ग्रेटर नोएडा PNB शाखा में करोड़ों की हेराफेरी के पीछे क्या है?
ऐच्छर गांव की शाखा के खाताधारकों ने एफडी और बचत खातों से रकम गायब होने की शिकायत की है। कुल प्रभावित रकम की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई।
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा स्थित पंजाब नेशनल बैंक (PNB) की ऐच्छर गांव शाखा में खाताधारकों की जमा रकम में कथित हेराफेरी का मामला बैंकिंग व्यवस्था में आंतरिक नियंत्रण, ग्राहकों की वित्तीय सुरक्षा और जवाबदेही से जुड़े गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
27 अक्टूबर 2026 को सामने आए इस मामले में शुरुआती शिकायतों के आधार पर लगभग 35 करोड़ रुपये की रकम प्रभावित होने का अनुमान लगाया गया। बैंक ने शाखा प्रबंधक सहित पांच कर्मचारियों को निलंबित कर विभागीय जांच शुरू की। 29 अक्टूबर तक प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, शिकायतकर्ताओं की संख्या बढ़कर 25 हो गई थी और पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच आगे बढ़ाई थी। हालांकि, कुल प्रभावित राशि और सभी संदिग्ध लेनदेन का आधिकारिक रूप से अंतिम निर्धारण अभी नहीं हुआ था।

इस मामले में खाताधारकों का आरोप है कि उनकी जानकारी और सहमति के बिना सावधि जमा (फिक्स्ड डिपॉजिट या FD) समय से पहले बंद कर दी गईं तथा रकम दूसरे खातों में स्थानांतरित कर दी गई। कुछ ग्राहकों ने बचत खातों में जमा रकम कम होने या पूरी तरह गायब दिखाई देने की शिकायत भी की। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, प्रभावित लोगों में ऐच्छर, बिरौंडा, विरौंडी चक्रसेनपुर और आसपास के क्षेत्रों के किसान तथा अन्य खाताधारक शामिल हैं। कुछ परिवारों के लिए यह रकम जमीन अधिग्रहण के बदले मिले मुआवजे से संबंधित थी। इसलिए विवाद केवल बैंक खातों में दिखाई देने वाले शेष का नहीं, बल्कि उन बचतों का भी है जिन पर परिवारों की भविष्य की आर्थिक सुरक्षा निर्भर हो सकती है।
मामला तब सामने आया जब ऐच्छर निवासी ट्रांसपोर्टर विनीत भाटी ने अपने खाते से संबंधित लेनदेन की जानकारी लेने के लिए बैंक का रुख किया। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, भाटी ने आरोप लगाया कि म्यूचुअल फंड में निवेश के सिलसिले में बैंक कर्मचारियों के कहने पर उन्होंने चेक और अन्य दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे। उनका दावा है कि 25 लाख रुपये उनके बचत खाते में आने के बजाय ऐसे दूसरे खाते में स्थानांतरित कर दिए गए, जिसका नाम उनके नाम से मिलता था, लेकिन वह उनका वास्तविक खाता नहीं था। उन्होंने पुलिस से रकम वापस दिलाने और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की जांच करने की मांग की।

यह शिकायत जांच के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह पता लगाने की आवश्यकता सामने आती है कि लेनदेन किस प्रक्रिया से अधिकृत हुआ और धनराशि किस खाते में पहुंची।
अन्य खाताधारकों ने भी बड़ी रकम के गायब होने की शिकायत की है। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, एक किसान विजेंद्र सिंह ने बताया कि उनके बचत खाते में पहले लगभग 87 से 88 लाख रुपये थे, लेकिन बाद में उसमें केवल एक लाख रुपये दिखाई दिए। एक अन्य खाताधारक हनीफ खान ने दावा किया कि उनके खाते में पहले लगभग 39 लाख रुपये थे, लेकिन बाद में यह रकम दिखाई नहीं दी। उन्होंने कहा कि उन्होंने न तो धनराशि स्थानांतरित करने की अनुमति दी थी और न ही इस संबंध में कोई संदेश प्राप्त किया था। अन्य ग्राहकों ने भी कथित अनधिकृत लेनदेन और समय से पहले FD बंद किए जाने की शिकायत की। ये व्यक्तिगत बयान हैं; संबंधित बैंक अभिलेखों और लेनदेन विवरणों की जांच से ही इनके तथ्यात्मक पक्ष की पुष्टि हो सकेगी।
शिकायतों के सामने आने के बाद बैंक ने संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की और आंतरिक जांच शुरू की। 29 अक्टूबर को प्रकाशित हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, शाखा के सभी कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बैंक के दिल्ली स्थित मुख्यालय ने स्थानांतरित रकम को रोक दिया था और उसे ग्राहकों को वापस करने की बात कही गई थी। इसी रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने शिकायतकर्ताओं की संख्या बढ़ने के बाद जांच का दायरा विस्तृत किया और भ्रष्टाचार निरोधक इकाई भी जांच में शामिल हुई। हालांकि, रकम रोक दिए जाने और उसके वास्तव में ग्राहकों के खातों में लौटाए जाने के बीच अंतर है। अंतिम स्थिति की पुष्टि बैंक के आधिकारिक विवरण और संबंधित खातों में रकम जमा होने के प्रमाण से ही होगी।
शुरुआती मीडिया रिपोर्टों में लगभग 35 करोड़ रुपये प्रभावित होने की बात कही गई। दूसरी ओर, भारतीय किसान यूनियन (कृषक) ने कथित गबन की राशि 130 से 150 करोड़ रुपये तक होने का आरोप लगाया।
इस प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू बैंकिंग व्यवस्था के आंतरिक नियंत्रण से संबंधित है। किसी FD को समय से पहले बंद करने, उसके परिपक्वता मूल्य को स्थानांतरित करने या बचत खाते से बड़ी रकम निकालने की प्रक्रिया में ग्राहक की पहचान, प्राधिकरण और लेनदेन का सत्यापन महत्वपूर्ण होता है। यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि कर्मचारियों ने आवश्यक अनुमति के बिना रकम स्थानांतरित की, तो यह केवल व्यक्तिगत स्तर पर अनियमितता का प्रश्न नहीं रहेगा। तब यह भी जांचना होगा कि बैंक की निगरानी व्यवस्था, लेनदेन संबंधी चेतावनियां, ऑडिट और शिकायत निवारण प्रणाली संदिग्ध गतिविधियों को समय रहते पहचानने में क्यों सफल नहीं हुईं।

भारतीय रिजर्व बैंक के अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन संबंधी निर्देशों में ग्राहक की देयता और बैंक की जिम्मेदारी निर्धारित करने के प्रावधान हैं। हालांकि, ऐच्छर शाखा में पैसे की हेराफेरी किस तरीके से हुई, यह स्पष्ट होने के बाद ही तय किया जा सकेगा कि इन नियमों को इस मामले में लागू किया जा सकता है या नहीं।
फिलहाल इस मामले में तीन जरूरी सवाल हैं:
1- खाताधारकों की रकम किन परिस्थितियों में स्थानांतरित हुई?
2- वास्तविक वित्तीय नुकसान कितना है? और
3- जिम्मेदारी किन व्यक्तियों या संस्थागत प्रक्रियाओं की बनती है।
बैंक द्वारा कर्मचारियों का निलंबन और पुलिस की जांच प्रारंभिक कदम हैं, लेकिन ग्राहकों की वित्तीय सुरक्षा के लिए पारदर्शी जांच, समयबद्ध कार्रवाई और पात्र खाताधारकों की रकम की वापसी आवश्यक है। यह घटना बैंकिंग सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करती है और बैंकों के अंदर व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार की ओर साफ़ इशारा करती है।
