लड़कियों को ज्ञान मत दीजिए, उनका गुस्सा समझिए
मर्दों पर इन लड़कियों की नाराज़गी एकदम जायज़ है
लड़कियाँ गुस्से में हैं। लड़कियाँ दुखी हैं। लड़कियाँ परेशान हैं।
अकेले दिल्ली में 48 घंटे में तीन बलात्कारों की खबरें आईं। अलग-अलग इलाक़ों से। अलग-अलग उम्र की पीड़िताएं। अलग-अलग तरह के बलात्कारी।
दिल्ली में लड़कियों के प्रतिष्ठित लेडी श्रीराम कॉलेज ने अपनी क्लासेज ऑनलाइन कर दीं क्योंकि लड़कियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना मुश्किल था। बगल के एक पार्क में बलात्कार हुआ था।
यह देश की राजधानी है। यहाँ दिल्ली पुलिस है जिस पर केंद्र का नियंत्रण है। वही दिल्ली पुलिस जो किसी साधारण से आयोजन से पहले भी सौ बार पूछताछ करती है। हालत यह है कि पचासेक लड़कियों ने बिना झंडे, बिना नारे, बिना पोस्टर रात में सड़कों पर निकलना तय किया तो वहाँ सैकड़ों की संख्या में पुलिस पहुँच गई, रास्ते खाली करा लिए गए, घेर कर चल रही पुलिस का दावा था कि वह सुरक्षा दे रही है, लेकिन लड़कियों का सवाल था कि जब हम पर हमले होते हैं तब क्यों नहीं मिलती सुरक्षा?
और पुलिस के पास इसका कोई जवाब नहीं था!
दिल्ली यूनिवर्सिटी की लड़कियाँ बैनर और नारों के साथ आई थीं। ये आमतौर पर लगने वाले नारे नहीं थे। छात्र आंदोलन या नारीवादी आंदोलन से निकले हुए नारे नहीं थे। लड़कियों ने खुद गढ़े थे - एक चाय दो समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा? नारी अपने आप की, नहीं किसी के बाप की।
ताज़ा नारे। आम लोगों के नारे।
इस पीढ़ी के नारे। जेन जी कहते हैं जिसे। जिसने अभी कुछ वक़्त पहले सरकार को झुकाया है। जिसे खुश करने के लिए पक्ष-विपक्ष सब जान लगा रहे हैं।

दिक़्क़त बस यही है कि अपनी पीढ़ी की जीत भी इनकी मुकम्मल जीत नहीं बन पाती। परीक्षा और नौकरी का अधिकार तो मिल जाता है लेकिन कॉलेज और दफ़्तर और उनके रास्तों और पार्क और घर तक में उनकी सुरक्षा का मामला सिर्फ़ उनका रह जाता है। चार दिन के शोर के अलावा किसी को कोई असर नहीं पड़ता। समाज का बड़ा हिस्सा तो उन्हें ही ज़िम्मेदार बताने में लग जाता है।

ऐसे कपड़े क्यों पहने? इतनी रात को वहाँ क्यों गई? लड़के के साथ क्यों घूम रही थी? घरवालों को बताया क्यों नहीं? वगैरह-वगैरह।
अभी जमुई में हुई घटना का वीडियो वायरल हुआ तो ऐसे ही सवाल पूछे जाने लगे और सत्ताधारी दल की एक मंत्री महोदया इस 'मॉरल पुलिसिंग' की भर्त्सना करने की जगह सलाह देने लगीं कि थोड़ा हल्के से होनी चाहिए थी! यह सवाल तो कोई पूछ नहीं रहा कि पूरी तरह से अनैतिक गुंडों को नैतिक पुलिसिंग का हक़ किसने दिया? समाज ने? सरकार ने? संविधान ने? या फिर पुलिस ने?
और फिर कुछ नाराज़ मर्द आ जाएंगे कहते Not All Men.
मतलब चार आतंकवादियों के नाम पर पूरे धर्म को बदनाम कर दोगे। कथित दलित और पिछड़ी जातियों के बारे में सदियों से जनरलाइजेशन होता रहा तो किसी को दिक़्क़त नहीं हुई। यहाँ तो बलात्कार करने वाले सौ प्रतिशत मर्द ही हैं। तो सवाल क्या जानवरों पर उठेगा? बारह-पंद्रह साल के लड़कों से लेकर सत्तर-पचहत्तर साल के बूढ़े तक। सड़क पर कचरा उठाने वालों से लेकर सरकारी अफसर, नेता, बिजनेसमैन, टीचर, प्रोफेसर.. हर तरह के मर्द! तो लड़कियाँ 'मर्द जात' पर सवाल क्यों न उठायें?
निर्भया कांड हुआ था दिल्ली में। देश भर में शोर मचा था। मर्द शायद पहली बार बलात्कार के खिलाफ़ इस बड़ी संख्या में सड़क पर आए। क़ानून बना। बातें हुईं। और फिर.. और फिर सब सामान्य हो गया। सरकार के पास एक ही दवा है- कड़ा क़ानून। कड़े क़ानूनों से अपराध रुकने होते तो दुनिया में हत्या जैसा अपराध कबका रुक गया होता।
और क़ानून लागू तो जज साहेबान को करने हैं न? तो उन्हें पेन्टरेशन की तलाश आज भी है, कपड़े फाड़ना रेप का प्रयास नहीं है, घर में ज़बरदस्ती घुस के कपड़े फाड़ने की कोशिश रेप नहीं है, गुप्तांगों को ग़लत तरीक़े से छूना, ज़बरदस्ती की कोशिश करना रेप नहीं है। सब तो कहा जा चुका है अलग-अलग कोर्ट में। मतलब बलात्कारी बलात्कार करने में सफल न हो तो उसे आज़ाद छोड़ दो ताकि वह फिर कोशिश कर सके? ज़मानत दे दो ताकि पीडिता की हत्या कर सके? जब समाज मर्दाना है तो औरतों के हक़ में बने क़ानून भी मर्दाना तरीक़े से ही लागू होंगे।
और कठुआ से लेकर तमाम जगहों पर हमने देखा है कि बलात्कारी के समर्थन में जुलूस निकलने लगे हैं अब। अपने धर्म-जाति का बलात्कारी है तो देवता बन जाता है। उसके समर्थन में बड़े-बड़े लोग जाते हैं। कोर्ट में वकीलों की और सड़कों पर समर्थकों की भीड़ लग जाती है। अखबार बताने लगते हैं कि रेप हुआ ही नहीं। कोर्ट से पहले मीडिया का फ़ैसला आ जाता है।
तो क्या करें लड़कियाँ? दो ही रास्ता छोड़ा है आपने- या तो चुप होकर खुद को क़ैद कर लें या फिर पूरी ताक़त से विरोध करें।
उन्होंने विरोध करना चुना है तो विरोध के तरीक़ों पर ज्ञान न दीजिए, ज्ञान ज़्यादा हो गया हो तो बलात्कारियों को दीजिए, उस परवरिश को दीजिए जिसमें लड़की की देह युद्धस्थल बना दी जाती है। उस पारिवारिक संरचना को बदलिए जहाँ लड़की का जन्म दुख का कारण बन जाता है। उन अखबारों को दीजिए जिन्हें बलात्कारियों का समर्थन करने में शर्म नहीं आती। खुद को दीजिए जो अपने अगल-बगल लड़कियों/महिलाओं का अपमान नहीं रोक पाते।
उन लड़कियों का गुस्सा तो जायज़ है, उन पर सर झुका लीजिए शर्म से और आईने में देखिए खुद को। कौन जाने वहाँ भी एक संभावित रेपिस्ट छिपा हो।