Politics

पंजाब में सवाल सिर्फ एक हत्या का नहीं, राज्य के भविष्य का है

Jagdeep Singh Sindhu Jagdeep Singh Sindhu | 1h ago · 7 min read
पंजाब में सवाल सिर्फ एक हत्या का नहीं, राज्य के भविष्य का है

एक सप्ताह के बाद भी परविंदर सिंह झोटा का अंतिम संस्कार नहीं हुआ है

परविंदर सिंह उर्फ झोटा की हत्या केवल कानून-व्यवस्था की घटना नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा, नशे के विरुद्ध सरकारी कार्रवाई और सत्ता की नैतिक जवाबदेही की परीक्षा है। पंजाब में 'कट्टर ईमानदार' सरकार के बुत की परछाईयों की कड़वी सचाई इस मौत के बाद धरातल पर सवाल लिए खड़ी है और सरकार वास्तविकता से पलायन को रणनीति मान रही है।

नशे के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले नागरिक की सुरक्षा कौन करेगा?

https://www.etvbharat.com/hi/bharat/special-police-awareness-campaign-to-protect-youth-and-students-from-harmful-effects-of-drug-abuse-in-ranchi-jhn26062002950


सरकार के राजनीतिक दावों और प्रचार 'युद्ध नशेयां विरुद्ध' के विपरीत जब सामान्य नागरिक अपने समाज में पहल करते हैं तो नीतियों की पोल स्वयं ही खुलती है।

पंजाब के मानसा में नशे के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले परविंदर सिंह उर्फ झोटा की हत्या ने एक बार फिर राज्य की कानून-व्यवस्था और सरकार की नैतिक जिम्मेदारी को कठघरे में खड़ा कर दिया है। 13 अक्टूबर 2026 को हुई इस घटना के बाद प्रदेश में आक्रोश फैल गया। झोटा की हत्या के मामले में पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया, जबकि सरकार ने दोषियों को कठोर सजा दिलाने का भरोसा दिया। लेकिन सवाल केवल अपराधी की गिरफ्तारी का नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि नशे के कारोबार के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाला व्यक्ति आखिर अपनी सुरक्षा को लेकर इतना असहाय क्यों था? स्थानीय प्रशासन का उपेक्षापूर्ण रवैया किन कारणों से प्रभावित रहा। क्या कोई अप्रत्यक्ष संगठित संरक्षण व्यवस्था समानांतर तौर पर काम कर रही है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों की सुरक्षा सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है। जब कोई नागरिक किसी सामाजिक बुराई के विरुद्ध आवाज़ उठाता है, तो राज्य की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि उसकी शिकायत सुनी जाए, आरोपों की निष्पक्ष जाँच हो और कानून के दायरे में समय रहते कार्रवाई की जाए। यदि ऐसे नागरिक की हत्या हो जाती है, तो केवल गिरफ्तारी और सजा का आश्वासन पर्याप्त नहीं रह जाता। यह भी जानना आवश्यक हो जाता है कि प्रशासन ने पहले क्या किया, क्या नहीं किया और क्या किसी स्तर पर गंभीर चूक हुई और कियूं हुयी ।

नशामुक्त पंजाब के दावे और जमीन की हकीकत

पंजाब में नशे का प्रश्न वर्षों से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विमर्श का केंद्र रहा है। सरकारें नशे के विरुद्ध अभियान चलाने, तस्करों पर कार्रवाई करने और युवाओं को इस संकट से बाहर निकालने के संकल्प दोहराती रही हैं। ऐसे में झोटा की हत्या सरकार के सामने एक तीखा प्रश्न रखती है कि क्या नशे के विरुद्ध कार्रवाई का आकलन केवल गिरफ्तारियों, बरामदगी और प्रचार अभियानों से किया जाएगा, या इस बात से भी कि नशे के खिलाफ बोलने वाले नागरिक कितने सुरक्षित हैं और क्यूँ सरकार उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित नहीं कर पाती ?

किसी एक हत्या ने पूरे राज्य की नशा-नीति की विफलता को जिस तरह उजागर किया है उसने सरकार की नैतिकता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटना उन संस्थागत व्यवस्थाओं की गंभीर समीक्षा अवश्य माँगती है, जिनका उद्देश्य नागरिकों की सुरक्षा और अवैध कारोबार पर नियंत्रण होना चाहिए। नशे के अवैध कारोबार की स्थिति पंजाब में कितनी गंभीर है इसकी जानकारी सरकार को न हो ऐसा तो है नहीं।

यदि किसी व्यक्ति ने नशीले पदार्थों की कथित बिक्री के बारे में शिकायत की थी, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि शिकायत कहाँ की गई, प्रशासन ने क्या प्रतिक्रिया दी और संबंधित अधिकारियों ने अपने दायित्वों का निर्वहन किया या कियूं नहीं किया । इन प्रश्नों के उत्तर ठोस कार्यवाही तथ्यों और स्वतंत्र जांच से मिलने चाहिए, ना कि राजनीतिक दावों से ।

सरकार की नैतिक जवाबदेही कहाँ से शुरू होती है?

https://www.newindianexpress.com/india/2026/Oct/15/punjab-anti-drug-activists-killing-markets-schools-shut-mansa-sho-suspended


मुख्यमंत्री और सरकार की नैतिक जिम्मेदारी केवल इस बात से निर्धारित नहीं होती कि अपराध के बाद कितनी जल्दी बयान दिया गया। उसका आकलन इस आधार पर भी होता है कि प्रशासन नागरिकों की सुरक्षा के लिए कितना सक्षम है, शिकायतों पर कितनी तत्परता से कार्रवाई करता है और चूक सामने आने पर कितनी पारदर्शिता दिखाता है और किस प्रकार नया सुनिश्चित करता है।

झोटा हत्याकांड के बाद पुलिस अधिकारी के निलंबन और केंद्र की भा ज पा सरकार द्वारा विस्तृत रिपोर्ट माँगे जाने की खबरें सामने आई हैं। रज्य सरकार के कदम प्रशासनिक जवाबदेही की दिशा में लीपापोती भी हो सकते हैं क्योंकि इनकी वास्तविकता इस बात से तय होगी कि जांच कितनी निष्पक्ष होती है, जिम्मेदारी कहाँ तक निर्धारित होती है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या बदलाव किए जाते हैं। हाल ही में वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा के विधानसभा क्षेत्र के तूर बंजारा गांव में गुलजार की आत्महत्या के मामले ने सरकार की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा किया है।

मुख्यमंत्री को इन सवालों का स्पष्ट उत्तर देना चाहिए कि क्या झोटा या उनके साथियों ने पहले किसी खतरे या अवैध गतिविधि की शिकायत की थी? यदि शिकायत की गई थी, तो संबंधित पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की? क्या किसी अधिकारी की लापरवाही, निष्क्रियता या अनुचित संरक्षण की भूमिका सामने आई है? नशे के कारोबार के विरुद्ध शिकायत करने वाले नागरिकों की सुरक्षा के लिए कौन-सी ठोस व्यवस्था है? सरकार इस घटना की जाँच और जवाबदेही की सार्वजनिक निगरानी कैसे सुनिश्चित करेगी?

यह लोकतांत्रिक जवाबदेही की सामान्य और आवश्यक प्रक्रिया है जिसका पालन करने में मुख्यमंत्री भगवंत मान और पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल के साथ साथ पुरे प्रशासन का दायित्व है ।

विपक्ष के आरोप और सरकार की जिम्मेदारी

परगट सिंह के फेसबुक पेज से


घटना के बाद विपक्षी दलों ने भगवंत मान सरकार पर कानून-व्यवस्था में विफलता के आरोप लगाए और मुख्यमंत्री की नैतिक जवाबदेही पर सवाल उठाए। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ने दोषियों को कठोर सजा दिलाने की बात कही है।

लेकिन इस मामले को केवल सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित करना झोटा की मृत्यु के सामाजिक अर्थ को छोटा कर देगा। यदि विपक्ष जवाबदेही की माँग करता है, तो उसे ठोस तथ्यों, निष्पक्ष जाँच के आधार पर सरकार को आलोचना का उत्तर पारदर्शी कार्रवाई और प्रमाणित परिणामों से देना चाहिए न की राजनीतिक प्रतिवाद और आरोप प्रत्यारोपों से।

नशे का संकट किसी एक सरकार या एक कार्यकाल तक सीमित नहीं रहा है। इसलिए इसकी जिम्मेदारी का मूल्यांकन भी व्यापक होना चाहिए। फिर भी वर्तमान सरकार अपने कार्यकाल में नागरिकों की सुरक्षा, पुलिस प्रशासन और नशा नियंत्रण की व्यवस्था के लिए जवाबदेह है। अतीत की विफलताएँ वर्तमान की जिम्मेदारी समाप्त नहीं करतीं।

नैतिकता का असली अर्थ

सरकार की नैतिकता का प्रश्न केवल मुख्यमंत्री के पद पर बने रहने या इस्तीफा देने की राजनीतिक माँग तक सीमित नहीं होना चाहिए। नैतिकता का वास्तविक अर्थ है—सत्य सामने लाना, जिम्मेदारी तय करना, पीड़ित परिवार को न्याय दिलाना और ऐसी व्यवस्था बनाना जिसमें नागरिक को अपनी सुरक्षा के लिए अकेले संघर्ष न करना पड़े।

यदि जाँच में गंभीर प्रशासनिक विफलता या जानबूझकर की गई लापरवाही सामने आती है, जैसा की परविंदर झोटा के पिता का आरोप है तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कानून और नियमों के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि सरकार अपनी संस्थागत जिम्मेदारी निभाने में विफल रही हो, तो उसे भी सार्वजनिक रूप से जवाब देना होगा। जवाबदेही का निर्धारण नारे से नहीं, प्रमाण और कार्रवाई से होना चाहिए।

झोटा की हत्या के बाद सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि न्याय की प्रक्रिया निष्पक्ष और विश्वसनीय हो। किसी भी व्यक्ति या समूह को कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। हिंसा के विरुद्ध न्याय की माँग भी कानून के रास्ते से ही पूरी होनी चाहिए।

सवाल केवल झोटा का नहीं, पंजाब के भविष्य का है

पंजाब का भविष्य उसके युवाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार से जुड़ा है। यदि नशे के विरुद्ध काम करने वाले नागरिक भयभीत हों, शिकायतकर्ता असुरक्षित महसूस करें और प्रशासन पर विश्वास कमजोर पड़े, तो नशे के खिलाफ किसी भी अभियान की सामाजिक विश्वसनीयता प्रभावित होगी।

झोटा की मृत्यु का न्याय केवल दोषियों को सजा मिलने से पूरा नहीं होगा। उसके साथ यह भी आवश्यक है कि नशे के विरुद्ध शिकायत करने वाले नागरिकों के लिए सुरक्षित और प्रभावी व्यवस्था बने, पुलिस की जवाबदेही सुनिश्चित हो और नशे की आपूर्ति के नेटवर्क पर तथ्य-आधारित कार्रवाई हो।

सरकार की नैतिकता की असली परीक्षा उसके दावों में नहीं, उस नागरिक की सुरक्षा में है जो अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाता है। झोटा की हत्या ने पंजाब के सामने यही सवाल रखा है। इसका उत्तर बयानबाजी से नहीं, न्याय, पारदर्शिता और ठोस संस्थागत सुधारों से देना होगा अन्यथा विफलताओं के परिणामों को स्वीकार करने के लिए राजनीतिक स्वार्थ से इतर नैतिकता की कसौटी पर खरा उतरना होगा।


Jagdeep Singh Sindhu

Jagdeep Singh Sindhu

वरिष्ठ पत्रकार और राजनैतिक विवेचक जगदीप सिंह सिंधू राष्ट्रीय हिंदी दैनिक हरिभूमि,पीपल्स समाचार,महाकौशल आदि में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं। वह एफ एम रेडियो तरंग 104 के पूर्व स्टेशन हेड तथा पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के राजनीतिक सलाहकार रहे हैं।