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जंतर-मंतर पर अब नहीं कर पाएंगे विरोध-प्रदर्शन?

TCN News Desk TCN News Desk | 1h ago
जंतर-मंतर पर अब नहीं कर पाएंगे विरोध-प्रदर्शन?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन से स्थानीय लोगों को परेशानी होती है।

जो जंतर-मंतर विरोध-प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की आजादी का सदियों से गवाह रहा है। जहां की सड़क पर समय-समय पर लोकतंत्र को बचाने के लिए छात्रों-किसानों और मजलूमों की आवाज गूंजती है, उस पर भी मोदी सरकार की नजरें टेढ़ी होने लगी है। मोदी सरकार में विरोध-प्रदर्शन को कुचलने के लिए वो सभी उपाय किए जाते हैं जो उन्हें असहज करता है। अब साजिश रची जा रही है कि जंतर-मंतर पर संवैधानिक रूप से कोई विरोध प्रदर्शन न हो। इसके लिए सरकार संवैधानिक संस्था पर भी दवाब बढ़ा सकती है।

इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका पर विचार करने की सहमति जताई, जिसमें कहा गया है कि जंतर-मंतर अब विरोध-प्रदर्शनों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं रह गया है। कोर्ट ने कहा कि इससे स्थानीय निवासियों को परेशानी होती है और आवश्यक सेवाएं भी बाधित होती हैं।

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कहना न होगा कि परीक्षा पेपर लीक को लेकर एक महीने से ज्यादा समय तक छात्रों और प्रदर्शनकारियों का चला लोकतांत्रिक और शांतिप्रिय आंदोलन ने मोदी सरकार को अंदर से कमजोर कर दिया है। यही कारण है कि पुलिसिया दमन के बाद सरकार अब संवैधानिक संस्थाओं पर दवाब बढ़ाते हुए देश में विरोध-प्रदर्शन की आवाज को ही चुप कराना चाह रही है।

जंतर -मंतर पर विरोध-प्रदर्शन को हमेशा के लिए प्रतिबंधित करने के लिए चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सतीश चंद कौशिक द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया। अदालत ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से याचिका में उठाए गए मुद्दों पर संबंधित अधिकारियों से निर्देश लेने को कहा।

याचिका में विरोध-प्रदर्शनों के आयोजन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने की मांग की गई है। इसमें कहा गया है कि जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों के कारण स्थानीय निवासियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और आवश्यक वस्तुओं तथा चिकित्सा सेवाओं की आपूर्ति भी प्रभावित होती है। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा कि याचिका में इलाके में आने-जाने और आवाजाही से जुड़ी चिंताएं उठाई गई हैं।

चीफ जस्टिस ने कहा कि,

“याचिका में कहा गया है कि आने-जाने से जुड़ी समस्याओं के कारण जंतर-मंतर अब ऐसे विरोध-प्रदर्शनों के लिए उचित स्थान नहीं है। चिकित्सा संबंधी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति आदि का भी मुद्दा है। मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है... मिस्टर सॉलिसिटर, इस पर निर्देश लीजिए। नोटिस जारी किया जाए और मामले को अलग से सूचीबद्ध किया जाए।”

कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने एक प्रस्तावित राजनीतिक मार्च का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा,

अरविंद केजरीवाल ने एक टाउन हॉल बुलाया और प्रधानमंत्री आवास तक मार्च करने का फैसला किया और कहा कि “20 जुलाई जैसी एक और घटना से बचा जाना चाहिए।” इस दलील पर पीठ ने प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

चीफ जस्टिस ने कहा,

“वे जानते हैं कि इसे कैसे संभालना है। अगर वे नहीं संभाल पाते हैं, तो स्थिति को गलत तरीके से संभालने के मामले में हमारे पास आएं। मुझे भरोसा है कि वे इसे संभाल लेंगे। अदालत ने इस मामले को अलग से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।

जंतर-मंतर के बदले विरोध-प्रदर्शन के लिए किसी दूसरे वैकल्पिक स्थान की तलाश कब होगी यह तो पता नहीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जिस तत्परता से इस याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है उसे लेकर लोकतांत्रिक व्यवस्था में सवाल उठने लगे हैं। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या भविष्य में किसी भी मुद्दे पर होने वाले किसी आंदोलन को भी वैसा ही समर्थन, ताकत और सहानुभूति मिलेगी, जैसी 20 जुलाई के बाद देखने को मिली थी। बता दें कि पेपर लीक के विरोध में यह आंदोलन 20 जून 2026 को शुरू हुआ था और 36 दिनों तक चलने के बाद 25 जुलाई 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद वापस ले लिया गया था।

हांलाकि इसके बाद से कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट, जो शुरुआत में इस मामले को लेकर सतर्क रुख अपना रहा था, कोर्ट का न्यायिक हस्तक्षेप अब एक महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गया है। शुरुआती याचिकाओं से आगे बढ़ते हुए सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई ने अब एक नया आयाम ले लिया है। घायल पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों के परिवार भी कानूनी कार्यवाही में शामिल हो गए हैं। उन्होंने न्याय की मांग करते हुए उन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR को एकतरफा तरीके से वापस लेने के किसी भी कदम का विरोध किया है, जिन पर कानून तोड़ने या हिंसा में शामिल होने के आरोप हैं।

सुप्रीम कोर्ट इन सवालों का किस तरह समाधान करता है, इससे भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण रूपरेखा तय हो सकती है। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि शांतिपूर्ण असहमति और कानूनसम्मत शासन किस तरह एक साथ कायम रह सकते हैं, बिना स्थिति को अराजकता की ओर जाने दिए। इसी दिशा में सुप्रीम कोर्ट कई बड़े कदमों पर विचार कर रहा है। पुलिस की कथित ज्यादती की शिकायतों की जांच के लिए एक स्वतंत्र और उच्चस्तरीय टीम गठित करने की संभावना पर विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही अदालत यह भी देख रही है कि

भीड़ को नियंत्रित करने के तरीकों को किस तरह अपनाया जाए, ताकि प्रदर्शनकारियों, आम नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों—सभी की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। अदालत सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ हुई हिंसा के मामलों की भी समीक्षा कर रही है, ताकि जवाबदेही केवल एक पक्ष तक सीमित न रहे, बल्कि सभी पर समान रूप से लागू हो।

इन सुनवाइयों का उद्देश्य ऐसी स्पष्ट और देशव्यापी गाइडलाइंस तैयार करना है, जिनसे सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनी रहे और साथ ही लोगों की लोकतांत्रिक आवाज तथा विरोध के अधिकार का भी सम्मान हो। इसी संदर्भ में यह समझना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि इन पूरी कार्यवाहियों के दौरान आंदोलन के नेतृत्व ने किस तरह दोहरी रणनीति अपनाई।