ज्ञानेश कुमार के जेल जाने का रास्ता बंद नहीं हुआ है
चुनाव आयुक्तों को मिली कानूनी सुरक्षा का अर्थ यह नहीं है कि कानून के उल्लंघन के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो सकती।
SIR पर चुनाव आयोग को घेरने के एक दिन बाद पूर्व केंद्रीय गृह सचिव आर.के. सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपने रुख को और स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा है कि तीनों चुनाव आयुक्तों को कानून के तहत मिली अभियोजन से छूट उन “कानून और नियमों के उल्लंघन में किए गए कार्यों” पर लागू नहीं होती। मतलब साफ है कि CEC ज्ञानेश कुमार के जेल जाने का रास्ता अभी बंद नहीं हुआ है।
पूर्व केंद्रीय गृह सचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री आर.के. सिंह ने कहा है कि,
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को अभियोजन से मिला कानूनी संरक्षण, कानून और नियमों का उल्लंघन करने वाले कार्यों पर लागू नहीं होता।
सिंह ने इससे पहले एक खुले पत्र में मतदाता सूचियों के SIR की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि यह प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के प्रावधानों का उल्लंघन करके चलाई गई।
पत्र पर मिली प्रतिक्रियाओं में कुछ लोगों ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को 2023 के कानून की धारा 16 के तहत आपराधिक कार्यवाही से संरक्षण प्राप्त है। सिंह ने इस व्याख्या को गलत बताया।
सोशल मीडिया मंच एक्स पर सिंह ने एक खुले पत्र में लिखा कि,
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को यह संरक्षण केवल आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए कार्यों के लिए मिलता है। उनके अनुसार, कानून और नियमों का उल्लंघन आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं हो सकता। इसलिए ऐसे कार्यों के लिए उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है। सिंह का यह बयान चुनाव आयुक्तों को मिले संरक्षण के दायरे पर उनकी कानूनी व्याख्या है।
अपने खुले पत्र में सिंह ने आरोप लगाया कि देश के इतिहास में पहली बार सरकार लोगों को मताधिकार से वंचित करने के अभियान पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि अब तक सरकार और चुनाव आयोग के प्रयास सभी पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करने पर केंद्रित रहे थे। इसका उद्देश्य लोकतंत्र को मजबूत करना और नागरिकों को अधिकार देना था, लेकिन मौजूदा प्रक्रिया इसके विपरीत दिशा में जा रही है।
सिंह ने एसआईआर की वैधानिकता के साथ चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि,
पूरे देश में एसआईआर कराने का फैसला आयोग ने लिया था या केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने। उनका कहना है कि इतने व्यापक फैसले के बारे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसमें सभी चुनाव आयुक्तों की भागीदारी थी या नहीं।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 का हवाला देते हुए सिंह ने कहा कि,
विशेष पुनरीक्षण की अनुमति केवल विशेष परिस्थितियों में दी गई है। उनके अनुसार, इसके लिए कारण लिखित रूप में दर्ज किए जाने चाहिए और यह किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके एक हिस्से के लिए होना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि विशेष मामलों के लिए दिए गए अपवाद को सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता।
इसी आधार पर सिंह ने पूरे देश के लिए गहन पुनरीक्षण का आदेश जारी किए जाने को गैरकानूनी बताया। उन्होंने सामान्य एसआईआर को बरकरार रखने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी गलत कहा। उन्होंने अपनी पोस्ट में सवाल किया कि देशव्यापी एसआईआर का फैसला किस स्तर पर और किस प्रक्रिया के तहत लिया गया।

पूर्व गृह सचिव ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ लंबित अपीलों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने उन संशोधित सूचियों के आधार पर चुनाव कराए, जिनमें नाम हटाने के खिलाफ अपीलों का निपटारा बाकी था। सिंह के अनुसार, धारा 21 के तहत सभी अपीलों का निपटारा होने तक मूल मतदाता सूची प्रभावी रहनी चाहिए। सिंह ने कहा कि संशोधित मतदाता सूची तभी पूरी मानी जा सकती है, जब नाम शामिल करने या हटाने से संबंधित सभी अपीलों का निपटारा हो जाए। उनका तर्क था कि जहां अपीलें लंबित थीं, वहां अधिसूचना की तारीख पर प्रभावी मूल सूची का इस्तेमाल होना चाहिए था। इसके विपरीत, नाम हटाए जाने वाली नई सूची के इस्तेमाल को उन्होंने अवैध बताया।
मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया पर सिंह ने अधिनियम की धारा 22 का उल्लेख किया। उनके अनुसार,
किसी मतदाता का नाम हटाने का अधिकार निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी यानी ईआरओ को है। यह कार्रवाई निर्धारित आधारों पर, विशिष्ट जांच और संबंधित व्यक्ति को अपनी बात रखने का उचित अवसर देने के बाद ही की जा सकती है। उन्होंने अपीलों के निपटारे को भी इस प्रक्रिया से जोड़ा।
सिंह ने आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार ने उन सभी मतदाताओं के नाम बिना आधार हटाए, जिन्हें ईआरओ ने 2003 के बाद सूची में शामिल किया था। उनके मुताबिक, न जांच की गई और न पंजीकृत मतदाताओं को कारण बताओ नोटिस दिया गया। उन्होंने इसे स्पष्ट रूप से गैरकानूनी कार्रवाई बताया और कहा कि नाम हटाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
इस संदर्भ में सिंह ने,
सुप्रीम कोर्ट के 1995 के फैसले, ‘लाल बाबू हुसैन एवं अन्य बनाम निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी एवं अन्य’, का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि पहले से पंजीकृत मतदाता को अयोग्य साबित करने के लिए साक्ष्य प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी अधिकारियों की है। उनके अनुसार, यह जिम्मेदारी मतदाता पर नहीं डाली जा सकती कि वह दोबारा अपनी पात्रता साबित करे।
नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में किए गए बदलाव पर भी सिंह ने सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि दो चुनाव आयुक्तों के विरोध के बावजूद ज्ञानेश कुमार ने इसे जोड़ा। सिंह के मुताबिक, इसमें आवेदकों से 2003 की मतदाता सूची में उनके माता-पिता के नाम की क्रम संख्या मांगी गई, जिससे युवा आवेदकों के लिए पंजीकरण कठिन हुआ।
सिंह ने फॉर्म 6 के जरिए बड़ी संख्या में दर्ज आपत्तियों की प्रक्रिया पर भी जवाब मांगा। उन्होंने पूछा कि ये आपत्तियां किसने दाखिल कीं, इन्हें कैसे स्वीकार किया गया और इनके आधार पर कार्रवाई कैसे हुई। उन्होंने यह भी सवाल किया कि संबंधित फॉर्म पर हस्ताक्षर करने वाले लोग उपस्थित क्यों नहीं हुए।
पश्चिम बंगाल के संबंध में सिंह ने दावा किया कि ईआरओ द्वारा पात्र पाए गए 16 लाख मतदाताओं को सूची में शामिल नहीं किया गया, क्योंकि चुनाव आयोग ने उनके नाम शामिल करने के खिलाफ अपीलें दायर की थीं। उन्होंने गोवा का भी उदाहरण दिया। उनके अनुसार, वहां 97 मतदाता ईआरओ द्वारा पात्र पाए जाने के बावजूद मतदाता सूची से बाहर रह गए।
सिंह ने आरोप लगाया कि,
पिता और बच्चे की दर्ज उम्र में 15 वर्ष से कम अंतर को नाम हटाने का आधार बनाया गया। उनके मुताबिक, अनुमानित जन्म वर्षों से पैदा हुई ऐसी विसंगतियों पर बिना जांच कार्रवाई करना अनुचित है। उन्होंने दावा किया कि ‘तार्किक विसंगति’ वाले नाम जांच के बिना हटाए गए और इसे अधिनियम की धारा 21 के विपरीत बताया।
सिंह ने मतदाता सूची में इस्तेमाल किए गए ‘Logical Discrepancy’ मानदंड पर भी आपत्ति जताई।
उनका तर्क है कि देश के गरीब और हाशिए पर रहने वाले कई परिवारों के पास जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज नहीं होते और वे अपनी उम्र का अनुमानित वर्ष बताते हैं।
कुल मिलाकर,
आर.के. सिंह का ताजा बयान मुख्य रूप से इस दावे पर केंद्रित है कि चुनाव आयुक्तों को मिली कानूनी सुरक्षा का अर्थ यह नहीं है कि कानून के उल्लंघन के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो सकती। उनके SIR संबंधी आरोपों पर चुनाव आयोग का पक्ष अलग है और आरोपों तथा उनके कानूनी प्रभाव को संबंधित कानून, आधिकारिक रिकॉर्ड और अदालतों के फैसलों के संदर्भ में देखा जाना होगा।