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पंजाब में शिरोमणि अकाली दल से गठबंध करना बीजेपी की मजबूरी, क्या होगा आगे रास्ता?

Jagdeep Singh Sindhu Jagdeep Singh Sindhu | 5h ago · 5 min read
पंजाब में शिरोमणि अकाली दल से गठबंध करना बीजेपी की मजबूरी, क्या होगा आगे रास्ता?

भाजपा के लिए पंजाब में अकेले चुनाव लड़ने की राजनीतिक सीमाएं हैं और इसी कारण अकाली दल के साथ गठबंधन का विकल्प उसके लिए महत्त्वपूर्ण बना हुआ है।

अमित शाह के पंजाब में एनडीए सरकार बनाने संबंधी बयान ने गठबंधन की अटकलों को फिर तेज़ किया, जबकि पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों और अन्य नेता सार्वजनिक रूप से सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कहते और दावा करते रहे हैं। पंजाब में भाजपा द्वारा हाल ही में निकाली गई ‘नशा मुक्त पंजाब’ यात्रा को कोई उत्साहजनक समर्थन मिलता दिखाई नहीं दिया और एक तरह से भाजपा को इसकी विफलता का अनुमान हो गया। प्रदेश में अपेक्षा के अनुरूप दूसरे दलों से बड़ी संख्या में दल-बदल कर आने वाले नेताओं की संख्या में लगे विराम ने भाजपा की चिंताओं को बढ़ा दिया है। अन्य राज्यों की तरह होने वाले परिवर्तन की गति पंजाब में दिखाई नहीं दे रही है।

भाजपा के लिए पंजाब में अकेले चुनाव लड़ने की राजनीतिक सीमाएं हैं और इसी कारण अकाली दल के साथ गठबंधन का विकल्प उसके लिए महत्त्वपूर्ण बना हुआ है। लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा की बढ़ी हुई वोट हिस्सेदारी के बावजूद नगर निकाय चुनावों में भाजपा पूरे पंजाब में कोई अप्रत्याशित जीत दर्ज नहीं कर सकी थी। यह वोट हिस्सेदारी विधानसभा सीटों में पर्याप्त रूप से परिवर्तित हो पाएगी या नहीं, इस बारे में अभी स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। 2024 में उसकी वोट हिस्सेदारी 2022 के विधानसभा चुनाव की तुलना में काफी अधिक थी। लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तुलना चुनावी राजनीति में सटीक नहीं होती, क्योंकि उम्मीदवार, मतदान के मुद्दे और मतदाताओं का व्यवहार अलग-अलग हो सकते हैं।

2022 के विधानसभा चुनाव में लगभग 6.6% वोट के साथ भाजपा केवल दो सीटें जीत पाई थी। उसका स्वतंत्र विधानसभा आधार अभी तक सीमित ही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में लगभग 18.6% वोट हासिल करने के बावजूद भाजपा 13 में से कोई सीट नहीं जीत पाई। वोट हिस्सेदारी बढ़ी, लेकिन उसका सीटों में रूपांतरण नहीं हुआ। भाजपा की असली समस्या वोट प्रतिशत से ज़्यादा राज्यव्यापी राजनीतिक स्वीकार्यता और वोटों को सीटों में बदलने की है।

गठबंधन की चुनावी उपयोगिता का आकलन करते समय 2024 के लोकसभा चुनाव के विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ों का उल्लेख किया जाता है। आंकड़ों के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 23 विधानसभा क्षेत्रों में आगे थी, जबकि अकाली दल नौ क्षेत्रों में आगे था। दोनों दलों की संयुक्त वोट हिस्सेदारी लगभग 32% थी। दोनों के एक साथ चुनाव लड़ने की स्थिति में 57 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त का आकलन प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन विधानसभा चुनावों में मतदाताओं की प्राथमिकताएं और दूसरे कारक अलग तरह से सामने आते हैं।

भाजपा का पारंपरिक आधार मुख्यतः शहरी क्षेत्रों में रहा है। भाजपा ने अपने स्तर पर सिख धार्मिक और सामाजिक आदर्शों को प्रतीकात्मक रूप से जोड़ने की कोशिश की है, लेकिन व्यापक स्तर पर स्वीकार्यता हासिल करने में वह अभी तक बहुत सफल नहीं हो पाई है। पुराने गठबंधन के अनुभव के आधार पर भाजपा समझती है कि अकाली दल की ग्रामीण क्षेत्रों, सिख धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं से जुड़े मतदाताओं और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति में ऐतिहासिक उपस्थिति रही है। गठबंधन दोनों दलों की भौगोलिक और सामाजिक पहुंच को जोड़ सकता है, हालांकि वोटों का पूरी तरह एक-दूसरे को हस्तांतरित होना निश्चित नहीं है।

भाजपा गठबंधन के लिए विवश है या नहीं, इसका सबसे अच्छा संकेत सीटों के बंटवारे से मिलेगा। यदि वह अकाली दल को पर्याप्त सीटें और नेतृत्व में सम्मानजनक भूमिका देने को तैयार होती है, तो यह गठबंधन की चुनावी ज़रूरत को दर्शाएगा। यदि वह सभी 117 सीटों पर लड़ने की तैयारी जारी रखते हुए अधिक सीटों और सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी की शर्त रखती है, तो यह संकेत होगा कि भाजपा अब पुराने सहयोगी के अधीन रहने के बजाय पंजाब में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक हैसियत स्थापित करना चाहती है।

अब शर्तें गठबंधन का सबसे संवेदनशील पहलू हैं। पुराने गठबंधन में अकाली दल वरिष्ठ सहयोगी था और भाजपा अपेक्षाकृत कम सीटों पर चुनाव लड़ती थी। अब भाजपा अपने 2024 के प्रदर्शन को आधार बनाकर अधिक सीटों की मांग कर सकती है। अगर भाजपा इस बार अपेक्षाकृत अधिक सीटें जीतने में कामयाब होती है, तो भविष्य में वह प्रदेश में नई राजनीतिक ताकत होने का दावा कर सकती है।

अकाली दल के साथ गठबंधन उसके लिए रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण हो सकता है। भाजपा वर्तमान परिस्थितियों में एक साथ कई लक्ष्य साधने के लिए भी गठबंधन कर सकती है। भाजपा का सबसे बड़ा लक्ष्य कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकना है। वर्तमान परिस्थितियों में कांग्रेस की अंतर्कलह पर विराम लगने के बाद नए अध्यक्ष परगट सिंह के नेतृत्व में पार्टी के प्रति बढ़ता रुझान भाजपा की गंभीर चिंता का विषय बन गया है। पंथक राजनीति के अन्य संभावित सहयोगी दलों- वारिस पंजाब दे (अमृतपाल गुट) और पुराने अकाली दल के बागी नेताओं के धड़े, अकाली दल पुनर-सुरजीत- का भी अभी तक पूरे प्रदेश में कोई खास प्रभाव नहीं बन पाया है। वे केवल कुछ क्षेत्रों तक सीमित होकर रह गए हैं।


अपने लक्ष्य साधने के लिए भाजपा गठबंधन की सरकार बनाने की रणनीति अपना सकती है। दूसरा लक्ष्य खुद को पूरे राज्य में विस्तार देना और अपने बढ़े हुए वोट शेयर को सीटों में परिवर्तित करना होगा। तीसरा लक्ष्य पंथक मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करना और अकाली दल की भूमिका को भविष्य के लिए सीमित करके अपनी राह आसान करना होगा।

दूसरी ओर, यदि अकाली दल अकेले चुनाव लड़ता है, तो उसे अपने सीमित चुनावी आधार, पंथक राजनीति में प्रतिस्पर्धा और 2022 के कमजोर प्रदर्शन से आगे निकलने की चुनौती होगी। प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक समीकरणों के तहत भाजपा अपनी रणनीति में सुविधानुसार परिवर्तन करने की दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।

Jagdeep Singh Sindhu

Jagdeep Singh Sindhu

वरिष्ठ पत्रकार और राजनैतिक विवेचक जगदीप सिंह सिंधू राष्ट्रीय हिंदी दैनिक हरिभूमि,पीपल्स समाचार,महाकौशल आदि में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं। वह एफ एम रेडियो तरंग 104 के पूर्व स्टेशन हेड तथा पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के राजनीतिक सलाहकार रहे हैं।