राहुल गांधी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में कार्रवाई पर SC ने लगाई रोक
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा CBI-ED जांच के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है।
बता दें कि कर्नाटक के भाजपा कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर ने राहुल गांधी पर आय से अधिक संपत्ति के स्रोतों से अधिक संपत्ति का आरोप लगाते हुए CBI-ED जांच की मांग की थी। मई में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एजेंसियों को शिकायत में लगाए आरोपों की जांच के निर्देश दिए थे। इसी को लेकर राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट गए हुए थे।
सोमवार को मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने राहुल गांधी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में आगे कार्यवाही न करने को कहा है। साथ ही CBI और ED को भी हाई कोर्ट के सामने इस मामले में कोई रिपोर्ट दाखिल न करने का निर्देश दिया गया है।
खास बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह फैसला नहीं दिया है कि राहुल गांधी के खिलाफ लगाए गए आरोप सही हैं या गलत। उसने फिलहाल हाई कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाकर मामले को अपने सामने सुनने का रास्ता खोला है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता एस. विग्नेश शिशिर, CBI और ED को नोटिस भी जारी किया है।
गौरतलब है कि इससे पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त को राहुल गांधी के खिलाफ चल रही उस आपराधिक कार्यवाही को भी रद्द कर दिया था जिसमें राहुल गांधी ने विनायक दामोदर सावरकर को अंग्रेजों का सहयोगी बताया था। अदालत ने कहा कि राहुल गांधी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए कानून के तहत आवश्यक मंजूरी नहीं ली गई थी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने लखनऊ के एक मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन को चुनौती देने वाली गांधी की याचिका स्वीकार कर ली है। पीठ ने गौर किया कि उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में यह नहीं बताया गया कि गांधी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए जरूरी मंजूरी दी गई थी।
पीठ ने कहा कि अगर मंजूरी नहीं है, तो कोई मामला नहीं बनता। आपको कानून का पालन करना होगा।
पीठ ने अपने आदेश में कहा, “हमने पक्षकारों के विद्वान वकीलों की दलीलें सुनी हैं। प्रतिवादी उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में मंजूरी दिए जाने का कोई उल्लेख नहीं है। ऐसी स्थिति में मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेशों को रद्द किया जाता है।
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