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लागत अधिक, फिर भी सरकार क्यों ला रही है प्लास्टिक नोट?

TCN News Desk TCN News Desk | 1h ago
लागत अधिक, फिर भी सरकार क्यों ला रही है प्लास्टिक नोट?

भारतीय रिजर्व बैंक के 10 रुपये और 20 रुपये के प्लास्टिक नोटों के ट्रायल के प्रस्ताव को केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 10 रुपये और 20 रुपये के पॉलिमर (प्लास्टिक) नोटों के ट्रायल के प्रस्ताव को केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है। यह वही योजना है जिसकी घोषणा पहली बाप साल 2012 में ही की गई थी, लेकिन उस समय इसे लागू नहीं किया जा सका था। हालांकि सरकार ने साफ कर दिया है कि फिलहाल कागज के नोटों को पूरी तरह हटाकर उनकी जगह प्लास्टिक नोट लाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। यानी नए पॉलिमर नोट मौजूदा कागजी नोटों के साथ ही चलेंगे।

हालांकि एक पॉलिमर नोट को तैयार करने की लागत कागजी नोट से अधिक होती है, लेकिन उसकी लंबी उम्र के कारण कुल खर्च कम हो जाता है। कम नोट छापने पड़ते हैं, उनका परिवहन कम होता है, प्रोसेसिंग पर कम खर्च आता है और पुराने नोटों को नष्ट करने की लागत भी घट जाती है। इससे लंबे समय में मुद्रा प्रबंधन सस्ता और अधिक प्रभावी हो सकता है।

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लोकसभा में एक सवाल के जवाब में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि RBI के केंद्रीय निदेशक मंडल की सिफारिश पर 10 और 20 रुपये के एक-एक अरब (100 करोड़) पॉलिमर नोट फील्ड ट्रायल के लिए जारी करने का प्रस्ताव रखा गया था, जिसे सरकार ने मंजूरी दे दी है। यदि ट्रायल सफल रहता है तो इन नोटों की नियमित छपाई और जारी करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।


सरकार ने यह भी कहा कि फिलहाल यह योजना शुरुआती चरण में है। इसलिए इसका डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा, इसका आकलन अभी नहीं किया जा सकता। सरकार का कहना है कि नकद मुद्रा और डिजिटल पेमेंट दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और भविष्य में भी दोनों माध्यम लोगों के लिए उपलब्ध रहेंगे।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब RBI की सहायक कंपनी भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) ने हाल ही में पॉलिमर सब्सट्रेट की आपूर्ति के लिए कंपनियों से आवेदन (EOI) मांगे थे। कंपनी ने बताया था कि फिलहाल यह खरीद केवल फील्ड ट्रायल की जरूरत के लिए होगी। यदि ट्रायल सफल रहता है तो भविष्य में अलग-अलग मूल्यवर्ग के नोटों के लिए बड़े पैमाने पर पॉलिमर सामग्री की खरीद की जाएगी।

दरअसल, भारत में पॉलिमर नोटों का विचार नया नहीं है। दिसंबर 2012 में प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) ने जानकारी दी थी कि RBI और केंद्र सरकार ने पॉलिमर सब्सट्रेट पर नोट छापने का फैसला किया है। उस समय पांच शहरों में 10 रुपये के 100 करोड़ पॉलिमर नोटों का परीक्षण करने की योजना बनाई गई थी। हालांकि यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी और वर्षों तक ठंडे बस्ते में पड़ी रही। अब करीब 14 साल बाद इसे फिर से शुरू किया जा रहा है।

उस समय सरकार ने यह भी स्पष्ट किया था कि पॉलिमर नोटों का मुख्य उद्देश्य नकली नोटों पर रोक लगाना नहीं, बल्कि नोटों की उम्र बढ़ाना है।

पॉलिमर नोट सामान्य कागज के बजाय विशेष प्रकार की प्लास्टिक फिल्म (पॉलिमर सब्सट्रेट) पर छापे जाते हैं। यह सतह न तो रेशेदार होती है और न ही आसानी से नमी सोखती है। इसके विपरीत, भारत में मौजूदा बैंक नोट लंबे कपास के रेशों से बने विशेष कागज पर छापे जाते हैं। इसका मतलब यह है कि भारतीय कागजी नोटों के निर्माण के लिए पेड़ों की कटाई नहीं की जाती।

RBI पॉलिमर नोट लाने की सबसे बड़ी वजह उनकी लंबी उम्र है। खासकर 10 और 20 रुपये जैसे छोटे मूल्यवर्ग के नोट सबसे ज्यादा लोगों के हाथों से गुजरते हैं, इसलिए वे जल्दी फट जाते हैं और खराब हो जाते हैं। पॉलिमर नोट कागजी नोटों की तुलना में दो से छह गुना अधिक समय तक चल सकते हैं। इससे बार-बार नए नोट छापने की जरूरत कम होगी।

पर्यावरण के लिहाज से भी पॉलिमर नोटों को बेहतर माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने 2016 में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा था कि पॉलिमर नोट पर्यावरण पर कम प्रभाव डालते हैं। IMF के अनुसार, इनसे ग्लोबल वार्मिंग की संभावना लगभग 32 प्रतिशत और ऊर्जा की खपत करीब 30 प्रतिशत तक कम हो सकती है। साथ ही ये कागजी नोटों की तुलना में दोगुने से भी अधिक समय तक उपयोग में रहते हैं।

दुनिया के कई देश पहले ही पॉलिमर नोट अपना चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया ने सबसे पहले 1988 में पूरी तरह पॉलिमर बैंक नोट जारी किए थे। आज दुनिया के लगभग 60 देश किसी न किसी रूप में प्लास्टिक मुद्रा का इस्तेमाल कर रहे हैं। इनमें ब्रिटेन, कनाडा, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देश शामिल हैं। कनाडा ने 2011 में पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन करने के बाद धीरे-धीरे पॉलिमर नोटों को अपनाया। वहीं ऑस्ट्रेलिया के केंद्रीय बैंक के अध्ययन में पाया गया कि शुरुआती लागत अधिक होने के बावजूद पॉलिमर नोट लंबे समय में बड़ी बचत कराते हैं क्योंकि उन्हें कम बार बदलना पड़ता है।

RBI की हालिया वार्षिक रिपोर्ट भी बताती है कि भारत में नकदी की मांग लगातार बढ़ रही है। मार्च 2026 तक देश में प्रचलन में मौजूद मुद्रा का कुल मूल्य 12 प्रतिशत बढ़कर 41.23 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। वहीं RBI का नोट छापने पर खर्च वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग 24 प्रतिशत घटकर 4,875 करोड़ रुपये रह गया, क्योंकि कम संख्या में नए नोट छापने पड़े। रिपोर्ट के अनुसार, 500 रुपये का नोट अभी भी कुल प्रचलित मुद्रा मूल्य का लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा रखता है।

सरकार का कहना है कि फिलहाल यह केवल एक परीक्षण परियोजना है। यदि 10 और 20 रुपये के पॉलिमर नोटों का फील्ड ट्रायल सफल रहता है, तो भविष्य में अन्य मूल्यवर्ग के नोटों में भी इस तकनीक के इस्तेमाल पर विचार किया जा सकता है। फिलहाल आम लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कागजी नोट पूरी तरह बंद नहीं होंगे और दोनों तरह की मुद्रा साथ-साथ चलती रहेगी।