SC ने संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफ़रोज़ की NSA रद्द की, यूपी सरकार पर लगाया 10 लाख का जुर्माना
संभल मामले में सुप्रीम कोर्ट से यूपी सरकार को बड़ा झटका
सुप्रीम कोर्ट ने 2024 की संभल हिंसा के आरोपी मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA), 1980 के तहत की गई निवारक हिरासत रद्द कर दी है। अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का वह फैसला भी निरस्त कर दिया, जिसमें हिरासत के आदेश को बरकरार रखा गया था।
Live Law की एक रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार पुलिस हिरासत में अफरोज द्वारा दिए गए कबूलनामे के आधार पर निवारक हिरासत का आदेश नहीं दे सकती थी। अदालत ने अवैध हिरासत आदेश के लिए उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।
फैसला सुनाते समय जस्टिस दत्ता ने अपने उस लॉ क्लर्क को श्रद्धांजलि दी, जिनका 27वें जन्मदिन से पहले निधन हो गया था। उन्होंने यह फैसला उन्हीं को समर्पित किया। इससे पहले, 8 सितंबर को फैसला सुरक्षित रखते हुए पीठ ने सवाल उठाया था कि पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे का निवारक हिरासत के आदेश में क्या महत्व है और क्या उससे हिरासत के लिए आवश्यक संतुष्टि बनाई जा सकती है।

मुल्ला अफरोज शाही जामा मस्जिद के अदालत के आदेश पर हुए सर्वेक्षण के बाद भड़की संभल हिंसा के आरोपी हैं। इस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी। घटना के करीब 54 दिन बाद उन्हें पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे के आधार पर गिरफ्तार किया गया था। बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट से उन्हें जमानत मिल गई, लेकिन 13 अक्टूबर 2025 को NSA के तहत उनकी निवारक हिरासत का आदेश जारी कर दिया गया। हाई कोर्ट ने इस आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट में अफरोज की ओर से दलील दी गई कि हिंसा के दौरान पुलिस ने भी गोली चलाई थी, लेकिन इस पहलू की निष्पक्ष जांच नहीं हुई। उन्होंने इस संबंध में विरोध याचिका दाखिल करने की अनुमति मांगी। उनकी ओर से यह भी कहा गया कि पुलिस हिरासत में दिया गया कबूलनामा कानून के तहत स्वीकार्य साक्ष्य नहीं है।
अफरोज के वकील ने तर्क दिया कि केवल कई आपराधिक मामले दर्ज होने से निवारक हिरासत उचित नहीं ठहराई जा सकती। इसके लिए पर्याप्त सामग्री के आधार पर निष्पक्ष और सोच-समझकर बनाई गई संतुष्टि आवश्यक है। उन्होंने रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य और अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ठोस आधार के बिना किसी व्यक्ति के दोबारा अपराध में शामिल होने की आशंका हिरासत का वैध आधार नहीं बन सकती।
वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार ने आदेश का बचाव करते हुए कहा कि अफरोज से हिंसा भड़कने या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी। सरकार के अनुसार, उपलब्ध सामग्री से ऐसी आशंका सामने आती हो तो निवारक हिरासत उचित हो सकती है। कबूलनामे के सवाल पर राज्य ने कहा कि उसकी प्रासंगिकता पर उचित कानूनी कार्यवाही में विचार किया जाना चाहिए।
इस मामले में तीन सप्ताह पहले हुई पिछली सुनवाई के दौरान,
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यशैली और पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे के आधार पर एहतियाती हिरासत (Preventive Detention) लगाने पर कड़े सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि क्या पुलिस कस्टडी का कबूलनामा नजरबंदी आदेश का आधार बन सकता है ? हालांकि उस वक़्त फैसले को सुरक्षित रख लिया गया था।
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दलील दी गई कि उपलब्ध सामग्री से यह आशंका थी कि मुल्ला अफरोज भविष्य में हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे को एहतियाती हिरासत का वैध आधार मानने से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे के आधार पर NSA हिरासत का आदेश पारित नहीं किया जा सकता।

दरअसल, ये मामला नवंबर 2024 में उत्तर प्रदेश के संभल स्थित शाही जामा मस्जिद सर्वे के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है। आरोपी मुल्ला अफरोज पर शाही जामा मस्जिद बनाम श्रीहरिहर मंदिर सर्वेक्षण के दौरान भड़की हिंसा में भीड़ एकत्रित करने और हथियार मुहैया कराने का आरोप लगा था। उसे इस मामले का मास्टर माइंड बताया गया था। उस पर 16 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई की गई थी।
शिकायतकर्ता के अनुसार, नखासा थाना क्षेत्र के मोहल्ला खग्गू सराय अंजुमन के निवासी यामीन ने 6 फरवरी 2025 को सीजेएम अदालत में याचिका दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि उनका 24 वर्षीय बेटा आलम 24 नवंबर को रस्क (टोस्ट) बेचने घर से निकला था और शाही जामा मस्जिद क्षेत्र पहुंचते ही पुलिसकर्मियों ने उसे गोली मार दी थी। लेकिन पुलिस ने आलम पर ही हत्या की कोशिश, घातक हथियारों से दंगा, सरकारी कर्मचारी को ड्यूटी से रोकने के लिए चोट पहुंचाने जैसी धाराओं में मामला दर्ज किया था

इस मामले में इसी साल जनवरी में संभल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) अदालत ने तत्कालीन ASP अनुज चौधरी, इंस्पेक्टर अनुज तोमर और 20 अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था।
आरोप था कि संभल हिंसा के दौरान, जो जामा मस्जिद सर्वे से जुड़ी थी, एक युवक को गोली मारी गई थी। लेकिन पुलिस के आला अफसरों ने यह आदेश मानने से इंकार कर दिया था। पुलिस कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही थी। कोर्ट का आदेश सामने आने के बाद संभल के एसपी केके विश्नोई ने कहा था कि आदेश अवैध है। इसलिए FIR दर्ज नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा कि इस मामले की न्यायिक जांच हो चुकी है, उसकी जांच रिपोर्ट में पुलिस एक्शन को सही माना गया है। इस सीजेएम कोर्ट के फैसले की अपील ऊपर की अदालत में करेंगे।