क्यों यूपी के 5,506 गांवों में अब भूतों ने बसा लिया है डेरा?
देशभर में करीब 28,000 गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं।
हमारे मुल्क की रूह पहले गांवों में बसती थी। लेकिन इन गांवों में अब लोग नहीं भूतों की आबादी बसती है। बियाबान हो चुके हैं गांव। देशभर में करीब 28,000 गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं। यह हम नहीं सरकारी आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि गांव के गांव खाली हो चुके हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स के 6.41 लाख गांवों के विश्लेषण में यह बात सामने आई है।
अध्ययन में गांवों के खाली होने को सड़क, स्कूल, बैंक और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की खराब उपलब्धता के साथ-साथ गांवों से शहरों की ओर बढ़ते पलायन से जोड़ा गया है। उत्तर प्रदेश के गांवों की स्थिति सबसे बदतर है। यूपी में सबसे ज्यादा 5,506 गांव खाली हो गए हैं। इन गांवों के लोग अब शहरों में बस चुके हैं।
The Telegraph के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े सरकारी आंकड़ों पर आधारित इस अध्ययन में पाया गया कि लगभग हर राज्य में ऐसे गांव मौजूद हैं, जहां अब कोई नहीं रहता। इनकी संख्या केरल में सिर्फ 1 है, जबकि उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 5,506 गांव खाली पाए गए हैं। खाली हो चुके गांवों में से करीब आधे ऐसे हैं, जहां से नजदीकी सड़क, सार्वजनिक परिवहन सुविधा, सीनियर सेकेंडरी स्कूल, बैंक, बाजार, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और अस्पताल कम से कम 10 किलोमीटर दूर हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह स्थिति बताती है कि गांवों की आबादी घटने में कमजोर बुनियादी ढांचे की बड़ी भूमिका हो सकती है।
अध्ययन का नेतृत्व करने वाले नई दिल्ली स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स के रिसर्च फेलो नवाज शरीफ ने कहा,
“इन खाली या ‘घोस्ट विलेज’ का भौगोलिक फैलाव चौंकाने वाला है। पहले के ज्यादातर आकलनों में माना जाता था कि ऐसे गांव मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में हैं। लेकिन खाली गांव इन पहाड़ी इलाकों से बहुत दूर देश के दो बड़े राज्य यूपी और बिहार में भी मौजूद हैं।”
ये निष्कर्ष केंद्र सरकार के मिशन अंत्योदय के आंकड़ों पर आधारित हैं। यह कार्यक्रम देशभर के गांवों में बुनियादी ढांचे और जरूरी सेवाओं की स्थिति का आकलन करता है। केवल लद्दाख, लक्षद्वीप, मिजोरम, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में एक भी खाली गांव दर्ज नहीं किया गया।
भारत अब भी मुख्य रूप से ग्रामीण आबादी वाला देश है। 2011 की जनगणना के बाद के अनुमानों के मुताबिक, देश की अनुमानित 1.4 अरब आबादी में से करीब दो-तिहाई लोग अभी भी गांवों में रहते हैं। शरीफ ने कहा,
“हम जो भौगोलिक पैटर्न देख रहे हैं, उनसे संकेत मिलता है कि बुनियादी ढांचे और जरूरी सेवाओं तक खराब पहुंच गांवों की आबादी घटने में योगदान दे रही है। जब आवश्यक सेवाएं कम से कम 10 किलोमीटर दूर हों, तो जीवन बहुत मुश्किल हो जाता है।”
विश्लेषण में देश के कई हिस्सों में खाली गांवों के बड़े समूह पाए गए। इनमें उत्तर प्रदेश में 5,506,बिहार में 3,431, ओडिशा में 3,303, महाराष्ट्र में 2,413, कर्नाटक में 1,723 और असम में 1,703 खाली गांव शामिल हैं। दूसरे राज्यों में भी कम संख्या में ऐसे गांव पाए गए हैं। जिन राज्यों में गांवों से बाहर पलायन की दर अधिक है, वहां खाली गांवों का एक जगह बड़ी संख्या में मिलना ग्रामीण से शहरी पलायन, कृषि संकट और असमान विकास के पहले से दर्ज व्यापक रुझानों से मेल खाता है। हालांकि नए अध्ययन में इन कारणों की सीधे तौर पर जांच नहीं की गई है।
शरीफ ने कहा, “गांवों की आबादी खत्म होने के कारण अलग-अलग राज्यों और इलाकों में अलग हो सकते हैं। इन्हें समझने के लिए हमें और शोध करने की जरूरत है।” हालांकि कुछ विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि गांव छोड़कर शहर जाने से लोगों की जिंदगी हमेशा बेहतर नहीं होती।
घटक ने कहा, “लोग अक्सर गांवों की तुलना में शहरों में ज्यादा कमाते हैं। लेकिन ज्यादा आमदनी का मतलब जरूरी नहीं कि जीवन भी बेहतर हो जाए, खासकर तब जब प्रवासी लोगों को आवास, शिक्षा और दूसरी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है।”
घटक के मुताबिक, कोविड-19 के बाद से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की देशव्यापी उपलब्धता ने भी गांवों से पलायन को बढ़ावा दिया हो सकता है। पीडीएस देशभर में दुकानों का एक नेटवर्क है, जिसके जरिए पात्र परिवारों को अनाज और दूसरी जरूरी खाद्य वस्तुएं सब्सिडी वाली कीमतों पर और कुछ मामलों में मुफ्त उपलब्ध कराई जाती हैं।
शरीफ और कूचबिहार पंचानन बर्मा विश्वविद्यालय की शोधकर्ता दीक्षा छेत्री का यह अध्ययन देश के गांवों का अपनी तरह का शुरुआती राष्ट्रव्यापी भू-स्थानिक (geospatial) आकलन है। अध्ययन के मुताबिक,
खाली हो चुके गांवों में से करीब आधे गांवों से नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल 10 किलोमीटर से ज्यादा दूर है। करीब 61 प्रतिशत खाली गांवों से नजदीकी प्राथमिक स्कूल कम से कम 5 किलोमीटर दूर है, जबकि आधे से कुछ ज्यादा गांवों से नजदीकी बैंक 10 किलोमीटर से अधिक दूर है।
अध्ययन ने आबादी वाले गांवों में भी बुनियादी ढांचे और जरूरी सेवाओं की गंभीर कमी उजागर की है। आबाद गांवों में करीब 42 प्रतिशत गांव नजदीकी अस्पताल से कम से कम 10 किलोमीटर दूर हैं। 24 प्रतिशत गांवों से नजदीकी बैंक 10 किलोमीटर या उससे ज्यादा दूर है। वहीं करीब 20-20 प्रतिशत गांव नजदीकी सीनियर सेकेंडरी स्कूल और बाजार से कम से कम 10 किलोमीटर दूर हैं।