मेटा को हड़काने से छवि नहीं सुधरेगी मोदी जी
मोदी और उनके सलाहकार समझ ही नहीं पा रहे हैं कि इस बार परसेप्शन की लड़ाई वह हार गए हैं।
बांकीपुर उपचुनाव में पूर्व केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद का एक बयान वायरल हुआ जिसमें दिखा कि वह कह रहे हैं कि भाजपा कुत्ता-बिल्ली को भी वहाँ से जिता लेगी, बयान अधूरा था और दस सेकंड की क्लिप काटकर ठीक उसी तरह से फैलाया गया था जैसे राहुल गांधी के बयान को काटकर ‘आलू से सोना’ जैसी ढेरों वायरल क्लिप्स पहले चलाई गई थीं।
सोशल मीडिया मोदी सरकार और दक्षिणपंथी इको-सिस्टम का सबसे बड़ा हथियार था, लेकिन इसके इस्तेमाल के समय उन्होंने यह नहीं सोचा था कि ऐसे हथियार दो धार वाले होते हैं और कभी भी उलटे पड़ सकते हैं। जब भारत सरकार मेटा को बुलाकर प्रधानमंत्री के वीडियो पर माफ़ी मांगने और सरकार विरोधी कंटेन्ट के बढ़ते अलागरिदम की शिकायत करने की बात कर रही है तो इस वर्चुअल तलवार की दूसरी धार से उसका डर बहुत साफ़ दिखाई दे रहा है।
पिछले बारह-तेरह वर्षों में सोशल मीडिया और दोस्त-पूँजीपतियों के मालिकाने वाला कथित नेशनल मीडिया, मोदी और उनकी सरकार के पक्ष में परसेप्शन बिल्डिंग के सबसे कारगर हथियार बने। मीम, एडिटेड वीडियो, दस सेकंड वाली क्लिप्स जो पल में सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती थी और व्हाट्सप्प के ज़रिए करोड़ों मोबाइलों में पहुँच कर एक तरफ़ राहुल गांधी की ‘पप्पू’ वाली छवि को लगातार मज़बूत करती थी तो दूसरी तरफ़ नरेंद्र मोदी की विश्वगुरु वाली इमेज को। इसका फ़ायदा चुनावों में तो मिला ही, गंभीर मुद्दों पर विपक्ष के सवालों को डाइल्यूट करने में भी सरकार को इसकी पूरी मदद मिली।
असल में नई तकनीक का उपयोग सत्ताएं अक्सर इसी तरह करती रही हैं और सत्ता में होते हुए उन्हें लगता है कि वे ऐसा अनंतकाल तक कर सकती हैं। हिटलर के समय रेडियो और सिनेमा नया था, ईदी अमीन के समय टीवी और ओबामा के समय सोशल मीडिया। हिटलर ने अपना मैसेज जर्मनी के कोने-कोने में पहुंचाने के लिए रेडियो का इस्तेमाल किया। गोएबल्स का काम ही था रेडियो और सिनेमा को ऐसे नियंत्रित करना कि वहाँ से हिटलर की तारीफ़ के अलावा और कुछ प्रसारित न हो। असर हुआ, जर्मन जनता में हिटलर का समर्थन लगातार बढ़ा और हर हिटलर विरोधी को ग़द्दार की तरह देखने का भी।
ईदी अमीन ने अपनी क्रूरता को घर-घर पहुँचाने और लोगों में डर भरने के लिए टीवी का इस्तेमाल किया। ओबामा इस सूची में odd man out लग सकते हैं लेकिन अपने चुनाव प्रचार में सोशल मीडिया के इतने ज़बरदस्त इस्तेमाल के वह पहले उदाहरण हैं। उनके प्रतिद्वंद्वी जॉन मैकेन की पत्नी ने इस दौरान दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि हमें रोज़ यह डर लगता था कि कहीं हम लिन्च न कर दिए जाएँ। पर्याप्त जंगखोरी के बावजूद ओबामा की जो लिबरल मानवीय छवि बनी, उसमें भी सोशल मीडिया का बड़ा योगदान था। पिछले चुनावों में एलन मस्क का ट्विटर खरीदना और पूरी तरह से ट्रम्प के पक्ष में उसे झोंक देना, सोशल मीडिया की ताक़त का एक और नमूना था।
भारतीय जनता पार्टी के नीति निर्देशकों ने इन उदाहरणों से बहुत कुछ सीखा और भारत में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाली पहली बड़ी पार्टी बनी, वैसे सोशल मीडिया का यह इस्तेमाल आम आदमी पार्टी और उसके पहले अन्ना आंदोलन के दौर में भी जम कर किया गया और तब सत्ता में बैठी कांग्रेस इसके महत्त्व को स्वीकार करने से बचती रही।
इस पूरे खेल का एक हिस्सा था अपने ज़मीनी कार्यकर्ताओं के बड़े हिस्से को सोशल मीडिया ट्रोल्स में तब्दील कर देना और हज़ारों की संख्या में ऐसे बॉट तैयार करना जो लगातार विरोधियों को अपमानित कर सकें, गालियाँ दे सकें और आई टी सेल की पोस्ट्स को बूस्ट कर सकें। नतीजा यह कि एक तरफ़ लोग इन असंख्य और अनियंत्रित गालियों से डरे तो दूसरी तरफ़ सोशल मीडिया अलॉगरिदम में सरकार समर्थक पोस्ट्स लगातार बाज़ी मारती रहीं।
विपक्ष, खासतौर पर, कांग्रेस को गालियाँ देना और मज़ाक उड़ाना तो ट्रेंडिंग बना ही, मुसलमानों के बारे में घटिया टिप्पणियाँ भी लगातार ट्रेंड करती रहीं। यह सब सरकार के लिए अनुकूल था और तब मेटा या किसी अन्य प्लेटफ़ॉर्म से कोई दिक़्क़त नहीं थी सरकार को, हालांकि ऐसे माहौल में भी लगातार सरकार विरोधी पोस्ट्स को हटवाने, विरोधी ट्विटर हैंडल्स को बंद करवाने की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई थी।
नीट-लीक विरोधी आंदोलन ने इस पूरे खेल को पलट दिया है। हालाँकि पहले भी कम से कम ट्विटर पर नैरेटिव सरकार के हाथ से फिसलता जा रहा था लेकिन इस आंदोलन में वह पीढ़ी सड़क पर आई थी जो पैदा होने के बाद से ही मोबाइल से खेल रही है, तकनीक के मामले में अपनी पिछली पीढ़ियों से कई कदम आगे है और जिनका एक मोहल्ला हमेशा सोशल मीडिया पर रहता है।
टिकटॉक बैन के बाद इनका अड्डा इंस्टाग्राम बना और रील्स सबसे बड़ा हथियार। तो जब आंदोलन को दबाने की बर्बर कोशिशें हुईं तो इन्होंने अपने हथियार का ज़बरदस्त और क्रिएटिव इस्तेमाल इस कुशलता से किया कि सत्तर पार के नरेंद्र मोदी को रील बनाने पर मज़बूर होना पड़ा और मोहन भागवत को जेन जी से संवाद की योजना बनानी पड़ी।
यह अब मोदी सरकार के लिए बड़ी चिंता बन गई है, कांग्रेस का सोशल मीडिया व्यू लगातार भाजपा से आगे है और सीजेपी इन दोनों के कुल व्यू से ज़्यादा पहुँच बना रही है। इसमें अगर सरकार विरोधी रील्स को जोड़ दें तो कोई तुलना ही नहीं है। पहले राहुल को गाली देना ट्रेंडिंग था तो अब मोदी सरकार की आलोचना ट्रेंडिंग है तो उसके वीडियोज़ बन रहे हैं, वायरल हो रहे हैं। इसे चाहकर भी मेटा या कोई कंपनी रोक नहीं पाएगी।
असल में, मोदी और उनके सलाहकार समझ ही नहीं पा रहे हैं कि इस बार परसेप्शन की लड़ाई वह हार गए हैं, चौहत्तर साल के प्रधानमंत्री से युवा अपनी तरह की रील नहीं, ज़िम्मेदारी की उम्मीद करते हैं। रीलें और आई टी सेल की हास्यास्पद एडिटिंग वाली वीडियो उन्हें और दयनीय बना रही हैं।
मेटा को हड़काकर इसे नहीं बदला जा सकता और बदलने के लिए जो करना है, वह किया तो अब तक की अपनी सारी नीतियों को पलटना पड़ेगा।