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फाँसी के फंदे से शहीद अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान का देशवासियों के लिए अंतिम संदेश: जयंती विशेष

Md. Tousif Md. Tousif | 1h ago · 4 min read
फाँसी के फंदे से शहीद अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान का देशवासियों के लिए अंतिम संदेश: जयंती विशेष

अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान ने अपने संदेश में जिस एकता की अपील की थी, वह आज भी भारतीय समाज के लिए उतनी ही अहम है।

आज ही के दिन यानी 22 अक्टूबर सन् 1900 को उत्तरप्रदेश के शाहजहाँपुर में जन्मे अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान की गिनती भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन क्रांतिकारियों में होती है जिन्होंने अपनी ज़िदगी भारत की आज़ादी के नाम कर दी। पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के साथ उनकी दोस्ती और काकोरी कांड में उनकी भूमिका भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसमें वतन से मोहब्बत और मज़हबी एकता एक साथ दिखाई देती हैं। उन्हें 19 दिसंबर 1927 को फ़ैज़ाबाद जेल में फाँसी दे दी गई। लेकिन उनकी ज़िंदगी का मकसद सिर्फ़ उनकी शहादत में नहीं, बल्कि उन विचारों में भी छिपा है जिन्हें वे आख़िरी दिनों तक अपने देशवासियों तक पहुँचाना चाहते थे।

फ़ैज़ाबाद जेल से शहीद अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान का संदेश-

भारतमाता के रंगमंच पर हम अपनी भूमिका अदा कर चुके हैं। ग़लत किया या सही, जो भी हमने किया, स्वतन्त्रता प्राप्ति की भावना से प्रेरित होकर किया। हमारे अपने (अर्थात कांग्रेसी नेता) हमारी निन्दा करें या प्रशंसा, लेकिन हमारे दुश्मनों तक को हमारी हिम्मत और वीरता की प्रशंसा करनी पड़ी है। लोग कहते हैं हमने देश में आतंकवाद (Terrorism) फैलाना चाहा है, यह गलत है। इतनी देर तक मुक़दमा चलता रहा। हमारे में से बहुत से लोग बहुत दिनों तक आज़ाद रहे और अब भी कुछ लोग आज़ाद हैं (संकेत चन्द्रशेखर आज़ाद की ओर है।-सं ) फिर भी हमने – या हमारे किसी साथी ने हमें नुक़सान पहुँचाने वालों तक पर गोली नहीं चलायी। हमारा उद्देश्य यह नहीं था। हम तो आज़ादी हासिल करने के लिए देशभर में क्रान्ति लाना चाहते थे।

जजों ने हमें निर्दयी, बर्बर, मानव-कलंकी आदि विशेषणों से याद किया है। हमारे शासकों की क़ौम के जनरल डायर ने निहत्थों पर गोलियाँ चलायी थीं और चलायी थीं बच्चों, बूढ़ों, व स्त्री-पुरुषों पर । इन्साफ़ के इन ठेकेदारों ने अपने इन भाई-बन्धुओं को किस विशेषण से सम्बोधित किया था? फिर हमारे साथ ही यह सलूक क्यों?

हिन्दुस्तानी भाइयो! आप चाहे किसी भी धर्म या सम्प्रदाय को मानने वाले हों, देश के काम में साथ दो! व्यर्थ आपस में न लड़ो। रास्ता चाहे अलग हों, लेकिन उद्देश्य सबका एक है। सभी कार्य एक ही उद्देश्य की पूर्ति के साधन हैं, फिर यह व्यर्थ के लड़ाई-झगड़े क्यों? एक होकर देश की नौकरशाही का मुक़ाबला करो अपने देश को आज़ाद कराओ। देश के सात करोड़ मुसलमानों में मैं पहला मुसलमान हूँ* जो देश की आज़ादी के लिए फाँसी चढ़ रहा हूँ, यह सोचकर मुझे गर्व महसूस होता है।

अंत में सभी को मेरा सलाम। हिंदुस्तान आज़ाद हो। मेरे भाई खुश रहें।

आपका भाई

अशफ़ाक़


स्रोत- पेज 524-25, भगत सिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़, (सं) सत्यम वर्मा, राहुल फाउंडेशन


ऐतिहासिक तथ्य यह है कि 100 के क़रीब मुसलमान ग़दर पार्टी में शहीद हुए और हज़ारों 1857 के आंदोलन में। लेकिन अशफ़ाक़ को कमज़ोर करने और धोखा देने के लिए पुलिस ने एक बार उनसे कहा था कि शहीद होने वाले तुम एकमात्र मुसलमान हो, शायद इसीलिए उन्होंने यह लिखा है।

इस संदेश का सबसे अहम पहलू वह अपील है, जिसमें अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान धर्म और सम्प्रदाय से ऊपर उठकर देश के लिए साथ आने की बात कहते हैं। वे मानते हैं कि आज़ादी की लड़ाई में रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन मंज़िल एक है। यह विचार उस दौर में ख़ास मायने रखता था, जब अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ संघर्ष के साथ-साथ भारतीय समाज के भीतर धार्मिक और साम्प्रदायिक विभाजन भी मौजूद थे।

रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान की दोस्ती इस एकता की एक ऐतिहासिक मिसाल है। दोनों अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमियों से आते थे, लेकिन उनके लिए देश की आज़ादी साझा उद्देश्य थी। काकोरी कांड के बाद अंग्रेज़ी हुकूमत ने क्रांतिकारियों पर मुक़दमा चलाया और उन्हें कठोर सजाएँ दीं। अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान को भी फाँसी की सज़ा सुनाई गई। 19 दिसंबर, 1927 को फ़ैज़ाबाद जेल में उनकी शहादत हुई।

आज उनकी जयंती पर इस संदेश को याद करना केवल एक शहीद को श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह उस विचार को फिर से समझना भी है कि देश की आज़ादी और तरक़्क़ी के लिए उसके लोगों का एक साथ खड़ा होना ज़रूरी है। अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान ने अपने संदेश में जिस एकता की अपील की थी, वह आज भी भारतीय समाज के लिए उतनी ही अहम है।


भगत सिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़ के पेज नंबर 116 पर उनका एक बयान दर्ज है, जिसमें उन्होंने कहा- "मैंने कभी किसी आदमी के खून से अपने हाथ नहीं रँगे और मेरा इन्साफ़ खुदा के सामने होगा। मेरे ऊपर लगाये सभी इल्ज़ाम गलत हैं।" शहीद अशफ़ाक़ शायर भी थे और उनका तखल्लुस “हसरत” था। मरने से पहले आपने ये शेर कहे थे-

फना है सबके लिए हमपे कुछ नहीं मौकूफ ,

बका है एक फकत ज़ात-ए-किब्रियाँ के लिए।

Md. Tousif

Md. Tousif

मोहम्मद तौसिफ़ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खबरों पर नजर रखते हैं और ‘द क्रेडिबल हिस्ट्री’ में रिसर्चर के रूप में कार्यरत हैं।