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अंकिता भण्डारी, इकरा हसन और रेखा आर्य से नेहा सिंह राठौर तक: महिला होने का दंश पीछा क्यों नहीं छोड़ता?

Dr. Chayanika Uniyal Dr. Chayanika Uniyal | 1h ago · 10 min read
अंकिता भण्डारी, इकरा हसन और रेखा आर्य  से नेहा सिंह राठौर तक: महिला होने का दंश पीछा क्यों नहीं छोड़ता?

एक आम लड़की से लेकर सांसद और कैबिनेट मंत्री तक: पितृसत्ता के सामने महिला की हैसियत क्यों छोटी पड़ जाती है?


अंकिता भंडारी, इकरा हसन, रेखा आर्य और नेहा सिंह राठौर के चार अलग-अलग प्रसंग बताते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, नियंत्रण और चरित्र हनन को केवल व्यक्तिगत घटनाओं के रूप में समझना क्यों पर्याप्त नहीं है। चार महिलाएँ। चार अलग-अलग सामाजिक हैसियत। चार अलग-अलग परिस्थितियाँ। लेकिन एक साझा सवाल—क्या महिला की आर्थिक स्वतंत्रता, राजनीतिक शक्ति और सार्वजनिक प्रतिष्ठा उसे पितृसत्तात्मक नियंत्रण से मुक्त कर पाती है?
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अंकिता भंडारी एक साधारण परिवार की कामकाजी युवती थीं। इकरा हसन भारतीय संसद में एक निर्वाचित सांसद हैं। रेखा आर्य उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। नेहा सिंह राठौर एक मुखर लोकगायिका और सोशल मीडिया की प्रभावशाली आवाज़ हैं। इन चारों महिलाओं की सामाजिक स्थिति में ज़मीन-आसमान का अंतर है। लेकिन इनके प्रसंगों को एक साथ पढ़ने पर महिला की स्वतंत्रता और सत्ता के बीच एक गहरा अंतर्विरोध सामने आता है।

समस्या केवल यह नहीं है कि महिलाओं के पास कितनी शक्ति है। समस्या यह भी है कि उनके आसपास मौजूद सामाजिक, राजनीतिक, पारिवारिक और संस्थागत शक्तियाँ उनकी स्वतंत्रता को कितना स्वीकार करती हैं। यहीं से ‘Smash the Patriarchy’ के नारे की प्रासंगिकता शुरू होती है।

1. अंकिता भंडारी: आर्थिक निर्भरता और सत्ता की असमानता

अंकिता भंडारी का मामला कार्यस्थल पर महिला की स्वतंत्रता और असमान शक्ति संबंधों की भयावह वास्तविकता सामने लाता है। 19 वर्षीय अंकिता नौकरी करके आत्मनिर्भर बनना चाहती थीं। सितंबर 2022 में उनकी हत्या कर दी गई। मई 2025 में तीन दोषियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई।

इस घटना का विश्लेषण केवल अपराध और सज़ा तक सीमित नहीं होना चाहिए। यहाँ महत्वपूर्ण सवाल है कि कार्यस्थल पर नियोक्ता और कर्मचारी के बीच शक्ति का असंतुलन किसी महिला की स्वतंत्र सहमति को किस तरह प्रभावित कर सकता है। जब किसी महिला की आजीविका, नौकरी और भविष्य उन लोगों के प्रभाव में हों जिनसे उसे उत्पीड़न का खतरा है, तब उसकी असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता भी दबाव में आ सकती है। अंकिता का प्रसंग इसी असमानता की ओर ध्यान खींचता है।

लेकिन यदि हम सोचें कि ऐसी परिस्थितियाँ केवल गरीब या आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं के सामने आती हैं, तो इकरा हसन का उदाहरण इस धारणा को चुनौती देता है।



2. इकरा हसन: आर्थिक कमजोरी नहीं, महिला की सार्वजनिक गरिमा भी निशाने पर


अंकिता के मामले में कार्यस्थल और आर्थिक असमानता महत्वपूर्ण थी। इकरा हसन के मामले में स्थिति बिल्कुल अलग है। इकरा किसी नियोक्ता पर निर्भर साधारण कर्मचारी नहीं, बल्कि जनता द्वारा निर्वाचित सांसद हैं। इसके बावजूद जुलाई 2025 में उन्हें निशाना बनाकर आपत्तिजनक डीपफेक वीडियो प्रसारित किए जाने की खबरें सामने आईं।

यहाँ पितृसत्तात्मक नियंत्रण का स्वरूप बदल जाता है। अंकिता के प्रसंग में महिला की शारीरिक स्वायत्तता और कार्यस्थल पर असहमति का प्रश्न प्रमुख था। इकरा के प्रसंग में महिला की डिजिटल छवि, सार्वजनिक गरिमा और राजनीतिक भागीदारी पर हमला सामने आता है।
दोनों घटनाओं के बीच विश्लेषणात्मक समानता यह है कि महिला की स्वतंत्र इच्छा और उसकी गरिमा को किसी अन्य व्यक्ति के नियंत्रण या दुरुपयोग का विषय बना दिया जाता है। अंतर यह है कि एक मामले में कार्यस्थल की शक्ति असमानता महत्वपूर्ण है, जबकि दूसरे में डिजिटल तकनीक महिला को अपमानित करने का माध्यम बनती है।

इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है। आर्थिक और राजनीतिक सशक्तीकरण महिलाओं के लिए आवश्यक हैं, लेकिन अपने आप में पर्याप्त नहीं। यदि संसद की सदस्य भी लैंगिक अपमान का निशाना बन सकती हैं, तो स्पष्ट है कि समस्या केवल महिलाओं की व्यक्तिगत कमजोरी या आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं है।

लेकिन क्या सार्वजनिक पद और राजनीतिक शक्ति प्राप्त कर लेने के बाद महिला निजी जीवन में पूरी तरह स्वतंत्र हो जाती है? रेखा आर्य से जुड़ा प्रसंग इसी प्रश्न को सामने लाता है।

रेखा गुप्ता के फेसबुक पेज से


3. रेखा आर्य: सार्वजनिक सत्ता और निजी जीवन की असमानता


रेखा आर्य उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।अक्टूबर 2026 में उनके द्वारा पति के विरुद्ध शारीरिक हिंसा, धमकी और अन्य गंभीर आरोपों की शिकायत दर्ज कराने की खबरें सामने आईं। आरोपों से उनके पति ने इनकार किया है और इनका निष्पक्ष कानूनी परीक्षण आवश्यक है।

इस प्रसंग का महत्व किसी आरोप को पहले से सिद्ध मान लेने में नहीं, बल्कि सार्वजनिक सत्ता और निजी जीवन की शक्ति-संरचनाओं के बीच अंतर समझने में है।

अंकिता के मामले में कार्यस्थल की शक्ति असमानता का सवाल था। इकरा के मामले में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बावजूद डिजिटल अपमान का प्रश्न था। रेखा आर्य का प्रसंग एक तीसरी परत सामने रखता है कि सार्वजनिक जीवन में अधिकार प्राप्त महिला को भी निजी संबंधों में बराबरी और सुरक्षा की गारंटी अपने आप नहीं मिलती। किसी महिला का मंत्री होना उसे संवैधानिक और प्रशासनिक अधिकार देता है। लेकिन पारिवारिक संबंधों में सम्मान, बराबरी और स्वायत्तता एक अलग सामाजिक प्रश्न है।

यह पितृसत्ता की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। वह केवल सार्वजनिक संस्थाओं में ही नहीं, बल्कि निजी संबंधों और परिवार की संरचना में भी मौजूद हो सकती है। इसीलिए महिला सशक्तीकरण को केवल नौकरी, वेतन, चुनावी प्रतिनिधित्व या उच्च पद तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता। एक महिला सार्वजनिक जीवन में शक्तिशाली और निजी जीवन में असमान शक्ति संबंधों का सामना करने वाली व्यक्ति—दोनों हो सकती है।

लेकिन महिलाओं पर नियंत्रण केवल उनके शरीर, नौकरी या पारिवारिक संबंधों तक सीमित नहीं है। जब महिला स्वतंत्र रूप से बोलती है, सवाल करती है और स्थापित सत्ता को चुनौती देती है, तब उसकी सार्वजनिक विश्वसनीयता भी निशाने पर आ सकती है। नेहा सिंह राठौर का प्रसंग इसी चौथी परत को सामने लाता है।

नेहा सिंह राठौर का फेसबुक पेज


4. नेहा सिंह राठौर: महिला की स्वतंत्र आवाज़ और चरित्र हनन

नेहा सिंह राठौर अपनी राजनीतिक और सामाजिक टिप्पणियों के लिए जानी जाती हैं।अक्टूबर 2026 में एक मीडिया संस्थान की गलत रिपोर्ट में उनका नाम कथित सेक्स रैकेट से जोड़ दिया गया। संस्थान ने बाद में गलती स्वीकार करते हुए माफ़ी माँगी।

इस मामले को इकरा हसन के प्रसंग से जोड़कर देखना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इकरा हसन के मामले में डिजिटल माध्यम से उनकी छवि को निशाना बनाए जाने का आरोप था। नेहा सिंह राठौर के मामले में गलत मीडिया रिपोर्टिंग ने उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने का जोखिम पैदा किया। दोनों घटनाओं की प्रकृति और जिम्मेदारियाँ अलग हैं। लेकिन दोनों इस बात की ओर ध्यान दिलाती हैं कि सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की छवि को यौनिक संकेतों के माध्यम से नुकसान पहुँचाना कितना गंभीर हो सकता है।

पुरुषों की राजनीतिक आलोचना अक्सर उनकी नीतियों, निर्णयों और विचारों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहती है। महिलाओं की आलोचना में कई बार उनके चरित्र, शरीर और निजी जीवन को भी अनावश्यक रूप से घसीटा जाता है।

यह अंतर केवल व्यक्तिगत अपमान का प्रश्न नहीं है। जब किसी महिला की सार्वजनिक विश्वसनीयता को उसके कथित यौन चरित्र से जोड़कर कमजोर किया जाता है, तो उसका असर दूसरी महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी पर भी पड़ सकता है। इस तरह चरित्र हनन केवल एक महिला की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं रहता। यह महिलाओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक भागीदारी का भी प्रश्न बन जाता है।


चार घटनाओं को जोड़ने वाला वास्तविक सूत्र क्या है?

इन चारों प्रसंगों को जोड़ने के लिए यह दावा करना आवश्यक नहीं कि सभी घटनाओं के पीछे एक जैसी मंशा थी, या सभी मामलों की कानूनी गंभीरता समान है। अंकिता की हत्या एक सिद्ध आपराधिक घटना है। इकरा हसन के प्रसंग में डिजिटल यौन उत्पीड़न का प्रश्न है। रेखा आर्य से जुड़े आरोपों का कानूनी परीक्षण आवश्यक है। नेहा सिंह राठौर का प्रसंग गलत रिपोर्टिंग और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचने से संबंधित है।

इनके बीच समानता अपराध की प्रकृति में नहीं, बल्कि उन लैंगिक शक्ति संबंधों में खोजी जानी चाहिए जिनके संदर्भ में इन घटनाओं को समझा जा सकता है।

चारों प्रसंगों को एक साथ रखने पर तीन महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं।


पहला: पितृसत्ता वर्ग और पद की सीमाओं में बँधी नहीं है

अंकिता की आर्थिक स्थिति, इकरा की संसदीय पहचान, रेखा आर्य की प्रशासनिक शक्ति और नेहा की सार्वजनिक लोकप्रियता अलग-अलग हैं। इससे यह धारणा चुनौती पाती है कि महिला जितनी अधिक शक्तिशाली होगी, वह उतनी ही अधिक लैंगिक उत्पीड़न और अपमान से सुरक्षित हो जाएगी।

शक्ति महिलाओं को प्रतिरोध के साधन देती है, लेकिन असमान सामाजिक संबंधों को अपने आप समाप्त नहीं करती।

दूसरा: पितृसत्ता अलग-अलग संस्थाओं में अलग रूप लेती है

कार्यस्थल में यह आर्थिक निर्भरता और अधिकारों के दुरुपयोग के जोखिम के रूप में दिखाई दे सकती है। राजनीति और डिजिटल माध्यमों में यह लैंगिक अपमान और छवि को नुकसान पहुँचाने के रूप में सामने आ सकती है। परिवार में यह असमान नियंत्रण, धमकी या घरेलू हिंसा के रूप में प्रकट हो सकती है। मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में यह महिला की विश्वसनीयता को उसके चरित्र से जोड़कर कमजोर करने की प्रवृत्ति में दिखाई दे सकती है।

इसलिए पितृसत्ता को केवल पुरुषों और महिलाओं के व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित करना पर्याप्त नहीं है। इसका विश्लेषण सामाजिक संस्थाओं और उनके भीतर मौजूद शक्ति संबंधों के स्तर पर भी करना होगा।

तीसरा: महिलाओं की स्वायत्तता ही केंद्रीय प्रश्न है

अंकिता के प्रसंग में असहमति और शारीरिक स्वायत्तता का अधिकार महत्वपूर्ण है। इकरा के प्रसंग में अपनी छवि और सार्वजनिक गरिमा पर अधिकार का प्रश्न है। रेखा आर्य के प्रसंग में निजी संबंधों में सुरक्षा और स्वतंत्रता का प्रश्न उठता है। नेहा के प्रसंग में सार्वजनिक प्रतिष्ठा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न है।

इन सबके केंद्र में महिला की स्वायत्तता है—अपने शरीर, निर्णय, संबंधों, छवि और आवाज़ पर उसका अधिकार। यही इन चारों प्रसंगों की सबसे महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक कड़ी है।

इसलिए ‘Smash the Patriarchy’ केवल नारा नहीं, संरचनात्मक बदलाव की मांग है। यदि समस्या केवल कुछ व्यक्तियों के गलत व्यवहार की होती, तो उसका समाधान केवल उन व्यक्तियों को दंडित करने तक सीमित किया जा सकता था। लेकिन जब महिलाओं की स्वतंत्रता और गरिमा से जुड़े प्रश्न कार्यस्थल, राजनीति, परिवार, मीडिया और डिजिटल दुनिया जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में सामने आते हैं, तब संस्थागत जवाबदेही और सामाजिक मानसिकता दोनों की समीक्षा आवश्यक हो जाती है।

यहीं ‘Smash the Patriarchy’ की अवधारणा महत्वपूर्ण बनती है।

इसका अर्थ पुरुषों के विरुद्ध संघर्ष नहीं, बल्कि उन असमान शक्ति संबंधों को समाप्त करना है जिनमें महिलाओं की सहमति, स्वतंत्रता, सुरक्षा और गरिमा को कम महत्व दिया जाता है। इसका अर्थ है कि महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर उनकी स्वतंत्रता सीमित करने के बजाय उन परिस्थितियों को बदला जाए जो उन्हें असुरक्षित बनाती हैं। इसका अर्थ है कि महिला की सफलता को केवल उसके पद, वेतन या लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक निर्णय लेने के अधिकार से भी मापा जाए, और इसका अर्थ है कि किसी महिला की सुरक्षा और गरिमा के प्रश्न पर हमारा रवैया उसकी जाति, वर्ग, धर्म या राजनीतिक विचारधारा के अनुसार न बदले।


निष्कर्ष: महिलाओं ने सत्ता हासिल की है, लेकिन क्या समाज ने बराबरी स्वीकार की है?


अंकिता भंडारी, इकरा हसन, रेखा आर्य और नेहा सिंह राठौर के प्रसंगों को साथ रखकर देखने पर महिला सशक्तीकरण की प्रचलित अवधारणा पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। हम अक्सर मान लेते हैं कि शिक्षा, नौकरी, आर्थिक स्वतंत्रता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक पहचान महिलाओं की मुक्ति के अंतिम पड़ाव हैं। लेकिन ये उदाहरण बताते हैं कि महिलाओं को अधिकार और अवसर मिलना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक उन सामाजिक संरचनाओं को बदलना भी है जो उनकी स्वायत्तता को सीमित करती हैं।


अंकिता का प्रसंग बताता है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता पर्याप्त नहीं। इकरा का प्रसंग बताता है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं। रेखा आर्य का प्रसंग सार्वजनिक शक्ति और निजी सुरक्षा के बीच अंतर समझने को मजबूर करता है। नेहा का प्रसंग बताता है कि सार्वजनिक लोकप्रियता भी प्रतिष्ठा पर हमलों से पूर्ण सुरक्षा नहीं देती।


इन चारों से निकलने वाला निष्कर्ष यह नहीं कि महिलाओं का सशक्तीकरण व्यर्थ है। बल्कि यह कि सशक्तीकरण को सामाजिक और संस्थागत बदलाव से जोड़ना आवश्यक है।


महिलाओं को केवल सत्ता में हिस्सेदारी नहीं चाहिए; उन्हें सत्ता के हर रूप में बराबरी चाहिए। उन्हें केवल सुरक्षा का आश्वासन नहीं, स्वतंत्रता का वास्तविक अधिकार चाहिए। उन्हें केवल सम्मान की भाषा नहीं, सम्मान सुनिश्चित करने वाली सामाजिक और संस्थागत व्यवस्था चाहिए।

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और यही कारण है कि ‘Smash the Patriarchy’ आज भी एक प्रासंगिक सामाजिक मांग है। क्योंकि पितृसत्ता की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि वह महिलाओं को शक्तिशाली बनने से हमेशा रोक देती है। बल्कि यह है कि महिलाओं के शक्तिशाली हो जाने के बाद भी असमान शक्ति संबंध बने रह सकते हैं।


जब तक महिलाओं की व्यक्तिगत उपलब्धियाँ सामूहिक सामाजिक बराबरी में नहीं बदलतीं, तब तक पितृसत्ता के विरुद्ध संघर्ष अधूरा रहेगा।

Dr. Chayanika Uniyal

Dr. Chayanika Uniyal

डॉ चयनिका उनियाल दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास की असोसिएट प्रोफेसर हैं और जेंडर मुद्दों की प्रखर प्रवक्ता