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इजरायल में नेतन्याहू की हार का मतलब क्या है?

Ashok Kumar Pandey Ashok Kumar Pandey | 1h ago · 6 min read
इजरायल में नेतन्याहू की हार का मतलब क्या है?

नेतन्याहू की हार के बाद भी युद्ध की संभावनाएं कम नहीं हुई हैं

इजरायल के हालिया चुनाव परिणामों को लोकतांत्रिक बदलाव या क्षेत्र में शांति की संभावनाओं के रूप में देखने की कोई खास वजह नहीं है। चुनाव के नतीजे एक बार फिर यह संकेत देते हैं कि इजरायली राजनीति में ज़ायनिस्ट विचारधारा का दबदबा बना हुआ है। लगभग 90 प्रतिशत वोट उन पार्टियों को मिले हैं जिन्हें ज़ायनिस्ट राजनीतिक धारा का हिस्सा माना जाता है। इन पार्टियों के बीच अंतर मुख्यतः फिलस्तीनियों के प्रति उनके दृष्टिकोण और नीतियों की तीव्रता का है। एक तरफ ऐसी राजनीतिक शक्तियां हैं जो फिलस्तीनियों के पूर्ण विनाश की बात करती हैं, जबकि दूसरी तरफ वे ताकतें हैं जो उन्हें उनकी जमीन से विस्थापित करने की समर्थक हैं। इस राजनीतिक परिदृश्य में फिलस्तीनी अधिकारों, समान नागरिकता और क्षेत्रीय शांति के लिए वास्तविक प्रतिबद्धता रखने वाली शक्तियां बेहद कमजोर दिखाई देती हैं।

इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू इजरायल की सेंटर-लेफ्ट और लेफ्ट राजनीति का सीमित जनाधार है। प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, सेंटर-लेफ्ट यानी डेमोक्रेट्स को लगभग 6.4% प्रतिशत समर्थन मिला, जबकि अरब-इजरायली नागरिकों के साथ समानता और सहअस्तित्व की बात करने वाली वामपंथी राजनीति का समर्थन लगभग 0.9 % तक सीमित रहा। यह अंतर इजरायल की राजनीतिक व्यवस्था में मौजूद वैचारिक सीमाओं को रेखांकित करता है। यहां राजनीतिक बहस का केंद्र फिलस्तीनियों के साथ समानता, उनके राजनीतिक अधिकार और स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं, बल्कि इजरायली राज्य की मौजूदा संरचना और सुरक्षा संबंधी प्राथमिकताएं बनी हुई हैं।
Photo Credit: Times of Israel


इस परिस्थिति में केवल सरकार बदल जाने से इजरायल की फिलस्तीन नीति या पश्चिम एशिया की राजनीति में बुनियादी परिवर्तन की उम्मीद करना कठिन है। चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी राजनीतिक विचारधारा को व्यापक चुनौती मिली है। विपक्षी राजनीति के महत्वपूर्ण हिस्से भी फिलस्तीनियों के स्वतंत्र राज्य और अरब राजनीतिक दलों के साथ सत्ता साझा करने के प्रश्न पर स्पष्ट रूप से उदार रुख नहीं अपनाते। इसलिए नेतन्याहू के विकल्प के रूप में सामने आने वाली राजनीति को अपने आप शांति की राजनीति मान लेना उचित नहीं होगा।

इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण अरब पार्टियों के साथ गठबंधन बनाने को लेकर इजरायली राजनीतिक दलों की हिचकिचाहट है। अरब नागरिक इजरायल की आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उन्हें मतदान का अधिकार प्राप्त है। इसके बावजूद मुख्यधारा के राजनीतिक दल उनके समर्थन से सरकार बनाने को लेकर आशंकित रहते हैं। इसकी एक वजह यह डर है कि अरब पार्टियों का सहयोग लेने से उनके यहूदी मतदाता नाराज हो सकते हैं। इस तरह लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकता और मतदान का अधिकार तो मौजूद है, लेकिन उस अधिकार को सत्ता की साझेदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदलने की संभावनाएं सीमित दिखाई देती हैं।

फिलस्तीनी मूल के उन लोगों का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है जिन्हें इजरायल की नागरिकता प्राप्त है। कुल फिलस्तीनी आबादी के लगभग दस प्रतिशत हिस्से को इजरायली नागरिकता और मतदान का अधिकार मिला हुआ है। लेकिन उनकी राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व को लेकर भी इजरायली राजनीति में असहजता बनी रहती है। इस स्थिति में सवाल केवल चुनावी प्रतिनिधित्व का नहीं, बल्कि इस बात का है कि इजरायल की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अरब नागरिकों को वास्तविक राजनीतिक बराबरी किस सीमा तक स्वीकार्य है।

चुनाव के बाद नेतन्याहू फिलहाल कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने हुए हैं। 27 अक्टूबर के चुनाव के बाद कोई भी राजनीतिक गठबंधन 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों का स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर सका। रॉयटर्स की 29 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, नेतन्याहू के गठबंधन के पास 53 सीटें थीं और विपक्षी दलों के सामने भी सरकार बनाने की चुनौती थी। गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाली विपक्षी राजनीति को सरकार बनाने के लिए अरब पार्टियों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन ऐसा गठबंधन बनाने को लेकर राजनीतिक प्रतिरोध मौजूद है। इस प्रकार चुनाव के बाद पैदा हुआ गतिरोध केवल सीटों की संख्या का मामला नहीं, बल्कि इजरायल की राजनीतिक व्यवस्था में अरब दलों की स्वीकार्यता से भी जुड़ा है।

इसी राजनीतिक अस्थिरता के बीच ईरान के साथ सैन्य टकराव का प्रश्न फिर महत्वपूर्ण हो गया है। चुनाव परिणामों के बाद नेतन्याहू के पास कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में सैन्य कार्रवाई करने की क्षमता बनी हुई है। फाइनेंशियल टाइम्स की 29 अक्टूबर की रिपोर्ट में इजरायली सुरक्षा विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया कि चुनाव के बाद भी नेतन्याहू ईरान पर नए हमले का आदेश दे सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका की मंजूरी और सहयोग इस तरह की कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण होगा। ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य अभियान और उसके जवाब में होने वाली कार्रवाई क्षेत्रीय संघर्ष को फिर व्यापक बना सकती है।

इस राजनीतिक और सैन्य परिस्थिति में एक आशंका यह भी है कि ईरान के साथ नया टकराव इजरायल के भीतर पैदा हुए राजनीतिक ध्रुवीकरण को बदल सकता है। यदि ईरान जवाबी कार्रवाई करता है और सैन्य संघर्ष फिर शुरू होता है, तो सुरक्षा और राष्ट्रवाद के मुद्दे घरेलू राजनीति के केंद्र में आ सकते हैं। इससे आइजेनकोट के नेतृत्व वाले गठबंधन के सामने भी नई चुनौतियां पैदा हो सकती हैं, गठबंधन टूट सकता है और नेतनयाहू बहुमत जुटा सकता है।

Photo Credit: CBC News


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पश्चिम एशिया नीति को भी इस संदर्भ में देखना जरूरी है। ट्रंप की प्राथमिकता इस क्षेत्र में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करना नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों के अनुकूल सरकारों तथा नेतृत्व का समर्थन करना है। कुशनर की निवेश कंपनी एफिनिटी पार्टनर्स और पश्चिम एशिया में उसके निवेश को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं। अक्टूबर 2026 में सीएनएन की एक जांच रिपोर्ट में इजरायली कंपनियों में कुशनर की निवेश संबंधी हिस्सेदारी और उनके मध्यस्थ की राजनीतिक भूमिका के बीच संभावित हितों के टकराव का उल्लेख किया गया था। ट्रम्प अपने और अपनों के निवेश को सुरक्षित रखने के लिए नेतन्याहू को इजरायल की गद्दी पर बैठे देखना चाहेंगे।

आगामी 4 नवंबर की तारीख भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। अमेरिका में मध्यावधि चुनावों के आसपास पश्चिम एशिया की सैन्य और राजनीतिक परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं, यह मिड टर्म चुनावों के परिणाम से भी तय होगा। फिलहाल अमरीका ईरान पर छिटपुट बमबारी कर रहा है और ईरानी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा है, जबकि इसी बीच वांस के ईरान से संपर्क और डिप्लोमेटिक कोशिशों की खबरें भी आ रही हैं।

ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने भी अपने नागरिकों के लिए क्षेत्रीय संघर्ष से संबंधित सुरक्षा संबंधी निर्देश जारी किए हैं। उनकी आधिकारिक सलाहों में संभावित सैन्य तनाव, हवाई मार्गों के बंद होने, उड़ानों में व्यवधान और आवश्यक खाद्य सामग्री, पानी तथा दवाओं की उपलब्धता को लेकर सावधानी बरतने की बात कही गई है। ज़ाहिर है कि युद्ध की आशंका टली नहीं है।

इस पूरे घटनाक्रम को देखते हुए इजरायल के चुनाव परिणामों को केवल नेतन्याहू की जीत या हार के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या इजरायली राजनीति में फिलस्तीनियों के अधिकार, अरब नागरिकों की बराबरी और क्षेत्रीय शांति के लिए कोई मजबूत राजनीतिक आधार मौजूद है। चुनाव के बाद की परिस्थितियां फिलहाल ऐसी उम्मीद पैदा नहीं करतीं। सत्ता का चेहरा बदल सकता है, गठबंधन टूट सकते हैं और नए गठबंधन बन सकते हैं, लेकिन जब तक राजनीतिक व्यवस्था में फिलस्तीनियों के अधिकार और समानता का प्रश्न केंद्रीय स्थान नहीं पाता, तब तक सरकार बदलने को शांति की दिशा में निर्णायक परिवर्तन मानना कठिन होगा।

Ashok Kumar Pandey

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Ashok Kumar Pandey is the Managing Editor of The Credible News.