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व्यंग्य: 'राष्ट्र निर्माता' की 24 घंटे वाली इज्जत और हमारे 'डेटा एंट्री' मास्टर जी!

Athar Kalim Ahmed/S.R.Husaini Athar Kalim Ahmed/S.R.Husaini | 1h ago · 4 min read
व्यंग्य: 'राष्ट्र निर्माता' की 24 घंटे वाली इज्जत और हमारे 'डेटा एंट्री' मास्टर जी!

अब सरकार उन्हें इंसान कम और बिजली का 'एक्सटेंशन बोर्ड' ज्यादा समझती है

5 सितंबर का दिन हमारे देश के शिक्षकों के लिए किसी सिंड्रेला की कहानी से कम नहीं होता। शिक्षक दिवस तो बीत गया लेकिन उस दिन सुबह होते ही व्हाट्सएप पर 'राष्ट्र निर्माता' और 'जलती हुई मोमबत्ती' के तमगे बंटने लगते हैं, बच्चे पांच रुपये वाला प्लास्टिक का गुलाब देकर बोर्ड के इम्तिहान में ग्रेस मार्क्स की उम्मीद लगाते हैं, और हमारे नेता माइक पकड़कर ऐसे जज़्बाती भाषण देते हैं जैसे कल से तमाम मास्टरों को नेताओं जैसी इज्जत मिलने वाली हो।

लेकिन 6 सितंबर का सूरज निकलते ही यह सारा तिलिस्म टूट जाता है। हमारा यह कॉलम छपने तक हमारा 'राष्ट्र निर्माता' दोबारा से एक आम सरकारी मज़दूर बन चुका होगा, जो कभी मिड-डे मील के चावलों में कीड़े ढूंढ रहा होता है, कभी इलेक्शन की पर्चियां बांट रहा होता है, और कभी पल्स पोलियो की बूंदें पिलाते हुए मोहल्ले के कुत्तों से बचने की तरकीबें सोच रहा होता है।

आधुनिक शिक्षा नीतियों ने तो उस्ताद की सलाहियतों (क्षमताओं) को इतना निखार दिया है कि अब सरकार उन्हें इंसान कम और बिजली का 'एक्सटेंशन बोर्ड' ज्यादा समझती है, जिसमें हर विभाग का प्लग आसानी से ठूंसा जा सकता है। आजकल तो शिक्षकों के गले में 'एसआईआर' (SIR) नाम की ऑनलाइन डेटा एंट्री का नया तौक़ (फंदा) भी डाल दिया गया है।

एक ज़माना था जब स्कूलों में बच्चे सम्मान से 'सर' (Sir) कहते थे तो मास्टर जी का सीना फख्र से चौड़ा हो जाता था। अब सरकार ने उनके ज़िम्मे 'एसआईआर' का ऐसा अज़ाब और ऐप्स का ऐसा बोझ लाद दिया है कि बाज़ार में कोई सब्ज़ी वाला भी गलती से आवाज़ लगा दे "सर जी!" तो मास्टर साहब खौफ से कांप जाते हैं कि शायद शिक्षा विभाग का कोई नया सर्वे आ गया है।

उस्ताद अब क्लासरूम में चॉक और डस्टर से ज्यादा स्मार्टफोन चलाता है, ताकि हर पंद्रह मिनट बाद सरकार के किसी नए ऐप पर स्कूल के वॉशरूम के सामने खड़े होकर जियो-टैग (Geo-Tag) सेल्फी अपलोड करके साबित कर सके कि वह ड्यूटी पर ही है, किसी होटल पर चाय नहीं पी रहा।

च तो यह है कि हमारे शिक्षक अब पढ़ाने वाले कम और 'डेटा एंट्री ऑपरेटर' ज्यादा बन चुके हैं। वे बेचारे सारी रात जागकर यू-डाइस (U-DISE) के पोर्टल पर बच्चों का आधार कार्ड लिंक करते हैं और सुबह हिस्ट्री की क्लास में खड़े होकर सोचते हैं कि अकबर आज़म का आधार कार्ड बना था या पैन कार्ड!

और रही-सही कसर आजकल के 'जेन-ज़ी' (Gen-Z) छात्रों और उनके 'कॉर्पोरेट' माता-पिता ने पूरी कर दी है। यह नई नस्ल क्लास में बैठकर ज्ञान नहीं, 'वाइब्स' (Vibes) तलाश करती है। उनके लिए शिक्षक कोई सम्माननीय हस्ती नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता यूट्यूब वीडियो है जिसे वे बदकिस्मती से 'स्किप' (Skip) नहीं कर सकते। अगर उस्ताद इतिहास पढ़ाते हुए बताएं कि बाबर ने पानीपत की जंग जीती थी, तो ये जेन-ज़ी छात्र निहायत मासूमियत से कहते हैं, "सर! बाबर की वाइब्स बहुत टॉक्सिक (Toxic) और रेड फ्लैग (Red Flag) लग रही हैं, प्लीज़ इसे कैंसिल (Cancel) कर दें!"

और अगर मास्टर जी 40 मिनट तक गणित का कोई मुश्किल फॉर्मूला समझाएं, तो फरमाइश आती है कि "सर! इसे 30 सेकंड की रील (Reel) बनाकर समझाएं, मेरा अटेंशन स्पैन (Attention Span) खत्म हो रहा है, और प्लीज़ बैकग्राउंड में कोई ट्रेंडिंग म्यूज़िक भी लगा दें।"

पहले ज़माने में उस्ताद की मार से बच्चे सुधर जाते थे और माता-पिता खुशी-खुशी आकर कहते थे कि "मास्टर जी! इसकी हड्डियां हमारी और खाल आपकी।" अब तो सूरत-ए-हाल यह है कि अगर शिक्षक किसी बच्चे को बस घूर भी ले, तो बच्चा फौरन उसे 'मेंटल ट्रॉमा' (Mental Trauma) का नाम देकर सोशल मीडिया पर लाइव आ जाता है।

शाम को इन बच्चों के कॉर्पोरेट पेरेंट्स स्कूल में यूं धावा बोलते हैं जैसे मास्टर जी ने कंज्यूमर कोर्ट के किसी कानून का गंभीर उल्लंघन कर दिया हो। शिक्षा अब अमेज़ॉन की ऑनलाइन शॉपिंग बन चुकी है और माता-पिता कस्टमर बन गए हैं। बच्चा अगर परीक्षा में फेल हो जाए तो पेरेंट्स उस्ताद से आकर ऐसे उलझते हैं जैसे ज़ोमैटो के डिलीवरी बॉय पर बरसते हों, "सर जी! हमने तो 90 परसेंट मार्क्स का ऑर्डर दिया था, आपने यह 40 परसेंट वाली घटिया सर्विस कैसे डिलीवर कर दी? हम आपको गूगल पर सिंगल स्टार रेटिंग देंगे!"

हमारी सरकार, समाज और शिक्षा विभाग से बस इतनी ही मांग है कि अगर शिक्षकों को वाकई इज़्ज़त देनी है, तो शिक्षक दिवस पर उन्हें 'जलती हुई मोमबत्ती' का खिताब और प्लास्टिक के फूल देने के बजाय, साल में कम से कम एक दिन के लिए उन्हें क्लास में सिर्फ और सिर्फ 'पढ़ाने' की इजाज़त दे दी जाए। वरना वह दिन दूर नहीं जब 5 सितंबर को बच्चा उस्ताद को प्यार से फूल देगा, तो मास्टर जी घबराकर कहेंगे,

"बेटा! यह फूल मुझे मत दे, इसकी पीडीएफ (PDF) बनाकर फौरन सर्वर पर अपलोड कर दे और साथ में अपनी जियो-टैग लोकेशन भी डाल दे, वरना सरकार समझेगी कि मैंने शिक्षक दिवस मनाए बिना ही आधे दिन की छुट्टी मार ली है!"
Athar Kalim Ahmed/S.R.Husaini

Athar Kalim Ahmed/S.R.Husaini

महाराष्ट्र के अतहर कलीम अहमद और एस.आर.हुसैनी उर्दू समाचार पत्रों और विभिन्न वेबसाइट के लिए "आईना खाना" के नाम से हास्य और व्यंग्यात्मक कॉलम लिखते हैं।