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पीएम मोदी की दो दशक में बनाई गई छवि दो हफ्तों में हुई ध्वस्त: अरुंधति रॉय

TCN Desk TCN Desk | 1h ago
पीएम मोदी की दो दशक में बनाई गई छवि दो हफ्तों में हुई ध्वस्त: अरुंधति रॉय

अरुंधति रॉय ने विपक्षी दलों से जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों से सीख लेने को कहा।

जंतर-मंतर पर हुए Gen Z और युवाओं के आंदोलन ने महज दो हफ्तों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दशक से अधिक समय में बनाई गई सार्वजनिक छवि को नष्ट कर दिया। इस आंदोलन ने भाजपा को ऐसा राजनीतिक झटका दिया है, जो “किसी भी चुनावी जीत से बड़ा” है। मशहूर लेखिका अरुंधति रॉय ने यह बात सोमवार को अपनी किताब “Mother Mary Comes to Me” के हिंदी अनुवाद “मेरी मां, मेरी गैंगस्टर” के लोकार्पण के मौके पर कहीं।


The Telegraph के अनुसार, अरुंधति रॉय ने कहा कि चुनाव में जीत और हार राजनीति का केवल एक पहलू है। हाल की जन लामबंदी ने दिखाया है कि दशकों में गढ़े गए नैरेटिव को भी कुछ ही हफ्तों में हिलाया जा सकता है।, “मुझे सबसे अच्छी बात यह लगती है कि किसी को नहीं पता कि हमारे साथ, इस देश के साथ आगे क्या होने वाला है। स्क्रिप्ट अभी लिखी जा रही है और इसमें हर किसी की अपनी भूमिका है। लोग अक्सर मान लेते थे कि उन्हें हजार साल तक इन्हीं परिस्थितियों में रहना पड़ेगा, लेकिन दो हफ्तों में इसे जड़ों से हिला दिया गया।”


इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) के खचाखच भरे हॉल में रॉय ने कहा,

“24 साल में बनाई गई प्रधानमंत्री मोदी की छवि, जिस पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, प्रेस कॉन्फ्रेंस तक नहीं की गई, जहां कुछ लोग उन्हें विष्णु का अवतार कहते हैं। उस पूरे 24 साल को दो हफ्तों में जेन जी और युवाओं ने तबाह कर दिया।”

“द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स” के लिए बुकर पुरस्कार जीत चुकीं रॉय ने हालांकि आगाह किया कि अगर सरकार संस्थानों और सत्ता के महत्वपूर्ण साधनों पर अपना नियंत्रण बनाए रखती है, तो चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। उन्होंने कहा, “अगर यह सरकार संस्थानों या सत्ता के साधनों पर नियंत्रण बनाए रखती है, तो हमारे लिए यह बहुत मुश्किल होगा।”

उन्होंने विपक्षी दलों और नागरिक समाज से लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के लिए मिलकर काम करने की अपील की। रॉय ने विपक्षी दलों से जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों से सीख लेने को भी कहा। उनके मुताबिक, वहां शामिल युवाओं ने “परिपक्वता” दिखाई, भले ही वे हर मुद्दे पर एक-दूसरे से सहमत न रहे हों। उन्होंने कहा, “उन्होंने अपनी भूमिका बहुत जिम्मेदारी से निभाई।”

64 वर्षीय रॉय ने प्रदर्शनकारियों के आपसी सहयोग की तुलना एक म्यूजिकल बैंड से की। उन्होंने कहा कि

म्यूजिकल बैंड में हर व्यक्ति की अपनी अलग-अलग भूमिका होती है, लेकिन सभी मिलकर एक साझा उद्देश्य के लिए काम करते हैं। “बेस गिटार बजाने वाला गायक नहीं हो सकता, गायक ड्रमर नहीं हो सकता और ड्रमर गिटारिस्ट नहीं हो सकता। सभी ने अपनी-अपनी भूमिका अलग-अलग तरीके से निभाई है। अब बड़ों को भी अपनी परिपक्वता दिखानी होगी।”

पिछले दो दशकों में रॉय ने कई नॉन-फिक्शन किताबें लिखी हैं। इनमें “द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस” समेत कई रचनाएं शामिल हैं। उन्होंने कश्मीर, बड़े बांधों, वैश्वीकरण, दलित चिंतक डॉ. बीआर आंबेडकर, माओवादी विद्रोहियों से मुलाकात और व्हिसलब्लोअर एडवर्ड स्नोडेन तथा हॉलीवुड अभिनेता जॉन क्यूसैक के साथ बातचीत जैसे विविध विषयों पर अनेक निबंध भी लिखे हैं।

रॉय को उनके प्रशंसक जितना सम्मान देते हैं, उनके आलोचक लगभग उतनी ही तीखी आलोचना करते रहे हैं। 2024 की PEN Pinter Prize विजेता रॉय के काम ने अक्सर तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं और कई बार उन्हें कानूनी विवादों का भी सामना करना पड़ा है। उनके पुतले जलाए गए, कार्यक्रमों में बाधा डाली गई, उन्हें ‘राष्ट्र-विरोधी’ कहा गया, ‘पाकिस्तान जाने’ तक की बात कही गई और उन्हें राजद्रोह तथा अदालत की अवमानना जैसे मामलों का भी सामना करना पड़ा।

प्रभात सिंह द्वारा अनुवादित और राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित “मेरी मां, मेरी गैंगस्टर” मुख्य रूप से अरुंधति रॉय और उनकी मां मैरी रॉय के जटिल रिश्ते पर आधारित है।

मैरी रॉय प्रसिद्ध शिक्षाविद और महिला अधिकार कार्यकर्ता थीं। उन्होंने केरल की सीरियन ईसाई महिलाओं को अपने पिता की संपत्ति में बराबरी का अधिकार दिलाने के लिए ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई लड़ी थी। रॉय के मुताबिक यह किताब “न तो उनकी आत्मकथा है और न ही उनकी मां की जीवनी”, बल्कि यह “एक रिश्ते की जीवनी” है—दो ऐसी महिलाओं के बीच रिश्ते की कहानी, जो संयोग से मां और बेटी थीं। रॉय ने यह भी बताया कि उन्होंने किताब में अपनी मां को “गैंगस्टर” क्यों कहा।

उन्होंने कहा, “कुछ लोग, शायद हिंदी भाषी दुनिया में, इस बात से नाराज हो जाते हैं कि मैंने अपनी मां को ‘गैंगस्टर’ कहा। लेकिन आलोचना करने वाले और मेरा बचाव करने वाले—दोनों असली बात समझ नहीं रहे हैं। आलोचक कहते हैं, ‘आप अपनी मां को गैंगस्टर कैसे कह सकती हैं?’ दूसरी तरफ मेरा बचाव करने वाले कहते हैं, ‘वह बस बहुत प्रोटेक्टिव थीं।’ दोनों गलत हैं। वह गैंगस्टर थीं।” रॉय ने आगे कहा, “सच कहूं तो जब भी मुझ पर हमला होता है—जैसा कि आजकल हर किसी के साथ होता है, मैं खुद से कहती हूं, ‘तुम जानते हो मेरी मां कौन है? तुम्हें पता है मैं किसकी बेटी हूं? तुम मेरा क्या बिगाड़ सकते हो?’”

अपनी किताब Mother Mary Comes to Me के अध्याय Collateral का जिक्र करते हुए रॉय ने बचपन की एक घटना सुनाई।

उन्होंने बताया कि एक रात उन्होंने सोने का नाटक किया था, जबकि उनकी मां ने आधी रात में उनके भाई को जगाया और लकड़ी के स्केल से उसकी पिटाई की। वजह यह थी कि उसके रिपोर्ट कार्ड में उसे “औसत छात्र” बताया गया था। अगली सुबह अच्छे अंक हासिल करने पर रॉय को उनकी मां ने प्यार से गले लगाया। रॉय ने कहा कि इस घटना ने सफलता और विशेषाधिकार को देखने के उनके नजरिए पर गहरी और स्थायी छाप छोड़ी।

किताब में वह लिखती हैं, “तब से मेरे लिए हर व्यक्तिगत उपलब्धि के साथ किसी अनहोनी की आशंका जुड़ी रहती है। जब कभी मेरे सम्मान में जाम उठाए जाते हैं या मेरी तारीफ में तालियां बजती हैं, मुझे हमेशा लगता है कि किसी दूसरे कमरे में किसी शांत व्यक्ति को पीटा जा रहा है।” उन्होंने कहा,

“लोग सोचते हैं कि मैं एक सफल लेखिका हूं। मैं नहीं हूं। लोग मेरा सम्मान करते हैं, मुझे पुरस्कार देते हैं, मुझे बुकर देते हैं... लेकिन दूसरे कमरे में किसी को पीटा जा रहा है। मेरा पूरा लेखन उसी के बारे में है।” इस रूपक को आगे बढ़ाते हुए रॉय ने कहा कि “किसी को पीटा जा रहा है” हर जगह—“गाज़ा में, किसी बस स्टैंड पर, किसी गांव में, जंतर-मंतर पर।”