सत्या निकेतन हादसे पर Delhi HC सख्त, MCD-DU से 10 दिन में जवाब-तलब
दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को सत्या निकेतन में इमारत गिरने की घटना को ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को सत्या निकेतन में इमारत गिरने की घटना को ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया। इस हादसे में सात लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हुए हैं। अदालत ने इमारत मालिकों के साथ-साथ दिल्ली नगर निगम (MCD) और दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि,
दिल्ली विश्वविद्यालय बाहर से आने वाले छात्रों के लिए पर्याप्त आवास उपलब्ध कराने में विफल रहा है। इसी कारण छात्र निजी पेइंग गेस्ट (PG) आवासों में रहने के लिए मजबूर होते हैं।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने अधिकारियों को मलबे में फंसे लोगों को बचाने के लिए राहत एवं बचाव अभियान तेज करने का निर्देश दिया। समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार,
अदालत ने कहा कि,
इस हादसे की जिम्मेदारी केवल गिरी हुई इमारत के मालिकों की नहीं है। अदालत ने MCD और DU की भूमिका पर भी सवाल उठाए।
पीठ ने कहा कि पर्याप्त आवास की सुविधा नहीं होने के कारण दिल्ली के बाहर से पढ़ने आने वाले छात्रों को निजी PG में रहना पड़ता है। अदालत ने ये टिप्पणियां इमारत हादसे से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कीं।
पीठ ने अधिकारियों से कहा कि वे राहत एवं बचाव अभियान में अपने प्रयासों को दोगुना करें, ताकि लोगों की जान बचाई जा सके।
केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और MCD की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि मलबे में फंसे लोगों को बचाने के लिए हरसंभव कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार स्थिति पर लगातार नजर रख रही है और राहत अभियान में कुछ समय लग सकता है। मेहता ने भरोसा दिलाया कि अधिकारी सभी संबंधित लोगों के हित में फैसले लेंगे और बचाव कार्य में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।
हाईकोर्ट ने सभी संबंधित अधिकारियों को याचिका पर अलग-अलग जवाब दाखिल करने के लिए 10 दिनों का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को होगी।
इस जनहित याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए अदालत के सामने रखा गया था, जिसके बाद हाईकोर्ट ने सोमवार को ही इस पर सुनवाई करने की सहमति दी।
सत्या निकेतन की यह इमारत दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास स्थित थी और इसमें लड़कों का PG चलाया जा रहा था। रविवार को इमारत में मरम्मत का काम चल रहा था, तभी वह अचानक गिर गई। हादसे में सात लोगों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं।
बता दें कि इससे पहले सोमवार को ही दक्षिण-पश्चिम दिल्ली में ढही इमारत के मालिक हरिराम को राजस्थान के भिवाड़ी से गिरफ्तार कर लिया गया है। अधिकारियों ने बताया कि दिल्ली पुलिस ने उसकी तलाश के लिए 10 अलग-अलग टीमें बनाई थीं, जिसके कुछ ही समय बाद उसे पकड़ लिया गया। दक्षिण परिसर पुलिस थाने में हरिराम और अन्य लोगों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या, इमारत के रखरखाव में लापरवाही और दूसरों की सुरक्षा को खतरे में डालने समेत कई धाराओं में मामला दर्ज किया गया है।
रविवार को हुए इस हादसे में सात लोगों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। लापता लोगों की तलाश और बचाव अभियान अभी भी जारी है। घटना के तुरंत बाद हरिराम के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई थी। वहीं, दिल्ली प्रशासन ने इलाके की अवैध इमारतों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की बात कही है। इससे पहले दिन में दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के दक्षिण क्षेत्र के उपायुक्त समेत पांच अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया।
लेकिन वह सवाल एक बार फिर सामने आ गया है, जिसका जवाब देने में दिल्ली सरकार बार-बार नाकाम रही है—जिन इमारतों में हजारों छात्र रहते हैं, वे आखिर कितनी सुरक्षित हैं?
जबकि दिल्ली में डबल क्या ट्रिपल इंजन की सरकार है। केंद्र, राज्य और अब तो एमसीडी में मेयर भी बीजेपी का ही है। तो फिर इस हादसे की जिम्मेदारी कौन लेगा। छह छात्रों की मौत का जिम्मेदार कौन है।
दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास स्थित इस इमारत का इस्तेमाल पेइंग गेस्ट हाउस के रूप में किया जा रहा था। इसमें एक बेसमेंट और उसके ऊपर पांच मंजिलें थीं। बताया जा रहा है कि बेसमेंट में मरम्मत का काम चल रहा था, तभी दोपहर करीब डेढ़ बजे पूरी इमारत भरभराकर गिर गई। शाम तक छह लोगों की मौत हो चुकी थी और कई लोगों को मलबे से बाहर निकाला गया था। बचाव दल उन लोगों की तलाश में जुटे थे, जिनके अब भी मलबे में फंसे होने की आशंका थी।
सत्य निकेतन कोई अकेला मामला नहीं है। दिल्ली में दर्जनों ऐसे इलाके हैं, जो शहर के विश्वविद्यालयों, कोचिंग सेंटरों और निजी शिक्षण संस्थानों के कारण धीरे-धीरे छात्र बस्तियों में बदल गए हैं। कटवारिया सराय, साकेत, मुनिरका, बेर सराय, मुखर्जी नगर, मालवीय नगर, कमला नगर, किंग्सवे कैंप, मॉडल टाउन और रूप नगर जैसे इलाके शैक्षणिक सत्र के दौरान छात्रों से भरे रहते हैं। इन सभी जगहों पर लगभग एक जैसा आवासीय और व्यावसायिक ढांचा विकसित हो चुका है। सत्य निकेतन भी इसी बड़ी समस्या का हिस्सा है।
यह सच है कि सरकार दिल्ली आने वाले प्रत्येक छात्र या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले हर युवा को आवास उपलब्ध नहीं करा सकती। यह भी संभव नहीं कि प्रत्येक परिवार विश्वविद्यालय के छात्रावास या विशेष रूप से बनाए गए निजी आवास का खर्च उठा सके। लेकिन किफायती कमरों की कमी को असुरक्षित इमारतों का बहाना नहीं बनाया जा सकता।छात्र बहुल इलाकों में मकान के हर वर्ग फुट की व्यावसायिक कीमत होती है। अधिक कमाई के लिए इमारतों को छोटे-छोटे कमरों में बांटा जाता है, क्षमता से अधिक लोगों को ठहराया जाता है और बेसमेंट तथा छत जैसी जगहों का भी ऐसे कामों के लिए इस्तेमाल होने लगता है, जिनके लिए उन्हें बनाया ही नहीं गया था।

स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब पुरानी इमारतों में उचित संरचनात्मक जांच के बिना बार-बार बदलाव किए जाते हैं। कभी बेसमेंट में फेरबदल होता है, कभी दीवारें हटाई जाती हैं, तो कभी अतिरिक्त मंजिलें और कमरे बना दिए जाते हैं। बिजली और पानी की व्यवस्थाओं पर भी उनकी क्षमता से कई गुना अधिक दबाव डाल दिया जाता है।
सत्य निकेतन में हादसे के समय बेसमेंट में चल रहा मरम्मत कार्य स्वाभाविक रूप से जांच का हिस्सा बनेगा। हालांकि, दुर्घटना के वास्तविक कारण का पता किसी जल्दबाजी में निकाले गए निष्कर्ष से नहीं, बल्कि विस्तृत संरचनात्मक जांच से ही चलना चाहिए।
जुलाई 2024 में ओल्ड राजेंद्र नगर के एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में पानी भरने से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे तीन छात्रों की मौत हो गई थी। इस त्रासदी के बाद निरीक्षण, सीलिंग अभियान और कोचिंग संस्थानों की सुरक्षा को लेकर देशव्यापी बहस शुरू हुई थी। इसके बावजूद लगभग दो साल बाद भी उस इलाके में नियमों के पालन और प्रशासनिक कार्रवाई से जुड़े सवाल खत्म नहीं हुए हैं। सीबीआई ने भी एमसीडी के तीन कनिष्ठ अधिकारियों पर अपने कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही बरतने का आरोप लगाया है।
इसके बाद इसी साल मई में साकेत के पास सैदुलाजाब में एक इमारत गिर गई। इस हादसे में छह लोगों की मौत हुई, जिनमें मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुके पांच युवा शामिल थे। इस घटना ने एक बार फिर अवैध निर्माण की समस्या पर ध्यान खींचा।
खबरों के अनुसार,
पुलिस ने इमारत गिरने से पहले ही उस चार मंजिला भवन में चल रहे अवैध निर्माण की जानकारी दी थी। हादसे के बाद एमसीडी ने इलाके में कार्रवाई शुरू की और अधिकारियों ने बताया कि महरौली-छतरपुर क्षेत्र में सैकड़ों संभावित अवैध इमारतों को नोटिस जारी किए गए हैं। एक बार फिर वही पुराना सिलसिला दोहराया गया—पहले त्रासदी, फिर जांच और उसके बाद कार्रवाई।
दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने 1970 और 1980 के दशक में इस कॉलोनी को सीमित आय वाले परिवारों के लिए छोटे और साधारण मकानों के रूप में विकसित किया था। इसकी मूल बनावट पड़ोसी शांति निकेतन और आनंद निकेतन से बिल्कुल अलग थी। 1960 के दशक में बनी ये दोनों कॉलोनियां उच्च वर्ग की सहकारी आवासीय सोसाइटियां थीं, जहां मुख्यतः वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और संपन्न लोग रहते थे।
इसके विपरीत, सत्य निकेतन और उसके पड़ोसी इलाके आरकपुर बाग मोची में छोटे भूखंडों पर कम ऊंचाई वाले मकान बनाए गए थे।
डीडीए के पूर्व योजना आयुक्त सब्यसाची दास के अनुसार, सत्य निकेतन और ऐसी अन्य कॉलोनियों में मूल भवन नियमों के तहत केवल भूतल और पहली मंजिल के निर्माण की अनुमति थी। यह पाबंदी इस क्षेत्र के हवाई अड्डे के नजदीक होने के कारण भी लगाई गई थी।
दास ने कहा,
ऐसी कॉलोनियों में प्रत्येक मकान के नक्शे को अलग-अलग मंजूरी देने के बजाय डीडीए ने सभी लाभार्थियों को एक मानक नक्शा उपलब्ध कराया था, ताकि उन्हें किसी वास्तुकार की सेवाएं न लेनी पड़ें। लेकिन कई मामलों में लोगों ने स्थानीय बिल्डरों को काम सौंपा, जिन्होंने इन नक्शों में मनमाने बदलाव कर दिए।”
डीडीए के एक अधिकारी ने बताया कि व्यवस्था के तहत ऐसी पुनर्वास कॉलोनियों में करीब 90 प्रतिशत निर्माण पूरा हो जाने के बाद उन्हें दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) को हस्तांतरित कर दिया जाता था।
सत्य निकेतन का स्वरूप 1973 के बाद तेजी से बदलना शुरू हुआ, जब दिल्ली विश्वविद्यालय ने सड़क के दूसरी ओर अपना दक्षिणी परिसर स्थापित किया। श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, जीसस एंड मैरी कॉलेज और आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज जैसे शिक्षण संस्थानों के विस्तार के साथ यह इलाका विद्यार्थियों के लिए सुविधाजनक और आकर्षक आवासीय विकल्प बन गया।शुरुआत में यह बदलाव धीरे-धीरे हुआ। स्थानीय लोगों ने अपने मकानों के कमरे विद्यार्थियों को किराये पर देने शुरू किए। लेकिन समय के साथ आवास की बढ़ती मांग ने घरों को व्यावसायिक किराये की संपत्तियों में बदल दिया।
दास ने कहा,
इसकी शुरुआत विद्यार्थियों को किरायेदार के रूप में रखने से हुई। उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए कमरों में अतिरिक्त पलंग और मेज लगाई गईं तथा साझा शौचालय बनाए गए।” बाद में जरूरी अनुमति लिए बिना मकानों का विस्तार ऊपर और आसपास की ओर होने लगा। पारिवारिक मकानों को पेइंग गेस्ट यानी पीजी आवास और किराये की इकाइयों में बदल दिया गया। एक ही भूखंड पर अधिक विद्यार्थियों को रखने के लिए अतिरिक्त मंजिलें और कमरे बनाए गए।
दिल्ली मास्टर प्लान-2021 ने इस तरह के आवास की बढ़ती मांग को देखते हुए निर्धारित चौड़ाई वाली मिश्रित उपयोग की सड़कों से लगे आवासीय भूखंडों पर हॉस्टल और पीजी चलाने की अनुमति दी थी। हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि खासकर सड़क की चौड़ाई से संबंधित नियमों का अक्सर पालन नहीं किया गया।
सत्य निकेतन में हुए इस बड़े बदलाव ने इमारतों की संरचनात्मक सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एमसीडी का कहना है कि अभी यह पता लगाया जा रहा है कि रविवार को इमारत गिरने के समय उसमें कोई निर्माण या मरम्मत का काम चल रहा था या नहीं। हालांकि, स्थानीय लोगों का दावा है कि इमारत के बेसमेंट में कुछ काम किया जा रहा था।
एमसीडी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि,
इमारत ने 17.5 मीटर की निर्धारित ऊंचाई सीमा का उल्लंघन किया था। अधिकारी ने कहा, “हम इस बात की जांच कर रहे हैं कि लगातार बारिश और पानी के रिसाव के कारण इमारत कमजोर हुई या मरम्मत अथवा किसी अन्य निर्माण कार्य ने इसके गिरने में भूमिका निभाई।”
दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के निदेशक प्रोफेसर वीके पॉल ने कहा,
इमारत गिरने से पहले किसी तरह के स्पष्ट खतरे के संकेत दिखाई नहीं दिए और वह पूरी तरह ढह गई। इससे पता चलता है कि इसका निर्माण इंजीनियरिंग मानकों के बिना किया गया होगा। इमारत गिरने से पैदा हुए कंपन का असर आसपास की दूसरी इमारतों पर भी निश्चित रूप से पड़ा होगा।”