अरुणाचल सीमा पर तनाव के बीच मोदी-शी की मुलाकात, क्या सीमा मुद्दों पर होगी बात?
भारत-चीन सीमा (अरुणाचल प्रदेश) पर जारी तनाव इस मुलाकात की पृष्ठभूमि में एक अहम मुद्दा बना रहेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार (12 सितंबर 2026) को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करेंगे। दोनों नेताओं के बीच होने वाली इस बैठक का मुख्य फोकस व्यापार और दोनों देशों के लोगों के बीच संबंधों को बेहतर बनाने पर रहने की उम्मीद है। हालांकि, भारत-चीन सीमा (अरुणाचल प्रदेश) पर जारी तनाव इस मुलाकात की पृष्ठभूमि में एक अहम मुद्दा बना रहेगा।
Xinhua News के अनुार, चीन और भारत नई दिल्ली में होने वाले आगामी 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बैठक की तैयारियां कर रहे हैं। चीन के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।
शी जिनपिंग इससे पहले दो बार भारत आ चुके हैं। उन्होंने 2016 में गोवा में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन और उसके बाद ममल्लापुरम में आयोजित अनौपचारिक शिखर बैठक में हिस्सा लिया था। हालांकि, 2014 के बाद यह पहली बार होगा जब शी जिनपिंग दिल्ली का दौरा करेंगे।
2014 की यात्रा के दौरान उठे कई मुद्दे आज भी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं। वहीं, 2020 के बाद से दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के देशों की कोई द्विपक्षीय यात्रा नहीं की है।
The Hindu की एक रिपोर्ट के अनुसार, विशेषज्ञों का कहना है कि,
फिलहाल भारत-चीन संबंधों में किसी बड़े ‘रीसेट’ की घोषणा करना जल्दबाजी होगी। हालांकि, पिछले तीन वर्षों में दोनों नेताओं की यह तीसरी मुलाकात है और उम्मीद है कि इससे दोनों देशों के बीच मतभेदों को दूर करने तथा संवाद को अधिक खुला बनाने में मदद मिलेगी।
भारत की पूर्व विदेश सचिव और चीन तथा अमेरिका में राजदूत रह चुकीं निरुपमा मेनन राव ने The Hindu से कहा कि भारत और चीन के बीच समय-समय पर होने वाली शिखर बैठकों को अब एक स्थिर और निरंतर प्रक्रिया में बदलने की जरूरत है। उनका कहना है कि यह प्रक्रिया सैन्य और राजनीतिक मोर्चे के साथ-साथ आर्थिक संबंधों को स्थिर करने की दिशा में भी आगे बढ़नी
नई दिल्ली के सामने सबसे बड़ी चिंता वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर जारी तनाव है। हालांकि अक्टूबर 2024 में दोनों देशों की सेनाओं के बीच सभी प्रमुख टकराव वाले स्थानों से सैनिकों की वापसी यानी डिसइंगेजमेंट की घोषणा की गई थी, लेकिन सीमा पर स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है।
इसके बाद दोनों देशों के बीच टकराव वाले लगभग सभी क्षेत्रों में गश्त की व्यवस्था को लेकर समझौते हुए हैं। कुछ इलाकों में बफर जोन बनाए रखने पर भी सहमति बनी है।
पश्चिमी सेक्टर में स्थिति, जहां 2020 के तनाव के दौरान पैंगोंग त्सो झील और गलवान में हिंसक झड़पें हुई थीं, कुछ हद तक स्थिर हुई है। लेकिन अब पूर्वी सेक्टर और खासकर अरुणाचल प्रदेश से जुड़े इलाकों पर अधिक ध्यान केंद्रित है।
स्थानीय रिपोर्टों के साथ-साथ सरकार, सेना और सुरक्षा से जुड़े कई अधिकारियों के अनुसार,
तवांग क्षेत्र के आगे तक्सिंग में भारतीय सेना और चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के जवान अब भी LAC के अग्रिम मोर्चों पर तैनात हैं।
बताया गया है कि PLA ने ऊंचाई वाले स्थानों पर टेंट लगाए हैं, जबकि जुलाई में हुई एक संक्षिप्त झड़प के बाद भारतीय सेना ने भी इलाके में गश्त करने वाले जवानों की संख्या बढ़ाई है।
निरुपमा मेनन राव ने कहा कि पूर्वी सेक्टर में यथास्थिति बदलने की कोशिशों की खबरें सामने आई हैं। ऐसे में मोदी-शी मुलाकात का एक स्पष्ट नतीजा यह होना चाहिए कि दोनों नेता इस बात की फिर से पुष्टि करें कि सीमा पर शांति बनाए रखना जरूरी है। इसके बाद दोनों देशों के संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री मोदी को मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन द्वारा पाकिस्तान को दिए गए समर्थन का मुद्दा भी उठाना चाहिए।
विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने यह पुष्टि नहीं की है कि बातचीत के दौरान भारत मौजूदा सीमा स्थिति को सीधे उठाएगा या नहीं। हालांकि, दोनों देशों के अधिकारी सीमा विवाद के समाधान के लिए लगातार उच्च स्तर पर बातचीत कर रहे हैं।
पिछले सप्ताह पूर्वी सेक्टर में दोनों देशों के बीच कोर कमांडर स्तर की दो बैठकें हुईं। यह घटनाक्रम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की बीजिंग यात्रा और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ता के बाद हुआ।
इन वार्ताओं में दोनों पक्षों ने बॉर्डर पर्सनल मीटिंग (BPM) के लिए मौजूदा पांच स्थानों की संख्या बढ़ाने पर सहमति जताई। यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब तक सीमा कमांडरों की प्रमुख बैठकें पूर्वी लद्दाख में चुशुल-मोल्डो बॉर्डर मीटिंग प्वाइंट पर होती रही हैं। गलवान में जून 2020 की घातक झड़प के बाद भी इसी तंत्र के तहत बातचीत हुई थी।
मोदी और शी जिनपिंग की बैठक में विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ता की भी समीक्षा होने की संभावना है। इसमें सीमा विवाद के दीर्घकालिक समाधान की प्रक्रिया पर चर्चा हो सकती है। दोनों देशों के बीच LAC का वास्तविक स्वरूप और उसकी साझा परिभाषा अब तक पूरी तरह तय नहीं है। सीमा को निर्धारित, सीमांकित और चिन्हित करने की प्रक्रिया इसी व्यापक समाधान का हिस्सा है।
भारत और चीन के बीच सीमा पार बहने वाली नदियों का मुद्दा भी अब बातचीत में महत्वपूर्ण हो गया है। पिछले महीने चीन-नेपाल सीमा पर ग्लेशियर के टूटने से आई अचानक बाढ़ में हजारों लोगों की मौत के बाद आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों ने नदी संबंधी अधिक जानकारी साझा करने की जरूरत पर जोर दिया है। विशेषज्ञों ने चीन द्वारा ऊपरी क्षेत्रों में बनाए जा रहे बांधों और नदी जल प्रबंधन की अधिक निगरानी तथा उससे जुड़े आंकड़ों को साझा करने की मांग भी उठाई है।
मोदी-शी बैठक में व्यापार, निर्यात नियंत्रण और निवेश से जुड़े मुद्दे भी प्रमुखता से उठ सकते हैं। 2014 के बाद से भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग दोगुना होकर पिछले वर्ष करीब 150 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। हालांकि, इसी अवधि में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा भी करीब तीन गुना बढ़कर 113 अरब डॉलर हो गया है। 2014 में यह घाटा लगभग 38 अरब डॉलर था। इसके अलावा, चीन की ओर से महत्वपूर्ण खनिजों और भारी बुनियादी ढांचा उपकरणों के निर्यात पर समय-समय पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध भी भारत की चिंता बढ़ा रहे हैं।
भारत ने 2020 में चीनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को लेकर लगाए गए सुरक्षा संबंधी प्रतिबंधों में हाल में ढील दी है। इसके बावजूद चीन लगातार भारत में अपनी कंपनियों के साथ कथित भेदभावपूर्ण व्यवहार का मुद्दा उठाता रहा है।
पिछले सप्ताह चीनी दूरसंचार कंपनी शाओमी के खिलाफ जांच की सिफारिश भारत के गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO) द्वारा किए जाने के बाद चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि भारत को सभी देशों की कंपनियों के लिए ‘निष्पक्ष, न्यायसंगत, पारदर्शी और गैर-भेदभावपूर्ण कारोबारी माहौल’ सुनिश्चित करना चाहिए।
निरुपमा मेनन राव के मुताबिक भारत और चीन के बीच रणनीतिक संवाद का स्वागत किया जा सकता है, लेकिन इसमें दोनों पक्षों के बीच पारस्परिकता के मुद्दे को संबोधित किया जाना चाहिए।इन मुद्दों में भारत का व्यापार घाटा, भारतीय कंपनियों के लिए चीन में बाजार तक पहुंच, निवेश और वीजा प्रतिबंध तथा सीमा पार नदियों से संबंधित आंकड़ों को साझा करना शामिल है।
उन्होंने कहा कि मोदी-शी बैठक को भारत-चीन संबंधों के ‘रीसेट’ के तौर पर पेश नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, यह बैठक ऐसा ढांचा तैयार करने में मदद कर सकती है जिसमें दोनों देश अपने मतभेदों को खुले तौर पर स्वीकार करते हुए प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व की दिशा में आगे बढ़ें और धीरे-धीरे उन क्षेत्रों की संख्या बढ़ाएं जहां दोनों के हित समान हैं।