा हर हाल में होनी चाहिए।
हैरानी की बात ये है कि आरएसएसऔर बीजेपी का छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) भी इस घटना के बाद प्रदर्शन कर रहा है। अपने ही पार्टी के मेयर के इस्तीफे को लेकर रविवार को ABVP के छात्रों ने प्रदर्शन किया। ABVP के छात्रों ने सत्या निकेतन में एक पेइंग गेस्ट (PG) इमारत गिरने की घटना के बाद दिल्ली नगर निगम (MCD) के आयुक्त संजीव खिरवार और मेयर प्रवेश वाही के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। 6 सितंबर को सिविक सेंटर स्थित एमसीडी मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे एबीवीपी कार्यकर्ताओं को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया।
एबीवीपी ने दिल्ली में बड़ी संख्या में छात्रों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले पीजी आवासों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी और लापरवाही को लेकर एमसीडी की आलोचना की। प्रदर्शनकारी एमसीडी परिसर में प्रवेश कर धरने पर बैठ गए और ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए तत्काल ठोस प्रशासनिक कदम उठाने की मांग की।
संगठन ने कहा कि देशभर से छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय और राजधानी के अन्य शिक्षण संस्थानों में पढ़ने आते हैं। इनमें से बड़ी संख्या निजी पीजी और किराये के मकानों में रहती है। एबीवीपी ने जोर देकर कहा कि इन इमारतों की संरचनात्मक और अग्नि सुरक्षा की नियमित जांच कराना तथा अनिवार्य मानकों का पालन सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
यह सच है कि सरकार दिल्ली आने वाले प्रत्येक छात्र या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले हर युवा को आवास उपलब्ध नहीं करा सकती। यह भी संभव नहीं कि प्रत्येक परिवार विश्वविद्यालय के छात्रावास या विशेष रूप से बनाए गए निजी आवास का खर्च उठा सके। लेकिन किफायती कमरों की कमी को असुरक्षित इमारतों का बहाना नहीं बनाया जा सकता।छात्र बहुल इलाकों में मकान के हर वर्ग फुट की व्यावसायिक कीमत होती है। अधिक कमाई के लिए इमारतों को छोटे-छोटे कमरों में बांटा जाता है, क्षमता से अधिक लोगों को ठहराया जाता है और बेसमेंट तथा छत जैसी जगहों का भी ऐसे कामों के लिए इस्तेमाल होने लगता है, जिनके लिए उन्हें बनाया ही नहीं गया था।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब पुरानी इमारतों में उचित संरचनात्मक जांच के बिना बार-बार बदलाव किए जाते हैं। कभी बेसमेंट में फेरबदल होता है, कभी दीवारें हटाई जाती हैं, तो कभी अतिरिक्त मंजिलें और कमरे बना दिए जाते हैं। बिजली और पानी की व्यवस्थाओं पर भी उनकी क्षमता से कई गुना अधिक दबाव डाल दिया जाता है।
सत्य निकेतन में हादसे के समय बेसमेंट में चल रहा मरम्मत कार्य स्वाभाविक रूप से जांच का हिस्सा बनेगा। हालांकि, दुर्घटना के वास्तविक कारण का पता किसी जल्दबाजी में निकाले गए निष्कर्ष से नहीं, बल्कि विस्तृत संरचनात्मक जांच से ही चलना चाहिए।
राजधानी को यह समझने के लिए बहुत पीछे देखने की जरूरत नहीं है कि जब नियमों का पालन हादसे से पहले नहीं, बल्कि उसके बाद कराया जाता है, तो परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं।
जुलाई 2024 में ओल्ड राजेंद्र नगर के एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में पानी भरने से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे तीन छात्रों की मौत हो गई थी। इस त्रासदी के बाद निरीक्षण, सीलिंग अभियान और कोचिंग संस्थानों की सुरक्षा को लेकर देशव्यापी बहस शुरू हुई थी। इसके बावजूद लगभग दो साल बाद भी उस इलाके में नियमों के पालन और प्रशासनिक कार्रवाई से जुड़े सवाल खत्म नहीं हुए हैं। सीबीआई ने भी एमसीडी के तीन कनिष्ठ अधिकारियों पर अपने कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही बरतने का आरोप लगाया है।
इसके बाद इसी साल मई में साकेत के पास सैदुलाजाब में एक इमारत गिर गई। इस हादसे में छह लोगों की मौत हुई, जिनमें मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुके पांच युवा शामिल थे। इस घटना ने एक बार फिर अवैध निर्माण की समस्या पर ध्यान खींचा।
खबरों के अनुसार, पुलिस ने इमारत गिरने से पहले ही उस चार मंजिला भवन में चल रहे अवैध निर्माण की जानकारी दी थी। हादसे के बाद एमसीडी ने इलाके में कार्रवाई शुरू की और अधिकारियों ने बताया कि महरौली-छतरपुर क्षेत्र में सैकड़ों संभावित अवैध इमारतों को नोटिस जारी किए गए हैं। एक बार फिर वही पुराना सिलसिला दोहराया गया—पहले त्रासदी, फिर जांच और उसके बाद कार्रवाई।
प्रशासनिक कार्रवाई का पैमाना स्वयं बताता है कि समस्या कितनी व्यापक हो सकती है। जून में हुई कई जानलेवा घटनाओं के बाद एमसीडी ने बताया था कि अवैध और अनधिकृत निर्माण के विरुद्ध चलाए गए अभियान में 82 संपत्तियों को ध्वस्त किया गया और 43 अन्य को सील कर दिया गया। ये आंकड़े महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके साथ एक अधिक कठिन और असहज सवाल भी खड़ा होता है—आज दिल्ली में ऐसी कितनी इमारतें आबाद हैं, जिनका कभी ठीक से निरीक्षण ही नहीं हुआ? कितने उल्लंघन मकान मालिकों, स्थानीय निवासियों और अधिकारियों को दिखाई देते हैं, लेकिन उन पर तब तक कोई कार्रवाई नहीं होती, जब तक कोई दुर्घटना न हो जाए?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित निगरानी समिति की जुलाई 2026 की रिपोर्ट में भी उन आवासीय संपत्तियों में अग्नि सुरक्षा नियमों के उल्लंघन को रेखांकित किया गया था, जिनका इस्तेमाल मिश्रित या व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है।
छात्र बहुल इलाकों के संदर्भ में यह बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां आवासीय इमारतें धीरे-धीरे अत्यधिक भीड़ वाले पीजी, हॉस्टल या व्यावसायिक परिसरों में बदल जाती हैं। सवाल केवल यह नहीं है कि किसी इमारत का वैध पता है या उसका किराया चुकाया जा रहा है। असली सवाल यह है कि क्या उसका इस्तेमाल उसकी संरचनात्मक क्षमता, अग्नि सुरक्षा और निर्धारित आवासीय क्षमता के अनुरूप हो रहा है।
इमारतों में रहने वालों की अधिकतम संख्या का नियम केवल कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। कमरों की भारी मांग के नाम पर अवैध निर्माण और बेसमेंट के गैरकानूनी इस्तेमाल की अनदेखी नहीं की जा सकती। खुले नाले, संकरी गलियां, बंद निकास और जर्जर इमारतें सामान्य दिनों में मामूली असुविधाएं लग सकती हैं, लेकिन आपात स्थिति में यही जिंदगी और मौत का कारण बन सकती हैं।
अब खतरा यह है कि सत्य निकेतन हादसा भी उसी पुराने ढर्रे पर आगे बढ़ेगा—जांच का आदेश दिया जाएगा, जिम्मेदारी को लेकर बहस होगी, नोटिस जारी किए जाएंगे और कुछ समय बाद लोगों का ध्यान किसी दूसरी घटना की ओर चला जाएगा।
ओल्ड राजेंद्र नगर और सैदुलाजाब की त्रासदियों के बाद भी दिल्ली यही चक्र देख चुकी है। इसके बावजूद छात्र लगातार राजधानी पहुंच रहे हैं, मकान मालिक कमरे किराये पर दे रहे हैं और छात्र बहुल इलाके पहले से अधिक भीड़भाड़ वाले होते जा रहे हैं।
छात्र दिल्ली में परीक्षाओं की तैयारी करने, कॉलेज में पढ़ने, करियर शुरू करने और अपना भविष्य बनाने आते हैं। उन्हें उस इमारत में रहने का जोखिम नहीं मापना चाहिए, जिसमें वे रात को सोते हैं। सत्य निकेतन हादसे ने एक ऐसा कड़वा सच सामने रखा है, जिसकी दिल्ली अब और अनदेखी नहीं कर सकती। राजधानी में छात्र आवास की समस्या केवल किफायती कमरे या उनकी उपलब्धता तक सीमित नहीं है। यह सुरक्षा, जवाबदेही और प्रभावी नियमन का भी सवाल है।
एक और इमारत गिरने के बाद सवाल बेहद सीधा और पीड़ादायक है—सुरक्षित छात्र आवास को बुनियादी आवश्यकता मानने के लिए दिल्ली को अभी और कितने छात्रों की मौत का इंतजार है?
दक्षिण दिल्ली की पुनर्वास कॉलोनी सत्य निकेतन में बीते वर्षों के दौरान बड़ा बदलाव आया है। विस्थापित परिवारों और मजदूरों को बसाने के लिए बनाया गया यह कम ऊंचाई वाली इमारतों का इलाका अब विद्यार्थियों के रहने के लिए राजधानी के सबसे घनी आबादी वाले और बेतरतीब ढंग से निर्मित इलाकों में बदल चुका है।
दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने 1970 और 1980 के दशक में इस कॉलोनी को सीमित आय वाले परिवारों के लिए छोटे और साधारण मकानों के रूप में विकसित किया था। इसकी मूल बनावट पड़ोसी शांति निकेतन और आनंद निकेतन से बिल्कुल अलग थी। 1960 के दशक में बनी ये दोनों कॉलोनियां उच्च वर्ग की सहकारी आवासीय सोसाइटियां थीं, जहां मुख्यतः वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और संपन्न लोग रहते थे।
इसके विपरीत, सत्य निकेतन और उसके पड़ोसी इलाके आरकपुर बाग मोची में छोटे भूखंडों पर कम ऊंचाई वाले मकान बनाए गए थे।
डीडीए के पूर्व योजना आयुक्त सब्यसाची दास के अनुसार, सत्य निकेतन और ऐसी अन्य कॉलोनियों में मूल भवन नियमों के तहत केवल भूतल और पहली मंजिल के निर्माण की अनुमति थी। यह पाबंदी इस क्षेत्र के हवाई अड्डे के नजदीक होने के कारण भी लगाई गई थी।
दास ने कहा,
ऐसी कॉलोनियों में प्रत्येक मकान के नक्शे को अलग-अलग मंजूरी देने के बजाय डीडीए ने सभी लाभार्थियों को एक मानक नक्शा उपलब्ध कराया था, ताकि उन्हें किसी वास्तुकार की सेवाएं न लेनी पड़ें। लेकिन कई मामलों में लोगों ने स्थानीय बिल्डरों को काम सौंपा, जिन्होंने इन नक्शों में मनमाने बदलाव कर दिए।”
डीडीए के एक अधिकारी ने बताया कि व्यवस्था के तहत ऐसी पुनर्वास कॉलोनियों में करीब 90 प्रतिशत निर्माण पूरा हो जाने के बाद उन्हें दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) को हस्तांतरित कर दिया जाता था।
सत्य निकेतन का स्वरूप 1973 के बाद तेजी से बदलना शुरू हुआ, जब दिल्ली विश्वविद्यालय ने सड़क के दूसरी ओर अपना दक्षिणी परिसर स्थापित किया। श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, जीसस एंड मैरी कॉलेज और आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज जैसे शिक्षण संस्थानों के विस्तार के साथ यह इलाका विद्यार्थियों के लिए सुविधाजनक और आकर्षक आवासीय विकल्प बन गया।शुरुआत में यह बदलाव धीरे-धीरे हुआ। स्थानीय लोगों ने अपने मकानों के कमरे विद्यार्थियों को किराये पर देने शुरू किए। लेकिन समय के साथ आवास की बढ़ती मांग ने घरों को व्यावसायिक किराये की संपत्तियों में बदल दिया।
दास ने कहा,
इसकी शुरुआत विद्यार्थियों को किरायेदार के रूप में रखने से हुई। उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए कमरों में अतिरिक्त पलंग और मेज लगाई गईं तथा साझा शौचालय बनाए गए।”
बाद में जरूरी अनुमति लिए बिना मकानों का विस्तार ऊपर और आसपास की ओर होने लगा। पारिवारिक मकानों को पेइंग गेस्ट यानी पीजी आवास और किराये की इकाइयों में बदल दिया गया। एक ही भूखंड पर अधिक विद्यार्थियों को रखने के लिए अतिरिक्त मंजिलें और कमरे बनाए गए।
दिल्ली मास्टर प्लान-2021 ने इस तरह के आवास की बढ़ती मांग को देखते हुए निर्धारित चौड़ाई वाली मिश्रित उपयोग की सड़कों से लगे आवासीय भूखंडों पर हॉस्टल और पीजी चलाने की अनुमति दी थी। हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि खासकर सड़क की चौड़ाई से संबंधित नियमों का अक्सर पालन नहीं किया गया।
प्रस्तावित दिल्ली मास्टर प्लान-2047 में पीजी आवास से जुड़े कुछ नियमों को और सरल बनाया गया है, जबकि ‘ए’ और ‘बी’ श्रेणी की कॉलोनियों में प्रतिबंध बरकरार रखे गए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन प्रतिबंधों का भी खुलेआम उल्लंघन होता है।
सत्य निकेतन में हुए इस बड़े बदलाव ने इमारतों की संरचनात्मक सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एमसीडी का कहना है कि अभी यह पता लगाया जा रहा है कि रविवार को इमारत गिरने के समय उसमें कोई निर्माण या मरम्मत का काम चल रहा था या नहीं। हालांकि, स्थानीय लोगों का दावा है कि इमारत के बेसमेंट में कुछ काम किया जा रहा था।
एमसीडी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि,
इमारत ने 17.5 मीटर की निर्धारित ऊंचाई सीमा का उल्लंघन किया था। अधिकारी ने कहा, “हम इस बात की जांच कर रहे हैं कि लगातार बारिश और पानी के रिसाव के कारण इमारत कमजोर हुई या मरम्मत अथवा किसी अन्य निर्माण कार्य ने इसके गिरने में भूमिका निभाई।”
दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के निदेशक प्रोफेसर वीके पॉल ने कहा,
इमारत गिरने से पहले किसी तरह के स्पष्ट खतरे के संकेत दिखाई नहीं दिए और वह पूरी तरह ढह गई। इससे पता चलता है कि इसका निर्माण इंजीनियरिंग मानकों के बिना किया गया होगा। इमारत गिरने से पैदा हुए कंपन का असर आसपास की दूसरी इमारतों पर भी निश्चित रूप से पड़ा होगा।”