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रूस से तेल खरीदेगा भारत तो 100 प्रतिशत टैरिफ लगाएगा अमेरिका, बिल पास

TCN Desk TCN Desk | 08 Aug, 2026 · 5 min read
रूस से तेल खरीदेगा भारत तो 100 प्रतिशत टैरिफ लगाएगा अमेरिका, बिल पास

रूसी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार भारत एक बार फिर अमेरिका के निशाने पर आ गया है।

राष्ट्रीयता, आतंकवाद, परमाणु निस्त्रीकरण और जमीन की लड़ाई ये सब तो बस बहाना है। अमेरिका बस धंधे के लिए युद्ध लड़ता है। तेल और हथियार के धंधे पर अमेरिका कभी भी दूसरे मुल्क की बादशाहत को बर्दाश्त नहीं कर सकता है। कोई भी मुल्क अमेरिका का सगा नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अब यह खुशफहमी छोड़ देनी चाहिए कि डोनाल्ड ट्रंप उनके सच्चे मित्र है। रूस के साथ भारत की मित्रता आज की नहीं है। नेहरू के जमाने से ही रूस हमारा स्वाभाविक मित्र रहा है। रूस और भारत की मित्रता से अमेरिका हमेशा चिढ़ता रहता है और इस जलन को अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया है। रूसी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार भारत एक बार फिर अमेरिका के निशाने पर आ गया है।

अमेरिकी सीनेट ने एक नए प्रतिबंध विधेयक को मंजूरी दी है, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मॉस्को से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देगा। 86-11 के भारी बहुमत से पारित यह कानून ट्रंप को रूसी ऊर्जा के दुनिया के सबसे बड़े खरीदारों पर टैरिफ लगाने की अनुमति देता है।


अमेरिकी सीनेट ने रूस और उसके पेट्रोलियम उत्पादों के प्रमुख खरीदारों, जैसे चीन और भारत पर टैरिफ लगाने वाले विधेयक को भारी बहुमत से मंजूरी दी। दावा किया गया है कि इस तरह का व्यापार यूक्रेन युद्ध को जारी रखने में मदद करता है। इस विधेयक का नाम बदलकर ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ कर दिया गया है।

यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की अनुमति देता है, जो रूसी तेल और गैस के पांच सबसे बड़े आयातकों में शामिल हैं। फिलहाल चीन, भारत, अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया रूस से तेल और गैस के पांच सबसे बड़े आयातक हैं।

Telegraph की एक रिपोर्ट के अनुसार, गौरतलब है कि अमेरिकी टैरिफ का भारत पर सीधा असर पड़ सकता है। जून में भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी रिकॉर्ड 52 प्रतिशत थी, जबकि जुलाई में यह करीब 56 प्रतिशत तक पहुंच गई। रूसी कच्चे तेल का एक और बड़ा ग्राहक चीन भी निशाने पर आ सकता है, हालांकि इस बात को लेकर संदेह है कि अमेरिका ऐसा जोखिम उठाएगा या नहीं। इस विधेयक को दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने पिछले महीने ने जोर-शोर से इसे आगे बढ़ाया था। इसका उद्देश्य यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए उसके ऊर्जा निर्यात को निशाना बनाना था, जो क्रेमलिन की कमाई के सबसे बड़े स्रोतों में से एक है।

सीनेटर डारलाइन ग्राहम, जिन्हें अपने भाई की जगह लेने के लिए नामित किया गया है ने कहा कि ,

“यह कानून पुतिन को वहीं चोट पहुंचाता है, जहां उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान होता है।”

इस प्रस्ताव को अभी प्रतिनिधि सभा की मंजूरी मिलनी बाकी है और यह भी स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप इसके सबसे सख्त प्रावधानों का इस्तेमाल करेंगे या नहीं। प्रतिबंधों को किस तरह लागू किया जाए, इस मामले में यह कानून राष्ट्रपति को काफी अधिकार देता है। लेकिन सिर्फ इस तरह के कदम की आशंका ही भारत के सामने मुश्किल सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त है।

2022 में मॉस्को के यूक्रेन पर आक्रमण के बाद से ही रूसी कच्चा तेल भारत की ऊर्जा रणनीति की रीढ़ है। सस्ते रूसी तेल ने भारत को वैश्विक तेल कीमतों के झटकों से बचाने में मदद की है और रिफाइनरियों के मुनाफे को भी मजबूत बनाए रखा है। भारतीय रिफाइनरियां पूरी क्षमता से काम कर रही हैं और जुलाई में रिफाइंड ईंधन का निर्यात 2026 के सबसे ऊंचे मासिक स्तर पर पहुंचने की उम्मीद है।

यूक्रेनी ड्रोन लगातार रूसी रिफाइनरियों पर हमले कर रहे हैं, जिससे पूरे देश में तेल प्रसंस्करण क्षमता प्रभावित हुई है। इस बीच भारत को इससे लाभ कमाने का एक और रास्ता भी मिल गया है। मॉस्को ऐसी असामान्य स्थिति में पहुंच गया है कि उसे भारत समेत दूसरे देशों से ईंधन आयात करना पड़ रहा है। शिपिंग डेटा कंपनी केप्लर के मुताबिक, रूस का गैसोलीन उत्पादन घटकर करीब 3,08,000 बैरल प्रतिदिन रह गया है, जो पिछले 21 वर्षों का सबसे निचला स्तर है।

केप्लर के वरिष्ठ विश्लेषक सुमित रितोलिया के अनुसार,

हमलों और लगातार चल रही मरम्मत के कारण रूस की रिफाइनिंग व्यवस्था लगातार दबाव में है। रूसी तेल भारत की “ऊर्जा सुरक्षा के लिए सबसे मजबूत सुरक्षा कवच हैं, क्योंकि यह बड़ी मात्रा में उपलब्ध होने के साथ भरोसेमंद और कम कीमत वाला भी है।

मॉस्को की तेल बिक्री को गंभीर रूप से सीमित करने की किसी भी कोशिश के परिणाम रूस से कहीं आगे तक जा सकते हैं। इससे ऊर्जा की कीमतें बढ़ सकती हैं और तेल आयात करने वाले देशों की लागत में इजाफा हो सकता है। मॉस्को अब भी दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा निर्यातकों में से एक है। अगर ईरानी और रूसी कच्चे तेल पर एक साथ प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।

यही दुविधा लंबे समय से अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों के लिए रूस पर प्रतिबंध लगाने की कोशिशों को जटिल बनाती रही है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से वॉशिंगटन ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन साथ ही कुछ छूट भी दी हैं, ताकि रूसी तेल वैश्विक बाजारों तक पहुंचता रहे और दुनिया भर में ऊर्जा कीमतों का बड़ा संकट पैदा न हो। भारत के लिए रूसी तेल, जिसने ईंधन की लागत को नियंत्रण में रखने में मदद की है, अब बड़ी परेशानी भी खड़ी कर सकता है। अगर यह विधेयक कानून बन जाता है और ट्रंप इसके सबसे सख्त प्रावधानों का इस्तेमाल करने का फैसला करते हैं, तो भारत के सामने कठिन विकल्प हो सकता है—सस्ता रूसी कच्चा तेल खरीदना जारी रखे या अपने सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार अमेरिका के साथ एक और टकराव का जोखिम उठाए।