Politics

भारत रत्न से सम्मानित वैज्ञानिक को चुनाव आयोग ने थमाया नोटिस, मांगा प्रमाण पत्र

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 5 min read
भारत रत्न से सम्मानित वैज्ञानिक को चुनाव आयोग ने थमाया नोटिस, मांगा प्रमाण पत्र

SIR के तहत भारत रत्न से सम्मानित 92 वर्षीय प्रख्यात वैज्ञानिक प्रोफेसर सीएनआर राव को नोटिस जारी किए जाने पर विवाद खड़ा हो गया।

कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत भारत रत्न से सम्मानित 92 वर्षीय प्रख्यात वैज्ञानिक प्रोफेसर सी.एन.आर राव को नोटिस जारी किए जाने पर विवाद खड़ा हो गया। आलोचना के बाद भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के अधिकारियों ने उनके बेंगलुरु स्थित आवास पर जाकर सत्यापन करने का फैसला किया है।


The Hindu की एक रिपोर्ट के अनुसार, निर्वाचन आयोग के एक अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया कि,

राव को निर्धारित केंद्र पर अधिकारियों के सामने उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं है। अधिकारी उनके घर जाकर जरूरी सत्यापन करेंगे। नोटिस में ‘ उनके स्वयं के नाम में अंतर’ को कारण बताया गया है। पिछली मतदाता सूची में उनका नाम ‘Prof. C.N.R. Rao’ दर्ज था, जबकि मौजूदा रिकॉर्ड में ‘Proff. C.N.R. Rao’ लिखा गया है। यानी ‘Prof’ शब्द में गलती से एक अतिरिक्त ‘F’ जुड़ गया।
वर्ष 2014 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित सी.एन.आर राव को भारतीय विज्ञान संस्थान के पास मल्लेश्वरम स्थित SIR सुनवाई केंद्र पर उपस्थित होने के लिए कहा गया था।


ठोस अवस्था और पदार्थ रसायन विज्ञान में योगदान के लिए वैज्ञानिक सी.एन.आर राव को वर्ष 2014 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया था।

कांग्रेस ने बुधवार को सवाल उठाया कि,

जब एक भारत रत्न से सम्मानित व्यक्ति को इतनी लापरवाही से नोटिस जारी किया जा सकता है, तो कर्नाटक के उन आम बुजुर्ग मतदाताओं के साथ क्या हो रहा होगा, जिनके समर्थन में कोई बड़ी संस्था नहीं है।

कांग्रेस की कर्नाटक इकाई के महासचिव इनायत अली ने कहा,

“इस तरह की खामियों के कारण हजारों वास्तविक मतदाताओं के नाम चुपचाप मतदाता सूची से हट सकते हैं और किसी का ध्यान भी नहीं जाएगा।”


कर्नाटक उन 19 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में शामिल है, जहां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का तीसरा चरण चल रहा है।

वहीं एक और मामले में इसी सप्ताह निर्वाचन आयोग ने पद्मश्री सम्मानित हरेकला हजब्बा को नाम में अंतर के कारण जारी किया गया नोटिस वापस ले लिया था। उन्हें मूल दस्तावेजों के साथ 11 सितंबर को ग्राम पंचायत कार्यालय में उपस्थित होने के लिए कहा गया था। नोटिस सार्वजनिक होने के बाद अधिकारी हजब्बा के घर पहुंचे और उसे वापस ले लिया। अधिकारियों ने उनसे कहा कि मामले की जांच करने के बाद आगे की जानकारी दी जाएगी।

वर्ष 2002 की मतदाता सूची में उनका नाम केवल ‘हजब्बा’ दर्ज था, जबकि बाद के सभी दस्तावेजों में नाम ‘हरेकला हजब्बा’ लिखा है। उनके आधार कार्ड, राशन कार्ड, पासपोर्ट और मतदाता पहचान पत्र के साथ-साथ पद्मश्री और अन्य पुरस्कारों से जुड़े दस्तावेजों में भी यही पूरा नाम दर्ज है। मंगलुरु के न्यू पडापू निवासी हरेकला हजब्बा कभी फल बेचते थे। उन्होंने संतरे बेचकर जमा की गई अपनी कमाई से गांव में एक प्राथमिक विद्यालय स्थापित किया। शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2020 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

कर्नाटक में 30 जून से शुरू हुए SIR अभियान के दौरान ‘नो मैपिंग’ और ‘विसंगतियों’ की श्रेणी में आने वाले मतदाताओं को करीब 43.81 लाख नोटिस जारी किए जाने की संभावना है। दावों और आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया 22 अक्टूबर तक जारी रहेगी, जबकि अंतिम मतदाता सूची 27 अक्टूबर को प्रकाशित की जाएगी।

निर्वाचन आयोग ने मई में 16 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में SIR के तीसरे चरण की घोषणा की थी। इसके पूरा होने के बाद हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को छोड़कर पूरा देश इस प्रक्रिया के दायरे में आ जाएगा। करीब चार लाख बूथ स्तरीय अधिकारियों को 36.73 करोड़ मतदाताओं के घर-घर जाकर सत्यापन करने की जिम्मेदारी दी गई है। विभिन्न राज्यों में मसौदा मतदाता सूचियां 5 जुलाई से 21 अक्टूबर के बीच प्रकाशित की जानी हैं।

SIR के पहले दो चरणों में 13 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के करीब 59 करोड़ मतदाताओं को शामिल किया गया था। मतदाता सूची से फर्जी, दोहरे, अपात्र, मृत और कथित रूप से अवैध प्रवासियों के नाम हटाने के उद्देश्य से यह अभियान पिछले वर्ष जून में बिहार से शुरू हुआ था।

पश्चिम बंगाल में SIR की प्रक्रिया हाल के वर्षों की सबसे विवादास्पद कवायदों में शामिल रही। निर्वाचन आयोग ने 10 अप्रैल को मतदाता सूची से करीब 90 लाख नाम हटाने की घोषणा की थी। इनमें लगभग 27 लाख नाम ‘तार्किक विसंगति’ की श्रेणी में हटाए गए थे। पश्चिम बंगाल में पहली बार सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच पड़े कुल मतों का अंतर भी SIR के तहत हटाए गए नामों की संख्या के आसपास था।

इस प्रक्रिया का पहला चरण 2025 में बिहार में आयोजित किया गया था। इसके बाद 2025 के आखिर और 2026 की पहली छमाही के दौरान दूसरे चरण में इसे 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक बढ़ाया गया। SIR की शुरुआत से ही यह चिंता जताई जाती रही है कि इस प्रक्रिया के कारण वास्तविक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हट सकते हैं और इसका असर चुनावी नतीजों पर भी पड़ सकता है।

मई में सुप्रीम कोर्ट ने SIR की वैधता को बरकरार रखा था। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया था कि इस प्रक्रिया के आधार पर चुनाव आयोग यह फैसला नहीं कर सकता कि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक है या नहीं।