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गृह मंत्रालय ने धर्म के आधार पर मांगा 15 साल का डेटा, राज्यों ने खड़े किए हाथ

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 6 min read
गृह मंत्रालय ने धर्म के आधार पर मांगा 15 साल का डेटा, राज्यों ने खड़े किए हाथ

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने धार्मिक स्थलों के बारे में भी विस्तृत विवरण मांगा है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय की जनसांख्यिकीय बदलाव संबंधी उच्चस्तरीय समिति ने राज्य सरकारों से पिछले 15 वर्षों का विस्तृत ब्यौरा मांगा है। The Hindu की एक रिपोर्ट के अनुसार, समिति जानना चाहती है कि इस दौरान अलग-अलग जिलों में जन्म पंजीकरण, स्कूलों में दाखिले, वाहन पंजीकरण और संपत्ति के लेनदेन में धर्म के आधार पर क्या बदलाव आए। लेकिन राज्य सरकारों के अधिकारियों का कहना है कि ज्यादातर विभाग इस तरह के आंकड़े नियमित रूप से तैयार या सुरक्षित नहीं रखते। ऐसे में समिति के सभी सवालों का जवाब देना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गई है।


जनसांख्यिकीय बदलाव संबंधी उच्चस्तरीय समिति, यानी HLCDC, का गठन मई 2026 में केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर इसकी अध्यक्षता कर रहे हैं। समिति को अवैध प्रवासन और अन्य ‘असामान्य कारणों’ से होने वाले जनसांख्यिकीय बदलावों का अध्ययन करने तथा उनसे निपटने के लिए उपाय सुझाने की जिम्मेदारी दी गई है। इसका गठन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 15 अगस्त 2025 की उस घोषणा के बाद हुआ, जिसमें उन्होंने ‘अस्वाभाविक जनसांख्यिकीय बदलावों’ का मुद्दा उठाया था।

The Hindu की रिपोर्ट में बताया गया है कि समिति की ओर से राज्यों को भेजे गए सवालों का दायरा काफी व्यापक है। उसने केवल आबादी से जुड़े सीधे आंकड़े ही नहीं मांगे हैं, बल्कि ऐसे सरकारी रिकॉर्ड का भी धर्म के आधार पर विवरण चाहा है जिन्हें विभाग आम तौर पर उस रूप में संकलित नहीं करते। इनमें जन्म पंजीकरण और स्कूलों में दाखिले के साथ वाहन पंजीकरण तथा संपत्ति की खरीद-बिक्री जैसे रिकॉर्ड शामिल हैं। राज्यों से इन जानकारियों को जिले और धर्म के आधार पर पिछले 15 वर्षों के लिए उपलब्ध कराने को कहा गया है।

अधिकारियों के मुताबिक, मुश्किल यहीं से शुरू होती है। किसी विभाग के पास जन्म, वाहन या संपत्ति के पंजीकरण की कुल संख्या हो सकती है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उसके रिकॉर्ड से धर्म के आधार पर 15 साल का भरोसेमंद विवरण भी निकाला जा सके। जहां जानकारी उस स्वरूप में दर्ज ही नहीं की गई, वहां पुराने रिकॉर्ड की समीक्षा करके उसे तैयार करना कठिन होगा। राज्य स्तर पर अलग-अलग विभागों से जानकारी इकट्ठा करना भी अपने आप में एक लंबी प्रक्रिया हो सकती है।

समिति ने राज्यों से मतदाता पंजीकरण और स्कूलों में दाखिले के असामान्य रुझानों की जानकारी भी मांगी है। सवाल यह है कि किन जिलों या क्षेत्रों में पंजीकरण की संख्या में असामान्य बढ़ोतरी दिखाई देती है और उसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं। अधिकारियों के सामने इस संबंध में भी रिकॉर्ड की उपलब्धता और उनकी तुलना करने की चुनौती है। खासकर जहां पहले से पीढ़ीवार या धर्म के आधार पर जानकारी नहीं रखी गई, वहां किसी बदलाव की ठोस तस्वीर पेश करना आसान नहीं होगा।

कांग्रेस ने जनसांख्यिकीय बदलाव संबंधी उच्चस्तरीय समिति की ओर से धर्म के आधार राज्य सरकार से डाटा मंगाने की कवायद का विरोध किया है।


धार्मिक स्थलों के बारे में भी विस्तृत विवरण मांगा गया है। समिति जानना चाहती है कि पिछले 15 वर्षों में विभिन्न जिलों में कितने मंदिर, मस्जिद और चर्च जैसे धार्मिक ढांचे स्थापित हुए। इसके साथ ही उसने धार्मिक स्थलों से जुड़ी अन्य उपलब्ध जानकारी भी मांगी है। समिति ने अनुसूचित जनजाति समुदायों में धर्मांतरण को लेकर किए गए अध्ययनों और खुफिया आकलनों का विवरण भी राज्यों से चाहा है।

एक अन्य महत्वपूर्ण सवाल विभिन्न क्षेत्रों की धार्मिक आबादी में आए बदलाव से जुड़ा है। समिति ने सीमावर्ती जिलों, आदिवासी इलाकों और संविधान की पांचवीं तथा छठी अनुसूची के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों पर जानकारी मांगी है। पांचवीं अनुसूची के तहत आने वाले क्षेत्रों के प्रशासन और आदिवासी हितों की सुरक्षा के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान हैं। छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में स्वायत्त जिला परिषदों की व्यवस्था करती है। इन क्षेत्रों से जुड़ी जानकारी को समिति अपने अध्ययन में शामिल करना चाहती है।

गैर बीजेपी शासित राज्य सरकारों के कुछ अधिकारियों ने धर्म के आधार पर इतने व्यापक आंकड़े जुटाने के संदर्भ में संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का सवाल भी उठाया है। उनका कहना है कि सरकारी विभाग सामान्य प्रशासनिक कामकाज के दौरान ज्यादातर श्रेणियों का धर्म के आधार पर ब्यौरा नहीं रखते। इसलिए सवाल केवल आंकड़े भेजने का नहीं, बल्कि यह समझने का भी है कि मांगी गई जानकारी मौजूदा रिकॉर्ड से किस हद तक तैयार की जा सकती है।

इस कवायद की तुलना सच्चर समिति से भी की जा रही है। वर्ष 2005 में गठित उस समिति का उद्देश्य भारत में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का अध्ययन करना था।

यहां यह जानना जरूरी है 2006 में सच्चर समिति की सिफारिशों के कुछ पहलुओं का तत्कालीन विपक्षी दल भाजपा ने विरोध किया था।

अब राज्य सरकारों के सामने तत्काल प्रश्न यह है कि वे समिति को कौन-से आंकड़े अपने मौजूदा रिकॉर्ड के आधार पर दे सकती हैं और किन सवालों के लिए जानकारी उपलब्ध ही नहीं है। समिति की रिपोर्ट कितनी विस्तृत होगी, यह काफी हद तक राज्यों से मिलने वाले आंकड़ों की उपलब्धता और गुणवत्ता पर निर्भर करेगा।

रिपोर्ट के अनुसार,

समिति ने राज्यों को 35 सवालों की प्रश्नावली भेजी है। इसमें जन्म पंजीकरण, स्कूलों में दाखिले, वाहनों के पंजीकरण और संपत्ति के लेनदेन का धर्म और जिले के आधार पर विवरण माँगा गया है। आधार, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड के पंजीकरण में असामान्य बढ़ोतरी की जानकारी भी माँगी गई है।

राज्यों से पिछले 15 वर्षों में बने मंदिरों, मस्जिदों और चर्चों समेत धार्मिक स्थलों तथा उनकी जीआईएस मैपिंग का ब्यौरा देने को कहा गया है। समिति ने शहरों, औद्योगिक केंद्रों, सीमावर्ती जिलों और आदिवासी इलाकों की धार्मिक आबादी में बदलाव की जानकारी भी माँगी है। अनुसूचित जनजाति समुदायों में धर्मांतरण से जुड़े अध्ययन और खुफिया आकलन भी प्रश्नावली का हिस्सा हैं।

अधिकारियों ने बताया कि जन्म पंजीकरण और पकड़े गए या निर्वासित किए गए बिना वैध दस्तावेज़ वाले प्रवासियों के आँकड़ों को छोड़कर, धर्म के आधार पर माँगी गई अधिकांश जानकारी उपलब्ध नहीं है। उनके मुताबिक, संवैधानिक व्यवस्था भी एक वजह है कि सरकारी विभाग सामान्यतः ऐसे आँकड़े एकत्र नहीं करते।

समिति ने हिरासत केंद्रों, जाली पहचान दस्तावेज़ों और बिना वैध दस्तावेज़ वाले प्रवासियों के संगठित अपराध, मानव तस्करी तथा नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों से कथित संबंधों की जानकारी भी माँगी है। इसके अलावा राज्यों से अनधिकृत प्रवासन और बसावट रोकने के लिए उठाए गए कदमों का ब्यौरा माँगा गया है।

समिति अब तक जम्मू क्षेत्र का दौरा कर चुकी है और महाराष्ट्र जाने की योजना है। सरकारी सूत्रों ने The Hindu को यह भी बताया कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान संदिग्ध विदेशी नागरिकता के आधार पर हटाए गए मतदाताओं का माँगा गया डेटा निर्वाचन आयोग ने अभी तक समिति को उपलब्ध नहीं कराया है।