ISRO के निजीकरण के खिलाफ कर्मचारियों के नौ संगठनों ने खोला मोर्चा
ISRO के कर्मचारियों के नौ संगठनों ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने की केंद्र सरकार की नीति पर सवाल उठाए हैं।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के कर्मचारियों के नौ संगठनों ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने की केंद्र सरकार की नीति पर सवाल उठाए हैं। कर्मचारियों का कहना है कि सरकार की मंशा और भविष्य की योजनाओं के बारे में जानकारी पाना उनका अधिकार है।
अंतरिक्ष विभाग (DoS) को सौंपे गए एक लिखित प्रतिवेदन में कर्मचारियों ने कहा,
तयशुदा व्यावसायिक गतिविधियों में निजी क्षेत्र की भागीदारी एक मजबूत और सार्वजनिक स्वामित्व वाले इसरो के साथ-साथ चल सकती है। लेकिन बिना किसी बहस के ऐसी नीति स्वीकार नहीं की जा सकती, जो इसरो को केवल सीमित अनुसंधान एवं विकास संस्थान बनाकर छोड़ दे और देश के प्रक्षेपण यानों के निर्माण तथा प्रक्षेपण ढांचे के संचालन को सार्वजनिक नियंत्रण से बाहर कर दे।
Hindustan Times की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रतिवेदन पर नौ कर्मचारी संगठनों ने हस्ताक्षर किए हैं। इनमें इसरो स्टाफ एसोसिएशन, शार एम्प्लॉइज एसोसिएशन, इसैक एम्प्लॉइज एसोसिएशन, इसरो स्टाफ एसोसिएशन-एलपीएससी, इसरो स्टाफ एसोसिएशन-बीबीयू, एनआरएसए एम्प्लॉइज यूनियन, स्पेस एम्प्लॉइज एसोसिएशन-बीबीयू, इसरो स्टाफ एसोसिएशन-आईपीआरसी और एसएसी एम्प्लॉइज वेलफेयर एसोसिएशन शामिल हैं। इन संगठनों ने उठाई गई चिंताओं पर अंतरिक्ष आयोग के अध्यक्ष से लिखित जवाब मांगा है।
यह पत्र उसी दिन सौंपा गया, जिस दिन श्रीहरिकोटा से पृथ्वी अवलोकन उपग्रह EOS-05 को लेकर ऐतिहासिक GSLV-F17 का प्रक्षेपण किया गया। इसरो के अनुसार, EOS-05 भू-समकालिक कक्षा से तस्वीरें लेने वाला भारत का पहला इमेजिंग उपग्रह है।
पत्र में कहा गया है कि,
यह चिंता भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) के अध्यक्ष पवन कुमार गोयनका के हालिया बयान के बाद सामने आई है। उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था, “आखिरकार इसरो किसी भी प्रक्षेपण यान का निर्माण नहीं करेगा। यह पूरा काम निजी क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) द्वारा किया जाएगा।”
कर्मचारियों ने कहा कि,
निजी क्षेत्र को जिम्मेदारी सौंपने की प्रक्रिया छोटे उपग्रह प्रक्षेपण यान (SSLV) से शुरू हो चुकी है और आगे चलकर इसका विस्तार ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV) तथा LVM3 तक किया जा सकता है।
कर्मचारियों ने इन प्रक्षेपण यानों के उत्पादन को निजी क्षेत्र को सौंपने, नियमित उपग्रह निर्माण को इसरो से बाहर स्थानांतरित करने और कुलसेकरपट्टिनम स्थित अंतरिक्ष प्रक्षेपण परिसर सहित नए लॉन्चिंग बुनियादी ढांचे को निजी संस्थाओं के लिए खोलने संबंधी खबरों पर भी चिंता जताई। पत्र में इसरो की लगभग 120 वैज्ञानिकों को पहले ही निजी क्षेत्र को हस्तांतरित किए जाने का भी उल्लेख किया गया है।
बयान में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (इन-स्पेस) के अध्यक्ष पवन गोयनका की हालिया टिप्पणी का भी उल्लेख किया गया है। गोयनका ने कहा था कि ,
भविष्य में इसरो प्रक्षेपण यानों का निर्माण बंद कर देगा। कर्मचारियों ने पूछा है कि क्या यह केंद्र सरकार का आधिकारिक रुख है। बयान में कहा गया, “यदि ऐसी किसी नीति को मंजूरी दी गई है तो कृपया उससे संबंधित निर्णय की तारीख, मंजूरी देने वाले प्राधिकारी और नीति का मूल पाठ उपलब्ध कराया जाए।”
पत्र में यह भी पूछा गया है कि भविष्य में इसरो के कर्मचारियों की भूमिका क्या होगी। कर्मचारियों का कहना है कि इसरो के लिए प्रक्षेपण यानों का निर्माण केवल एक “विनिर्माण अनुबंध” नहीं है, बल्कि यह संगठन की “मूल विशेषज्ञता, संस्थागत स्मृति और रणनीतिक क्षमता” का हिस्सा है।
कर्मचारियों ने आशंका जताई कि,
मौजूदा कर्मचारियों को “अतिरिक्त” घोषित किया जा सकता है या उन्हें सार्थक काम से वंचित किया जा सकता है, जबकि उन्हीं जिम्मेदारियों को सार्वजनिक धन से विकसित तकनीक का इस्तेमाल कर निजी ठेकेदार निभाएंगे। उन्होंने यह चिंता भी व्यक्त की कि सभी श्रेणियों के पदों पर नियमित नियुक्तियों में और अधिक गिरावट आ सकती है।
हाल ही में वैज्ञानिकों के बड़ी संख्या में नौकरी छोड़ने की खबरों के बाद भी इसरो चर्चा में आया था। इसरो ने हालांकि आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं किए, लेकिन मीडिया रिपोर्टों के अनुसार,
इस वर्ष के शुरुआती कुछ महीनों में प्रमुख कार्यक्रमों से जुड़े करीब 100 से 120 वैज्ञानिकों ने संगठन छोड़ दिया था। इसके बाद इसरो ने गगनयान जैसे महत्वपूर्ण अभियानों पर काम कर रहे वैज्ञानिकों के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने और इस्तीफा देने संबंधी नियमों को सख्त कर दिया है।
इस पूरे मामले पर इसरो ने स्पष्ट किया है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में जारी सुधारों के तहत न तो संस्था का निजीकरण करने की कोई योजना है और न ही उसकी भूमिका को सीमित किया जाएगा।
संगठन में संभावित बदलावों को लेकर चल रही अटकलों के बीच इसरो ने कहा कि,
ऐसी खबरें पूरी तरह ‘‘निराधार और गलत’’ हैं। भारत में उन्नत अंतरिक्ष अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास की अग्रणी संस्था के रूप में इसरो अपनी जिम्मेदारियां निभाता रहेगा।
इसरो ने जोर देकर कहा कि राष्ट्रीय एवं रणनीतिक अभियानों, अंतरिक्ष विज्ञान और अन्वेषण के साथ-साथ महत्वपूर्ण और अत्याधुनिक अंतरिक्ष क्षमताओं के विकास में उसकी भूमिका केंद्रीय बनी रहेगी। एजेंसी के अनुसार, निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने का उद्देश्य भारत के अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार करना है। इससे इसरो को अगली पीढ़ी की तकनीकों और जटिल राष्ट्रीय अभियानों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलेगा।
इसरो ने कहा, “बदलाव इसरो के महत्व में नहीं, बल्कि भारत के अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र के आकार और संरचना में हो रहा है।”
एजेंसी ने बताया कि वर्ष 2020 से शुरू किए गए अंतरिक्ष क्षेत्र के सुधारों और भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 के माध्यम से उन्हें संस्थागत रूप देने का मकसद भारत में अधिक व्यापक, मजबूत और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी अंतरिक्ष व्यवस्था तैयार करना है।