सरकार का दबाव या नुकसान का डर: दिल्ली के व्यापारियों ने क्यों की राहुल गांधी से रैली रोकने की मांग?
क्या दिल्ली के इन व्यापारियों को तानाशाही पसंद है?
दिल्ली के व्यापारियों द्वारा राहुल गांधी से अपील की गई कि रामलीला मैदान में पहली नवंबर को होने वाली रैली स्थगित कर दी जाए और उसे 10 नवंबर के बाद आयोजित किया जाए, क्योंकि इस समय दिवाली के त्योहार का माहौल है और इसलिए उन्हें व्यापार में नुकसान होगा। आधुनिक अर्थशास्त्र के जनक माने जाने वाले एडम स्मिथ ने 1776 में एक पुस्तक लिखी थी। उसका नाम था ‘वेल्थ ऑफ नेशन्स’। उसमें कहा गया है कि “एक ही व्यवसाय से जुड़े लोग शायद ही कभी एकत्र होते हैं, भले ही वे आनंद-प्रमोद या मनोरंजन के लिए ही क्यों न मिलें, लेकिन उनकी बातचीत का अंत आम जनता के विरुद्ध किसी षड्यंत्र में या कीमतें बढ़ाने की कोई तरकीब निकालने में ही होता है।” व्यापारियों द्वारा आम जनता के विरुद्ध षड्यंत्र रचे जाने की बात एडम स्मिथ ने कही थी। वह इस समय दिल्ली में साकार होती दिखाई दे रही है।
व्यापारी और उद्योगपति मिलावट करते हैं और कीमतें बढ़ाते हैं तथा इस तरह उपभोक्ताओं को लूटते हैं, यह तो जानी-मानी बात है, लेकिन व्यापारी लोकतंत्र-विरोधी षड्यंत्र भी करते हैं, यह भी अब जानी-मानी बात बन गई है। वे कहते हैं कि यदि पहली नवंबर को रामलीला मैदान में रैली होगी तो उससे उन्हें व्यापार में नुकसान होगा। रामलीला मैदान में अन्ना हजारे का आंदोलन 2013 में तेरह दिनों तक चला था तब क्या उनका व्यापार ठप नहीं हो गया था और उन्हें नुकसान नहीं हुआ था? वह भी शादियों का मौसम था और व्यापार खूब फलने-फूलने के ही दिन थे। राहुल गांधी की रैली तो केवल एक दिन के लिए है!

इसका अर्थ यह है कि दिल्ली के व्यापारी मोदी-शाह की सरकार के दबाव में आकर राहुल गांधी से रामलीला मैदान की रैली स्थगित करने की अपील करने गए थे। ‘दिल्ली बंद’ का ऐलान नहीं किया गया है कि जिससे व्यापार बंद हो जाए। व्यापार तो चालू ही रहने वाला है। सवाल यह है कि 2016 में नोटबंदी की गई थी, तब क्या उनका व्यापार ठप नहीं हो गया था? जब पहली जुलाई 2017 से GST का अंधाधुंध अमल शुरू किया गया था, तब क्या उनका व्यापार महीनों तक ठप नहीं हो गया था? तब उन्होंने मोदी सरकार के समक्ष नोटबंदी या GST का अमल स्थगित करने की मांग क्यों नहीं की थी? क्या इसलिए कि वे डर गए थे? क्या उन्हें यह डर था कि उन्हें देशद्रोही और अर्बन नक्सल या टुकड़े-टुकड़े गैंग कहा जाएगा और परेशान किया जाएगा?
सबसे बड़ी बात यह है कि क्या व्यापारी मतदान नहीं करते? उन्हें मताधिकार तो होगा ही। तो उन करोड़ों भारतीय नागरिकों का क्या, जिन्होंने मतदाता के रूप में अपना मताधिकार चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया के तहत खो दिया है? उनकी चिंता वे क्यों नहीं करते? मताधिकार लोकतंत्र का प्राण है। भारत 26 जनवरी 1950 को एक गणराज्य बना, तब से उसने बिना किसी प्रकार के भेदभाव के प्रत्येक नागरिक को मताधिकार प्रदान किया है। यदि मताधिकार ही छीन लिया जाए तो लोकतंत्र नहीं रहता। क्या व्यापारियों को यह मालूम नहीं है कि रामलीला मैदान की रैली मताधिकार बचाने की रैली है? क्या इन व्यापारियों को तानाशाही पसंद है?
ऐसा लगता है कि दिल्ली के व्यापारियों को भारत के लोकतंत्र की चिंता नहीं है। उन्हें तो केवल अपने व्यापार और अपने मुनाफे की कमाई की ही चिंता है। हालांकि, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जिन व्यापारियों ने राहुल गांधी से रामलीला मैदान की रैली स्थगित करने का अनुरोध किया है, वे तुलनात्मक रूप से बड़े व्यापारी हैं। वे आम तौर पर छोटे व्यापारियों की भी चिंता नहीं करते। जो लोग उद्योगपति और व्यापारी हैं, उन्हें अधिकांशतः लोकतंत्र की चिंता होती ही नहीं है। उनका मुख्य उद्देश्य मुनाफा होता है। शासन कोई भी करे और चाहे जिस तरह से करे, इसकी वे चिंता कभी नहीं करते।

मूल सवाल तो यह है कि व्यापारी नरेंद्र मोदी और अमित शाह से डर रहे हैं। जिस तरह पिछले 12 वर्षों से शासन चला है, उसमें भय का माहौल पैदा किया गया है। ED, CBI और IT के जरिए छापे डलवाकर तथा जेल का भय दिखाकर डर का यह माहौल पैदा किया गया है और इसीलिए व्यापारियों को ऐसा लगता हो सकता है कि यदि वे राहुल गांधी से अपील करेंगे तो उन्हें सरकार की सद्भावना प्राप्त होगी। वे सरकार की गुड बुक में आना चाहते हैं। यह भी संभव है कि सरकार ने ही चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) से कहा हो कि वे ऐसी अपील करें और उसके बाद यह अपील की गई हो। यह भी हो सकता है कि CTI के अध्यक्ष बृजेश गोयल को डराया गया हो या फिर कोई लालच दिया गया हो।
उनका कहना है कि रामलीला मैदान के आसपास लगभग 24 थोक बाजार हैं और उनका एक दिन का 10,000 करोड़ रुपये का कारोबार ठप हो जाएगा। उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत है कि देश के स्वतंत्रता आंदोलन में घनश्यामदास बिड़ला और जमनालाल बजाज जैसे बड़े उद्योगपतियों ने महात्मा गांधी का साथ दिया था। अंततः गांधी की हत्या भी घनश्यामदास बिड़ला के भवन में ही हुई थी। वे अंग्रेजों से डरते नहीं थे। फिक्की, एसोचैम और सीआईआई जैसे राष्ट्रीय स्तर के व्यापारिक संगठनों या राज्य स्तर के व्यापारिक संगठनों ने पिछले बारह वर्षों में मोदी सरकार का जिस तरह लोकतंत्र-विरोधी शासन चला है, उसके खिलाफ कभी आवाज नहीं उठाई है। उनका एक ही नारा है: ‘सोचा नहीं अच्छा बुरा, मांगा मुनाफे के सिवा कुछ भी नहीं।’
Pro. Hemantkumar Shah
प्रो शाह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और गुजरात में लंबे समय तक अध्यापन के बाद लेखन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।
