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सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस को दी भंग करने की चेतावनी, पूछा-किसके एजेंडे पर करते हैं काम?

TCN Desk TCN Desk | 51m ago · 4 min read
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस को दी भंग करने की चेतावनी, पूछा-किसके एजेंडे पर करते हैं काम?

कोर्ट ने यूपी पुलिस से कहा कि अगर इस तरह सभी मामलों में आप पर्दा डालेंगे तो लोग आप पर भरोसा कैसे करेंगे?

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक आपराधिक मामले की जांच में उत्तर प्रदेश पुलिस के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि क्यों न राज्य की सभी जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी जाएं।

Bar and Bench की एक रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने टिप्पणी की कि,

क्यों न उत्तर प्रदेश पुलिस को भंग कर राज्य की सभी जांच सीबीआई को सौंप दी जाए।

अदालत ने कहा,

हर मामले में आपका कोई एजेंडा होता है। अगर आप मामलों में इस तरह आगे बढ़ेंगे, तो लोग आप पर कैसे भरोसा करेंगे? बेहतर होगा कि हम यूपी पुलिस की सभी जांचों में सीबीआई को दखल देने के लिए कहें। क्यों न हम यूपी पुलिस को भंग ही कर दें। यह बेतुका रवैया किसी न किसी मोड़ पर बंद होना चाहिए।

अदालत ने ये सख्त टिप्पणियां एक जांच में गंभीर अनियमितताओं का संज्ञान लेने के बाद कीं। इस मामले में शिकायतकर्ता ने मोटरसाइकिल सवार को मौके पर पकड़कर स्थानीय पुलिस के हवाले कर दिया था। इसके बावजूद पुलिस ने एफआईआर एक “अज्ञात” मोटरसाइकिल सवार के खिलाफ दर्ज की। जांच को जिस तरह आगे बढ़ाया गया, उस पर नाराजगी जताते हुए पीठ ने कहा,

किसी के इशारे पर चलना एक बात है, लेकिन उसके लिए किसी भी हद तक चले जाना दूसरी बात। और इस तरह मामले पर पर्दा डालने की कोशिश? जितना कम कहा जाए, उतना बेहतर है।

यह मामला एक शिकायतकर्ता की ओर से दाखिल याचिका से जुड़ा है। वह अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश हुईं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पुलिस की प्रारंभिक रिपोर्ट शुरुआत से ही पक्षपातपूर्ण थी। शिकायतकर्ता ने कहा कि,

मोटरसाइकिल से जुड़ी एक घटना के बाद उन्होंने स्वयं सवार को पकड़कर पुलिस के हवाले किया था। हालांकि, पुलिस ने जानबूझकर “अज्ञात” व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और आरोपी का नाम वाला कॉलम खाली छोड़ दिया।

याचिकाकर्ता ने आगे बताया कि जब हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए स्थिति रिपोर्ट मांगी, तब पुलिस ने मोटरसाइकिल सवार का नाम आरोपपत्र में शामिल किया, लेकिन बाद में उसे क्लीन चिट दे दी। उन्होंने यह भी बताया कि जब मोटरसाइकिल जब्त की गई थी, तब उस पर नंबर प्लेट नहीं थी। इसके बावजूद जांच के दौरान रहस्यमय ढंग से उसका एक पंजीकरण नंबर सामने आ गया।

इस रवैये पर कड़ी आपत्ति जताते हुए पीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से पेश वकील से पूछा,

एफआईआर अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज की गई थी? जब व्यक्ति को मौके पर पकड़ लिया गया था, तो आपने अज्ञात क्यों लिखा? जब मोटरसाइकिल सवार मौके पर पकड़ा गया था, तो आपने अज्ञात मोटरसाइकिल सवार के खिलाफ एफआईआर क्यों दर्ज की? लोग पुलिस पर कैसे भरोसा करेंगे?”

अदालत ने कहा कि पकड़े गए संदिग्ध का नाम शुरुआती एफआईआर में खाली छोड़ना और बाद में मामले के विवरण में हेरफेर करना संस्थागत विश्वसनीयता और कानून लागू करने वाली एजेंसियों पर जनता के भरोसे को पूरी तरह खत्म कर देता है।

पीठ ने सवाल किया,

आप आरोपी को मौके पर पकड़ लेते हैं, लेकिन एफआईआर में उसका नाम नहीं लिखना चाहते। शायद अगर समीकरण बन जाएं, तो आप नाम बदल सकें और अपनी ओर से किसी का नाम डाल सकें। क्या आप अलग-अलग एफआईआर के आरोपियों की कोई सूची रखते हैं, ताकि जिसके खिलाफ कम एफआईआर हों, उसका नाम शामिल कर दें? क्या वहां इसी तरह काम होता है?

अदालत ने आगे कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामा पूरी तरह असंतोषजनक था। इसके बाद पीठ ने संबंधित पुलिस अधिकारी को अगली सुनवाई पर अदालत में उपस्थित होकर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि आरोपी का नाम एफआईआर में क्यों शामिल नहीं किया गया था।

पीठ ने आदेश में कहा,

हमें यूपी पुलिस की ओर से दाखिल हलफनामा पूरी तरह असंतोषजनक लगा। अधिकारी अगली सुनवाई पर बेहतर हलफनामे के साथ अदालत में उपस्थित हों और बताएं कि एफआईआर एक अज्ञात मोटरसाइकिल सवार के खिलाफ क्यों दर्ज की गई, जबकि यह स्वीकार किया गया तथ्य है कि उक्त मोटरसाइकिल सवार को मौके पर पकड़ लिया गया था। हलफनामे के पैरा 6 में सवार का नाम तुषार बताया गया है। शुरुआत में एफआईआर में नाम खाली क्यों छोड़ा गया और बाद में क्यों जोड़ा गया, इसकी वजह स्पष्ट की जानी चाहिए।