कौन बदलेगा पंजाब के हालात?
पंजाब के हालात किसी एक सरकार या एक चुनाव का नहीं, बल्कि लगातार हुई राजनीतिक असफलताओं का परिणाम है।
जब हर चुनाव उम्मीद लेकर आए और हर सरकार अधूरा वादा छोड़कर जाए, तब बर्बादी रहस्य नहीं रहती; वह राजनीतिक असफलताओं का हिसाब बन जाती है।'
पंजाब की कहानी आज किसी रहस्य या पहेली की कहानी नहीं है। यह उन फैसलों, वादों और चूकों की कहानी है, जो वर्षों तक दोहराई गईं। कभी हरित क्रांति का अग्रदूत रहा यह राज्य आज नशे, पलायन, कर्ज, औद्योगिक ठहराव और वित्तीय दबाव जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। इन समस्याओं को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखना आसान है, लेकिन इन्हें जोड़कर देखें तो एक असहज सच सामने आता है—
पंजाब के हालात किसी एक सरकार या एक चुनाव का परिणाम नहीं, बल्कि लगातार हुई राजनीतिक असफलताओं का परिणाम है।
पंजाब आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ राजनीतिक परिवर्तन कोई नई घटना नहीं रही। पिछले दो दशकों में मतदाताओं ने अलग-अलग दलों को सत्ता सौंपी—
शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी। हर बार जनता ने यह उम्मीद की कि नई सरकार पुरानी समस्याओं का समाधान करेगी। लेकिन नशा, बेरोज़गारी, कृषि संकट, पलायन, औद्योगिक ठहराव और वित्तीय दबाव जैसे प्रश्न लगातार बने रहे।
इसलिए मूल प्रश्न यह नहीं है कि अगली सरकार कौन बनाएगा। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या पंजाब की राजनीतिक असफलताओं का कोई वास्तविक विकल्प मौजूद है? या पंजाब केवल एक राजनीतिक प्रयोगशाला बन के रह जायेगा।
पंजाब की राजनीति का बदलता चक्र

पंजाब ने पिछले दो दशकों में सत्ता बदलने में कोई संकोच नहीं किया। 2002 में कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने सरकार बनी । 2007 में अकाली दल ने सरकार बनाई और 2012 फिर से सत्ता में लौटे। 2017 में कांग्रेस को जीत मिली। 2022 आम आदमी पार्टी को भारी बहुमत मिला। 2027 में फिर परिवर्तन की बहस। हर चुनाव में एक साझा तत्व दिखाई देता है कि मतदाता परिवर्तन चाहता है। लेकिन परिवर्तन और समाधान एक ही बात नहीं हैं। हर बार जनता ने यह भरोसा किया कि नई सरकार पुरानी समस्याओं का समाधान करेगी। लेकिन सवाल यह है कि अगर चेहरे बदलते रहे, समस्याएं नहीं बदलीं। सवाल यह नहीं है कि किसने क्या मुद्दा बनाया। सवाल यह है कि मुद्दा बनने के बावजूद समस्या क्यों बनी रही?
नशा: चुनावी मुद्दा, स्थायी समाधान नहीं
नशा पंजाब की राजनीति का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है। 2017 में कांग्रेस ने इसे प्रमुख मुद्दा बनाया। 2022 में AAP ने "युद्ध नशे विरुद्ध" अभियान चलाया। 2026 में भाजपा "नशा मुक्त पंजाब यात्रा" ले कर आई। सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी अध्ययन बताते हैं कि पदार्थ सेवन की समस्या व्यापक बनी हुई है। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या राजनीतिक दल नशे को समाधान के रूप में देख रहे हैं या चुनावी लाभ हानि के समीकरण के रूप में।

केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2021 में पंजाब में अंतरराष्ट्रीय सीमा के साथ सीमा सुरक्षा बल ( बीएसएफ ) के अधिकार क्षेत्र को 15 किमी से बढ़ाकर 50 किमी कर दिया था। बल को तलाशी लेने, गिरफ्तारियां करने और ड्रग्स या हथियारों जैसी अवैध वस्तुओं को जब्त करने का अधिकार प्राप्त है। जिसमें पंजाब के सीमावर्ती जिले पठानकोट, गुरदासपुर, अमृतसर, तरण तारण, फिरोजपुर फाजिल्का आदि जिले आते हैं लेकिन नशे पर लगाम नहीं लग पाई ।
दूसरी ओर मुख्यमंत्री भगवंत मान और AAP अपनी असफलताओं को ढकने के लिए यह तर्क दे रहे है कि नशे की समस्या की जड़ें पूर्ववर्ती शासन कालों तक जाती हैं जहाँ उत्पत्ति और पोषण को नियंत्रित नहीं किया गया। इससे स्पष्ट है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में नशा केवल सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का भी केंद्र बन गया है।
किसान राजनीति का नया चरण
तीन कृषि कानूनों के विरोध ने दिखाया कि राज्य की राजनीतिक चेतना आज भी जीवित है। पंजाब का समाज राजनीतिक रूप से अत्यंत सक्रिय है। लेकिन आंदोलन के बाद भी कृषि के मूल प्रश्न बने रहे। घटती लाभप्रदता, भूजल संकट, फसल विविधीकरण की चुनौती और ग्रामीण आय का दबाव यह बताता है कि विरोध आंदोलन और नीति सुधार अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं। आंदोलन ने एक नीति को चुनौती दी, लेकिन कृषि के व्यापक ढाँचे में बदलाव अभी भी अधूरा है।

राज्य में नयी कृषि नीति बनाने पर आम आदमी पार्टी ने बड़े वादे किये थे लेकिन पूरा कार्यकाल लगभग बीत जाने के बाद भी कृषि के उत्थान के लिए कोई ठोस नीति धरातल पर दिखाई देती नहीं। 2024 के राज्य में हुए किसान आंदोलन पर अरविन्द केजरीवाल ने किसानों को पंजाब व्यपार की प्रगति व्यवस्था में बाधा बता दिया था। पंजाब के व्यपारी वर्ग और किसान को आमने-सामने खड़ा कर दिया था। भारत और अमेरिका के बीच एक प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता पर पुनब भर के किसानों की चिंताओं के समाधान पर केंद्र की भाजपा सरकार कोई संतोषजनक हल दे नहीं पा रही। किसानों का डर है कि अमेरिका से सस्ते कृषि और डेयरी उत्पाद भारतीय बाजार में आएंगे। किसानों का मानना है कि इससे उनकी आय घटेगी और कृषि क्षेत्र को बड़ा नुकसान होगा। इस प्रस्तावित व्यापार समझौते के प्रभाव से राज्य की हितों को सुरक्षित रख पाने में भगवान मान सरकार भी असहाय दिखाई देती है।
युवाओं का पलायन
कभी पंजाब देश के युवाओं को अवसर देता था। आज पंजाब का सबसे बड़ा निर्यात उसके युवा बनते जा रहे हैं। आज पंजाब के अनेक परिवारों का सपना सरकारी नौकरी नहीं, बल्कि विदेश जाना बन चुका है। यह केवल आर्थिक निर्णय नहीं है; यह भविष्य के प्रति विश्वास का भी संकेत माना जाता है। यदि किसी राज्य की प्रतिभा लगातार बाहर जा रही हो, तो यह केवल रोजगार का नहीं, बल्कि विकास मॉडल का भी प्रश्न बन जाता है।
2022 के चुनावो में अकाली दल ने घोषणा की थी। युवाओं को विदेश में रोजगार के अवसर दिलाने और प्रवासन (migration) से जुड़ी प्रक्रियाओं को आसान बनाने के लिए राज्य में एक अलग अंतरराष्ट्रीय रोजगार मंत्रालय (International Employment Ministry) बनाने का वादा किया गया था। इससे पहले 2017 के चुनाव घोषणा पत्र में भी अकाली दल ने युवाओं और किसानों के विदेश जाने की चाहत को देखते हुए अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में जमीन खरीदकर वहां व्यावसायिक खेती और स्थायी निवास (PR) दिलाने में सहायता करने की घोषणा की थी।
आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल की और से विदेश में रोजगार चाहने वाले युवाओं की सहायता के लिए एक विशेष पंजाब ओवरसीज एम्प्लॉयमेंट कॉर्पोरेशन(Punjab Overseas Employment Corporation) स्थापित करने का वादा किया गया था। युवाओं को विदेशी नौकरियों के लिए सही सलाह और प्रशिक्षण (Training) देने के लिए 'फॉरेन एम्प्लॉयमेंट यूथ बोर्ड' के गठन की बात भी आम आदमी पार्टी द्वारा कही गई थी।

पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल ने विशेष रूप से घोषणा की थी कि यदि कोई भी अनुसूचित जाति (SC) का छात्र ग्रेजुएशन या पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए विदेश जाना चाहता है, तो उसकी पढ़ाई का पूरा खर्च सरकार उठाएगी। अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान ने यह भी साफ किया था कि उनका मुख्य लक्ष्य पंजाब में रोजगार के इतने अवसर पैदा करना है ताकि युवाओं को मजबूरी में विदेश (Brain Drain) न जाना पड़े। उन्होंने वादा किया था कि पंजाब की धरती पर ही उद्योग और 25 लाख नौकरियां दी जाएंगी ताकि बाहर गए युवा भी वापस लौट सकें। लेकिन क्या हासिल हुआ सवाल वही बना हुआ है।
उद्योग क्यों बाधित हुआ
मंडी गोबिंदगढ़ लुधियाना, जालंधर अमृतसर कभी पंजाब की औद्योगिक पहचान थे। आज भी उद्योग मौजूद हैं, लेकिन निवेश, प्रतिस्पर्धा और विस्तार की गति वैसी नहीं रही जैसी कभी थी। इसका कारण केवल एक सरकार नहीं हो सकती। बिजली, लॉजिस्टिक्स, नीति स्थिरता, कौशल विकास और निवेश वातावरण जैसे कई कारकों ने मिलकर यह स्थिति बनाई है। पंजाब में कानून व्यवस्था , अपराधियों और गैंगस्टरवाद के खौफ ने भी पंजाब के उद्योगों को नुकसान पंहुचाया है।

वर्ष 1981 में, पंजाब की प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक थी, और 2001 में यह चौथे स्थान पर थी। हालाँकि, तब से पंजाब की वृद्धि भारत की समग्र अर्थव्यवस्था की वृद्धि की तुलना में धीमी रही है। 2000 और 2010 के बीच की अवधि में, पंजाब की प्रति व्यक्ति जीडीपी में वृद्धि मणिपुर के बाद पूरे भारत में दूसरी सबसे धीमी थी ।
इसलिए, प्रति व्यक्ति आय के मामले में राज्य की रैंक 2026 में गिरकर 19वें स्थान पर आ गई। पाकिस्तान की सीमा से लगे उच्च जोखिम वाले राज्य के रूप में पंजाब की स्थिति के कारण भारतीय सरकार पंजाब में भारी उद्योग स्थापित करने से हिचकिचाती रही है।
क्या पंजाब केवल सरकार बदल रहा है
यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। सरकारें बदली , मुख्यमंत्री बदले , चुनावी वादे बदले नारे बदले राजनीतिक समझौते और गठबंधन बदले लेकिन क्या आर्थिक सामाजिक हालात बदले। क्या पलायन रुका क्या रोजगार और छोटे उद्योग बढे। यही अंतर राजनीतिक परिवर्तन और नीतिगत परिवर्तन के बीच का है।
पंजाब को किस प्रकार का विकल्प चाहिए
यदि पंजाब की चुनौतियाँ संरचनात्मक हैं, तो विकल्प भी संरचनात्मक होना चाहिए। कृषि के साथ उद्योग का संतुलन खाद्य प्रसंस्करण एमएसएमई विस्तार ग्रामीण उद्यमिता नशा उपचार और पुनर्वास मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ युवा कौशल विकास पुलिस और न्याय व्यवस्था का बेहतर समन्वय स्थानीय निकायों को अधिक अधिकार पारदर्शी शासन आदि सभी घटकों पर स्थाई नीति और सकारात्मक राजनीतिक दृष्टिकोण पंजाब की प्रगति निर्धारित कर सकता है।
पंजाब का संकट केवल राजनीतिक दलों का संकट नहीं है; यह शासन, अर्थव्यवस्था, समाज और पहचान का संयुक्त संकट है। पिछले वर्षों ने यह दिखाया है कि केवल सरकार बदलना अपने आप समाधान की गारंटी नहीं देता। वास्तविक विकल्प तब उभर सकता है जब चुनावी वादों से आगे बढ़कर रोजगार, कृषि सुधार, नशा नियंत्रण, शिक्षा, उद्योग और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को एक दीर्घकालिक नीति और वैकल्पिक व्यवस्था को ढाँचे में जोड़ा जाए।
2027 में पंजाब क्या एक राजनितिक बाढ़ में बहेगा या अपने अतीत को सहेजने में फिर से कामयाब होगा।
Jagdeep Singh Sindhu
वरिष्ठ पत्रकार और राजनैतिक विवेचक जगदीप सिंह सिंधू राष्ट्रीय हिंदी दैनिक हरिभूमि,पीपल्स समाचार,महाकौशल आदि में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं। वह एफ एम रेडियो तरंग 104 के पूर्व स्टेशन हेड तथा पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के राजनीतिक सलाहकार रहे हैं।